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⚜️🚩 आप सभी आत्मीय परिवार जनों को करवा चौथ पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।
👏 जगत जननी माँ आप सभी के दांपत्य जीवन में सुख, समृद्धि ,शांति एवं सच्चे प्रेम के आधार त्याग एवं समर्पण को उच्चतम शिखर तक पहुंचाए।
👏 आओ दांपत्य जीवन के त्याग एवं तपस्यामयी इस पावन व्रत के सारगर्भित महत्व को समझें-- करवा चौथ का यह पावन व्रत शक्ति स्वरूपा माताओं ,बहनों के लिए संपूर्ण सुखों के आधार सुहाग को चीर स्थायी बनाए रखने के लिए व्यक्तिगत जीवन में शारीरिक सुख एवं महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर त्याग ,तपस्या एवं बलिदान का स्पष्ट संदेश ले करके आता है। इस पर्व के अंतस्थ में छिपे हुए महत्व को गहराई से समझें तो हम पाएंगे कि सच्चा प्रेम सिर्फ और सिर्फ समर्पण ,त्याग एवं बलिदान की अपेक्षा रखता है। वास्तविक दृष्टिकोण से देखें तो इस संसार में प्रत्येक रिश्ता स्वार्थ से जुड़ा हुआ दिखाई देता है। बिना जरूरत के किसी भी रिश्ते का कोई आधार दिखाई नहीं देता । माता पिता के द्वारा संतानोत्पत्ति भी किसी स्वार्थ के वशीभूत ही की जाती है, किंतु मनुष्य को छोड़ कर संसार का प्रत्येक प्राणी मांँ आदिशक्ति के वशीभूत संतानोत्पत्ति निस्वार्थ भाव से करता है क्योंकि अन्य प्राणियों की संतान बुढ़ापे में उनका सहारा नहीं बनती। मनुष्य जीवन के अन्य रिश्ते नातों के समान ही पति पत्नी के रिश्ते में भी स्वार्थ स्पष्ट रूप से जुड़ा हुआ दिखाई देता है क्योंकि दोनों का जीवन एक दूसरे पर निर्भर होता है और यह स्वार्थ कोई बुरा नहीं है यह जीवन की जरूरत है ।पति पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए हैं और यह गाड़ी तभी सहजता से आगे बढ़ सकती है जब दोनों पहिए त्याग ,तपस्या ,बलिदान एवं समर्पण भाव के साथ एक दूसरे का साथ निभाते हुए आगे बढ़ें। दांपत्य जीवन के इस रिश्ते में यदि देने के भाव के स्थान पर एक दूसरे को अधिक से अधिक देने की भावना प्रबल रहेगी तो दांपत्य जीवन का यह रिश्ता सिर्फ रिश्ता न रहकर पूजा बन जाएगा क्योंकि जब अपने सुख के स्थान पर हम अपनों के सुख के लिए जीने लगते हैं तो यहां से ही यह संसार मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने लगता है और जैसे-जैसे यह अपनेपन का भाव ब्रह्मांड व्यापी विस्तार प्राप्त करता हुआ प्राणी मात्र के लिए जागृत होने लगता है तो यह साधना की चरम अवस्था का स्पष्ट संकेत है ।अधिक से अधिक देने का भाव ही मानव को महामानव की श्रेणी में ले जाकर के खड़ा करता है । संसार का कोई सा भी रिश्ता हो यदि उस रिश्ते में लेने के स्थान पर हम देना जानते हैं तो वह प्रत्येक रिश्ता सच्चा है, अच्छा है ,पवित्र है और निश्चित रूप से जगत जननी मांँ एवं परमपिता परमात्मा के नजदीक ले जाने वाला है श्रद्धा एवं विश्वास की शक्ति ही तो है जो पत्थर में भी उस परमात्मा को निवास करने पर मजबूर कर देते है ,किंतु यदि रिश्ते के नाम पर हम सिर्फ दूसरे पर एहसान करते हैं और एहसान के बदले अपनी मांगों की लंबी लिस्ट थमा देते हैं तो फिर ऐसा रिश्ता सिर्फ बंधन है, माया का बंधन ! जिसे निभाना सिर्फ मजबूरी हो सकती है और ऐसा रिश्ता सच्चे आनंद का कभी भी आधार नहीं बन सकता। ऐसा रिश्ता जगत जननी मांँ एवं परमपिता परमात्मा के वास्तविक अस्तित्व के कभी भी नजदीक नहीं ले जा सकता ,बल्कि ऐसा रिश्ता नीचे गिरने का अवश्य कारण बनेगा। प्रेम कभी किया नहीं जाता ,वह तो हो जाता है और उसके होने की स्पष्ट पहचान है-" सब कुछ न्योछावर कर देने का भाव, न कि लेने का भाव"।