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Sunday, August 21, 2022

हवन का महत्व

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*हवन का महत्व*
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                 फ़्रांस के ट्रेले नामक वैज्ञानिक ने हवन पर रिसर्च की। जिसमें उन्हें पता चला की हवन मुख्यतः आम की लकड़ी पर किया जाता है। 
                जब आम की लकड़ी जलती है तो फ़ॉर्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्पन्न होती है।जो कि खतरनाक बैक्टीरिया और जीवाणुओं को मारती है ।तथा वातावरण को शुद्द करती है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिकों को इस गैस और इसे बनाने का तरीका पता चला।
                गुड़ को जलाने पर भी ये गैस उत्पन्न होती है। टौटीक नामक वैज्ञानिक ने हवन पर की गयी अपनी रिसर्च में ये पाया की यदि आधे घंटे हवन में बैठा जाये अथवा हवन के धुएं से शरीर का सम्पर्क हो तो टाइफाइड जैसे खतरनाक रोग फ़ैलाने वाले जीवाणु भी मर जाते हैं और शरीर शुद्ध हो जाता है।
                हवन की महत्ता देखते हुए राष्ट्रीय वनस्पति अनुसन्धान संस्थान लखनऊ के वैज्ञानिकों ने भी इस पर एक रिसर्च की । क्या वाकई हवन से वातावरण शुद्द होता है और जीवाणु नाश होता है ?अथवा नही ? 
                उन्होंने ग्रंथों  में वर्णिंत हवन सामग्री जुटाई और जलाने पर पाया कि ये विषाणु नाश करती है। फिर उन्होंने विभिन्न प्रकार के धुएं पर भी काम किया और देखा कि सिर्फ आम की लकड़ी एक किलो जलाने से हवा में मौजूद विषाणु बहुत कम नहीं हुए ,पर जैसे ही उसके ऊपर आधा किलो हवन सामग्री डाल कर जलायी गयी तो एक घंटे के भीतर ही कक्ष में मौजूद बैक्टीरिया का स्तर 94 % कम हो गया। 
                यही नहीं  उन्होंने आगे भी कक्ष की हवा में मौजुद जीवाणुओ का परीक्षण किया और पाया कि कक्ष के दरवाज़े खोले जाने और सारा धुआं निकल जाने के 24 घंटे बाद भी जीवाणुओं का स्तर सामान्य से 96 प्रतिशत कम था। 
                बार-बार परीक्षण करने पर ज्ञात हुआ कि इस एक बार के धुएं का असर एक माह तक रहा और उस कक्ष की वायु में विषाणु स्तर 30 दिन बाद भी सामान्य से बहुत कम था।
                यह रिपोर्ट एथ्नोफार्माकोलोजी के शोध पत्र (resarch journal of Ethnopharmacology 2007) में भी दिसंबर 2007 में छप चुकी है। रिपोर्ट में लिखा गया कि हवन के द्वारा न सिर्फ मनुष्य बल्कि वनस्पतियों एवं फसलों को नुकसान पहुचाने वाले बैक्टीरिया का भी नाश होता है। जिससे फसलों में रासायनिक खाद का प्रयोग कम हो सकता है ।
                आप अपने परिजनों को इस जानकारी से अवगत कराएं । हवन करने से न सिर्फ भगवान ही खुश होते हैं, बल्कि घर की शुद्धि भी हो जाती है । हमने हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का त्याग किया घर-घर पर किए जाने वाले हवन से दूरी, त्रिकाल संध्या उपासना को भूल गए। योगाभ्यास को तिलांजलि दे दी। यही तो हमारे धर्म का मूल ज्ञान एवं विज्ञान था ,जिसे हम स्वयं छोड़कर के सिर्फ अज्ञानग्रस्त हैं ,और अज्ञान का व्यवसाय कर रहे हैं। अज्ञान को ही पाल रहे हैं ,पोष रहे हैं और प्रचारित प्रसारित कर रहे हैं। जब हमने मूल को  सिंचना बंद कर दिया तो डालियां कब तक बिना जड़ों के पोषण के अपना अस्तित्व बचाए रखेंगी? हम डालियों को जीवित रखने के लिए विभिन्न प्रयास कर रहे हैं ,किंतु शायद हम मूर्खता के अलावा कुछ कर नहीं रहे हैं। अपनी जड़ों को सींचे संपूर्ण सनातन रूपी वट वृक्ष फिर से हरा भरा हो जाएगा , क्योंकि ज्ञान का स्रोत त्रिकाल गायत्री संध्या  उपासना एवं शक्ति का मूल" यज्ञ" है । इन दो के बिना सनातन कभी भी सनातन नहीं हो सकता ; बाकी सब सनातन हीन पद्धति हैं। 
👏 हे कथा वाचकों! तुम धर्म के साथ गद्दारी करना बंद करो। थोड़ा उपनिषदों का स्वाध्याय कर लो ,थोड़ा आगम शास्त्र को उठाकर देख लो । भगवान शिव महायोगी थे कोई गंजेड़ी भंगेड़ी नशेड़ी नहीं । वैदिक युग से वर्तमान समय तक मनुष्य की आयु और धर्म का वास्तविक सत्य आप सबको समझ में आ जाएगा। इन काल्पनिक कहानियों को सुना सुना कर धर्म अनुयायियों को भटकाओ मत। धर्म कर्तव्य है, इसे सिर्फ व्यवसाय की तराजू पर मत तोलो। वरना वह समय दूर नहीं जब तुम्हारी वजह से सनातन की बर्बादी निश्चित हो जाएगी। 

     ⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
      ⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
         🔱 जय गुरुदेव 🔱
       ⚜️ जय मां आदिशक्ति ⚜️

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