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🕉️ 🚩राम कथा🚩🕉
🕉️ आत्म जिज्ञासु आत्मजनो! जब हम साधना पथ पर आगे बढ़ते हैं और अपने अंतस्थ में उतर पाते हैं ,तब समस्त ग्रंथों का तत्व दर्शन भी स्पष्ट रूप से समझ में आने लगता है। हमारे अधिकांश ग्रंथ आत्म चेतना के विस्तार को ही लक्ष्य बनाकर के लिखे गए हैं ,किंतु वास्तविक अर्थ में हम उस तत्व दर्शन तक पहुंच ही नहीं पाते ,जो वह ग्रंथ कहना चाहता है ।
👏आओ हम रामायण के वास्तविक तत्व दर्शन को समझें--- वास्तविक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण सें देखें तो रावण के दस सिर किसी व्यक्ति विशेष का प्रतिनिधित्व नहीं करते बल्कि ये 10 सिर अहंकारी एवं दुराचारी व्यक्ति के दुर्गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दुर्गुण मन का विषय है और सत गुणआत्मा का। जहां पर मन शक्तिशाली है, वहां पर दुर्गुण अधिक प्रभावशील होंगे और जहां पर आत्म चेतना शक्तिशाली है ,वहां पर सत्गुण अधिक शक्तिशाली एवं प्रभावी होंगे। समस्त दुर्गुणों का प्रतिनिधि हमारा मन ही रावण है और समस्त अच्छाइयों का प्रतिनिधि हमारा आत्मा ही राम है। रावण हमारे मन के अंदर विद्यमान 10 प्रकार के दुर्गुणों का प्रतिनिधित्व करता है और इसमें विद्यमान 10 प्रकार के दुर्गुण ही इसके सिर हैं । ये 10 दुर्गुण जिस व्यक्ति में जिस -जिस स्तर पर विद्यमान हैं ,वह व्यक्ति आज भी उतने ही स्तर पर रावण ही है । राम भी कोई व्यक्ति विशेष नहीं है, बल्कि राम हमारे अंतस्थ में विद्यमान उस परमपिता परमात्मा का ज्योति स्वरूप आत्म तत्व ही है। राम कोई और नहीं बल्कि हमारी आत्मा है। रावण दुर्गुणों का प्रतिनिधित्व करता है तो राम हमारे अंतस्थ में विद्यमान सतगुणों का प्रतिनिधित्व करता है। "जो रोम रोम में रम रहा है, वही तो राम है "। जिस व्यक्ति में आत्मा का कल्याण करने वाले गुण जिस अनुपात में उपस्थित हैं, वह उतना ही राम के नजदीक है, वह उतना ही राम को अपने अंतस्थ में धारण करता है और जिसमें गुण ही गुण हैं ,अवगुणों के लिए कोई स्थान नहीं ,वह स्वयं साक्षात राम ही है। तो चलो हम भी तो देखें
हम राम है या रावण- ? सत्य ,धर्म , न्याय ,त्याग ,तपस्या, तितिक्षा ,नम्रता ,धैर्य, साहस, शौर्य , ब्रम्हचर्य। यही राम के मुख्य गुण हैं और ये गुण जिस व्यक्ति में जिस स्तर पर विद्यमान हैं, वह उतना ही राम के नजदीक हैं । वह उतने स्तर पर राम ही है और जिस व्यक्ति में जितने स्तर तक रावण के दुर्गुण विद्यमान हैं वह उतने स्तर तक रावण ही है। तो आओ अब हम रावण के गुण भी देख लेते हैं-
असत्य ,अधर्म ,अति काम, अति क्रोध ,अति लोभ, अति मोह, दंभ दुर्भाव, द्वेश,पाखंड । यही रावण के दस सिर हैं । रावण दहन से इन्हीं को जलाने का संदेश दिया जाता है । इन्हीं को जलाना समाज के लिए आवश्यक है,तभी राम के गुणों का समाज में विस्तार किया जा सकेगा और राम राज्य की स्थापना की जा सकेगी ।जिस जिस व्यक्ति में ये गुण एवं अवगुण जिस- जिस अनुपात में विद्यमान हैं वह जीता जागता उतना ही राम एवं रावण है । इसलिए रावण का दहन करते हुए हम अपने आपको अवश्य देख लें कि कहीं हम स्वयं रावण तो नहीं हैं? अब यदि हम रावण हैं तो हम राम बनने के लिए क्या प्रयास कर रहे हैं ?और यदि नहीं कर रहे हैं तो फिर हमें रावण का पुतला जलाने का की कोई अधिकार नहीं है क्योंकि हम अज्ञानी हैं , मूर्ख हैं पुतले के जलाने से रावण का बाल भी बांका नहीं हो रहा है। वह तो दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है ,विराट होता जा रहा है और राम का राज्य सिमटता रहा है । हमारी बुद्धि रूपी सीता का हरण दुर्गुणों से भरे हुए मन रूपी रावण ने कर लिया है जिससे आत्मा रूपी राम पतन के गर्त में गिरता जा रहा है। यदि वास्तविक रूप में रावण को जलाना चाहते हो और राम को बचाना चाहते हो तो अपने अंतस में झांक कर देखो तब वास्तविक स्थिति का पता चलेगा और अपने आप को रूपांतरित करने की दिशा में आगे बढ़ो! तभी मन रूपी रावण से सीता रूपी प्रज्ञा का हरण होने से बचाया जा सकेगा और तभी वास्तविक रूप में राम की विजय की पताका संपूर्ण विश्व में लहराई जा सकेगी ।
👏 यदि हो सके तो दशहरे पर वास्तविक रूप में रावण को जलाने का संकल्प अपने अंतस्थ में धारण करें और राम को अपने हृदय में स्थान देने का दृढ़ निश्चय करें । दुर्गुणों का त्याग करें और सतगुणों का वर्धन करें, तभी हम वास्तविक दृष्टिकोण में इस संसार को स्वर्ग से सुंदर बना सकेंगे और तभी यह संसार कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकेगा ,तभी राम राज्य की स्थापना हो सकेगी । बस प्रथमतया यह रामराज्य हमारे अंतस्थ में ही स्थापित होगा ,तभी यह बाहर अपना विस्तार दिखाएगा । रावण दहन के द्वारा प्रतिवर्ष हमारी सनातन परंपरा यही संदेश देती है किंतु हमने इसे एक परिपाटी समझ लिया। बहुत बड़ी भूल कर रहे हैं ,बहुत बड़ी भूल । इसे सुधारने की आवश्यकता है। हमें अपने अंतस्थ से इन दुर्गुणों को जलाकर के राख करना है ,तभी सभ्य समाज का निर्माण हो सकेगा । मानव मात्र के ही नहीं प्राणी मात्र के लिए हितकारी समाज बनाया जा सकेगा और इन दुर्गुणों पर राम के गुणों की विजय होने पर ही हम वास्तविक रूप में विजयादशमी का पर्व मनाने का अधिकार स्थापित कर सकेंगे। वरना अभी तो हम अपनी हार का ही उत्सव मना रहे हैं। हम जीते ही नहीं हैं, हम हारे हुए हैं और फिर भी जीत का जश्न मना रहे हैं!!! भगवान श्रीराम ने तो इन दुर्गुणों को जीत लिया था इसलिए उनके लिए तो यह दिन विजय का दिन था ,विजय का दिन है और विजय का दिन रहेगा किंतु क्या हमारे लिए भी यह विजय का दिन है? प्रश्न अपने आप से ही पूछना है और जवाब भी स्वयं को ही देना है!
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
( मेरी संपूर्ण पहचान)
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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