करवा चौथ का यह व्रत संदेश दे रहा है कि कष्ट सहकर भी अपने सुहाग के लिए जीना सीखो क्योंकि यहीं से सच्चे रिश्ते का आधार निर्मित होता है और यह भाव पति एवं पत्नी दोनों के लिए समान रूप से लागू होता है। मांँ आदि शक्ति का स्वरुप यह संपूर्ण ब्रह्मांड पूर्णतया विज्ञान पर टिका हुआ है। हमेशा अपना मीठा जल दूसरों को देने वाली नदियों को बार बार आकर के बादल फिर से भरते रहते हैं। हमेशा दूसरों को फल एवं छाया देने वाले वृक्षों को उस माँ का अस्तित्व आवश्यक संसाधन बैठे-बैठे उपलब्ध करवाता रहता है। यही सिद्धांत मनुष्य के जीवन पर भी लागू होता है ,जो सच्चा सेवाभाव रखता है और अपने कर्तव्य का बिना किसी विशेष अपेक्षा के सच्ची श्रद्धा से निर्वहन करता रहता है। उस पर यह अस्तित्व बिना मांगे ही सब कुछ लुटाने लगता है। कोई भी व्यक्ति इस सिद्धांत का व्यक्तिगत रूप से अपने जीवन में प्रैक्टिकल करके स्पष्ट अनुभव ले सकता है। अपने कर्तव्य का निष्ठा भाव से पालन करो, बिना किसी विशेष महत्वाकांक्षा के, यही निष्काम कर्मयोग का आधार है और यही सच्चे प्रेम एवं दांपत्य सुख पूर्ण जीवन का आधार। लगन चाहे किसी से भी लगे यदि वह सच्ची है तो प्रियतम उस लगन को समझेगा नहीं, ऐसा कभी हो ही नहीं सकता और प्रेम के नाम पर यदि सिर्फ दिखावा है, सिर्फ मांग है ,सिर्फ पाने का भाव है तो रिश्ता प्रेम का नहीं सिर्फ और सिर्फ खुदगर्जी का है, व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा एवं अहम की पुष्टि का है । ऐसा रिश्ता कर्तव्य निर्वहन में सहायक नहीं बल्कि बाधक बनता है और कर्तव्य हिनता धर्म मार्ग एवं मोक्षमार्ग से पतन का मूल कारण! इसलिए यदि दांपत्य जीवन को सच्चे आनंद का आधार बनाना है तो वह चाहे स्त्री हो या पुरुष एक दूसरे के लिए, एक दूसरे की खुशियों के लिए, एक दूसरे की भावनाओं के लिए जीने का भाव प्रमुख होना चाहिए। यदि करवा चौथ के इस व्रत का वास्तविक अर्थ में महत्व समझना है तो अपने जीवन में समर्पण एवं त्याग को स्थान दीजिए। माताओं बहनों के लिए वर्ष में एक बार बिना अन्न -जल के रहना उतना आवश्यक नहीं है, जितना इस व्रत के पीछे छिपे हुए वास्तविक तत्व दर्शन को समझना आवश्यक है। यदि पति की लंबी आयु के लिए पत्नी कठोर व्रत धारण कर सकती है तो यह व्रत पति के लिए भी पालन करने योग्य है। यदि दोनों एक दूसरे की भावनाओं को समझ कर के, एक दूसरे की खुशियों के लिए जीने लगें तो दांपत्य जीवन किसी स्वर्ग से कम नहीं होगा । बस समझना सिर्फ इतना है कि पति को कौन सा कार्य सुख देता है ?पत्नी को कौन सा भाव प्रसन्नता की अनुभूति करवाता है? मैं वह ना करूं जो मेरे पति को कष्ट पहुंचाई और मैं वह ना करूं जो मेरी पत्नी के हृदय को दुख पहुंचाए। बस इतना सा कर लेने मात्र से करवा चौथ के व्रत का वास्तविक महत्व जीवन में चरितार्थ होने लगेगा।
⚜️🚩सत्यमेव जयते🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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