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Wednesday, October 13, 2021

सर्वत्र अपना ही प्राण बिखरा पड़ा है-



सर्वत्र अपना ही प्राण बिखरा पड़ा है - 
 
जब हम आत्मवादी बनते हैं तो स्वभावतः भौतिकवाद को केवल उतना ही महत्व देना होता है जितना कि वह अनिवार्यतः आवश्यक है। शरीर की क्षुधाएं बुझाने के लिए भोजन कमाने, कुटुम्ब पोषण की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए सीमित धन कमाने की इच्छा हो तो उसे ईमानदारी से कमाया जा सकता है। शेखी-खोरी और बड़प्पन की कामना से हम बहुत सी बेकार की जरूरतें, फैशन, अपव्यय, उत्सव, आदि के खर्चीले भार अपने सिर पर ओढ़ लेते हैं। वजन को बढ़ाते चलना और उसको उठाने के लिए धर्म और जीवन को बलिदान करते चलना, आज की यही जीवनचर्या है। यदि सादा जीवन बिताया जाय, अपने अपरिग्रही पूर्वजों की भाँति आवश्यकताओं को सीमित रखा जाय तो भौतिक आकर्षण के लोभ से सहज ही बचा जा सकता है। तब आत्म कल्याण के लिए कुछ सोचने और करने का अवकाश मिल सकता है। इसलिए आवश्यकताओं को कम करना और उच्च विचारों को हृदयंगम करना ही एकमात्र वह उपाय रह जाता है जिसके सहारे हम आत्मकल्याण की ओर चल सकते हैं। ‘सादा जीवन और उच्च विचार’ यह आत्मवादी की’ प्रथम साधना है। इस साधना को अपनाये बिना कोई भी व्यक्ति आत्म-कल्याण की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। वस्तुओं की अपेक्षा गुण का मूल्य एवं सम्मान जब समझ में आने लगे तब समझना चाहिए कि यह आत्मवाद का प्रकटीकरण हो रहा है। 
आत्म-कल्याण का अगला कदम सबमें अपनेपन का दर्शन करना है। विश्वव्यापी प्राण एक है, प्राणिमात्र में एक ही आत्मा निवास कर रही है, एक ही नाव में सब सवार हैं, एक ही नदी की सब तरंगें हैं, एक ही सूर्य के सब प्रतिबिम्ब हैं, एक ही जलाशय के सब बुलबुले हैं, एक ही माला के सब दाने हैं, सब में एक ही प्रकाश जगमगा रहा है। सम्पूर्ण समाज शरीर है हम उसके अंग मात्र हैं। आत्मा एक मनुष्य की होती है, सम्पूर्ण प्राणियों की विश्वव्यापी परम विस्तृत जो आत्मा है उसे परमात्मा या विश्वात्मा कहते हैं। नरनारायण, जनता जनार्दन, विराट पुरुष, विश्वनाथ, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, आदि शब्दों में यही भाव भरा हुआ है कि एक ही चैतन्य तत्व प्राणिमात्र में समाया हुआ है। इसीलिए सब आपस में संबंधित हैं, सब आपस में पूर्ण आत्मीय हैं, पूर्णतया एक है। 
संसार की सब पंच भौतिक वस्तुएं निर्जीव हैं उन में सुख देने वाला कोई तत्व नहीं, जिस वस्तु को हम अपनी मान लेते हैं बड़ी प्रिय लगने लगती है। वस्तुओं में प्रिय-अप्रिय लगने लायक कोई विशेषता नहीं है। हमारी ‘अपने पन’ की भावना ही उस साधारण वस्तु को परम प्रिय, परम आकर्षक, परम आनन्द दायक बना देती है। अपने मकान व्यापार, परिवार, शरीर, वाहन आदि से हम बहुत प्रसन्न रहते हैं, वही प्रिय लगते हैं। पर उनसे भी अधिक अच्छी यह सब वस्तुएँ दूसरे की हों तो उनसे उतना आनन्द नहीं होता। इससे स्पष्ट है कि आनन्द का उद्गम हमारी आत्मा है। यह आत्मीयता की भावना यदि प्राणी मात्र में, समस्त सृष्टि में, आरोपित कर दी जाए तो विश्व का कण-कण स्वर्गीय आनन्द से, ओत-प्रोत हो जायगा। प्रत्येक प्राणी अपना भाई, भतीजा जैसा लगने लगेगा। अपने को विश्व, परिवार का सदस्य, समस्त सृष्टि का स्वामी, अनुभव करने पर जो अपार आनंद आता है, उसका गायत्री के शब्द का अर्थ समझने वाला ही रसास्वादन कर सकता है। 
            - Pujya sadgurudev Shri Ram Sharma Aacharya ji
क्रमशः…….

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