🕉विज्ञान भैरव तंत्र 🕉
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⚜धारणा 3 ⚜
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🌞👉 भगवान शिव माता पार्वती को भैरव स्वरुप को प्राप्त करने का धारणात्मक विज्ञान समझाते हुए कह रहे है --हे देवी ! वायु रूप यह प्राण और अपान शक्ति हृदय से द्वादशांत तक न तो जाएगी और न ही द्वादशांत से हृदय की और वापस ही लौटेगी। जब मध्य नाड़ी का स्थान विकल्प हानि रूप उपाय से विकसित कर दिया जाए अर्थात जब इड़ा अर्थात बायां नासा छिद्र और पिंगला अर्थात दाहिना नासा छिद्र दोनों की गति को सम करके प्राण को सुषुम्ना मार्ग पर प्राप्त कर लिया जाता है तो प्राण की मध्य दशा प्राप्त होती है ।इस सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का प्रवाह होकर मध्य दशा के विकसित होने पर साधक विकल्प रहित भैरव स्वरुप को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है । इस अवस्था में प्रविष्ट हो जाने पर योगी दर्पण में बनते बिगड़ते हुए नाना प्रकार के प्रतिबिंब की भांति मन में उदय और विलीन हो रहे बाह्म पदार्थों और आंतरिक भावों को अर्थात समस्त प्रकार के संकल्प विकल्पों को निमीलन और उन्मीलन समाधि के बीच में ध्यान रूपी अग्नि से जलाई गई ज्ञानाग्नि के द्वारा भस्म कर अपने समस्त इंद्रिय समूह को आलंबन के अभाव में बिना क्रम से अपने स्वरूप में ही विस्तारित कर लेता है ।उस समय साधक को ऐसी प्रतीति होती है मानो ये इंद्रियां अपने अद्भुत स्वरूप को आंखें फाड़ कर देख रही हो ।इस निर्विकल्प अवस्था में प्रवेश कर लेने पर साधक अपने भैरव स्वरूप को जान लेता है ,प्राप्त कर लेता है अर्थात उसको अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है ।
👉निमीलन समाधि -- बाहरी एवं आंतरिक इंद्रियों के प्रवाह को रोककर प्राप्त की गई समाधि को निमीलन समाधि कहते हैं ।
👉उन्मीलन समाधि-- भैरवी मुद्रा में साधना करने वाले साधक साधिका की संपूर्ण इंद्रियां खुली रहती हैं तो भी वे अपने विषयों की ओर आकृष्ट नहीं होती ।इसी स्थिति को उन्मीलन समाधि कहते हैं ।
👏 साधक के दो शब्द-- जब साधक नाड़ी शोधन प्राणायाम एवं आती-जाती श्वास पर होश पूर्वक धारणा को टिकाता है और अंतर्दृष्टि को स्थिर करके प्राण की मध्य दशा को प्राप्त कर लेता है। ऐसी स्थिति में उस साधक को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। यहां पर विशेष समझने की बात यह है -- यदि देखा जाए तो तीसरी धारणा को किसी भी प्रकार से विधि नहीं माना जा सकता क्योंकि यहां पर किसी भी प्रकार से साधना का या धारणा का अलग विज्ञान समझाया नहीं गया है ।यहां पर सिर्फ स्थिति को बताया गया है कि यदि साधक मध्य दशा अर्थात सुषुम्ना में प्राण का प्रवाह करने में समर्थ हो जाता है तो वह अपने भैरव स्वरूप को जानने में ,प्राप्त करने में समर्थ हो जाएगा ।विशेष बात यह है सुषुम्ना मार्ग में प्राण का प्रवाह होकर मध्य दशा प्राप्त करने के लिए साधक को या तो योग मार्ग के अनुसार अनुलोम-विलोम नाड़ी शोधन प्राणायाम का अभ्यास करना होगा या फिर अपनी श्वास के ऊपर प्रथम एवं द्वितीय धारणा के अनुसार होश पूर्वक ध्यान का अभ्यास करना होगा। जब व्यक्ति होश पूर्वक अपनी सांसो पर टिकता है तो उसके प्राण -अपान की गति सम होने लगती है और कुछ मिनट के अभ्यास के बाद उसे सुषुम्ना स्वर की प्राप्ति होने लगती है ।इसलिए जो कोई भी साधक भाई बहिन ध्यान साधना का अभ्यास करें,उन्हें मेरा छोटा सा सुझाव है --आप साधना करने से पूर्व नाड़ी शोधन अनुलोम विलोम प्राणायाम एवं कपालभाति प्राणायाम का अभ्यास अवश्य कीजिए । इससे आपको सुषुम्ना मार्ग में प्राण का प्रवाह करने में निश्चित रूप से सफलता मिलेगी और आप तीव्र गति से धारणा ध्यान के मार्ग पर आगे गति कर पाएंगे।
⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
ओह। बहुत कठिन।
ReplyDeleteबहुत अच्छी जानकारी।
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