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Thursday, October 7, 2021

गायत्री अनुष्ठान कैसे करें?

🕉🔥 अनुष्ठान कैसे करें 🔥🕉        
गायत्री का पूर्ण पुरश्चरण 24 लक्ष जप का होता है जो प्रायः एक वर्ष में पूरा होता है। इससे छोटा एक मध्यम पुरश्चरण है जो सवालक्ष जप का होता है और चालीस दिन में पूरा होता है। कोई-कोई इसे एक मास में भी कर लेते हैं। सब में छोटा अनुष्ठान 24 हजार का है यह 9 दिन में पूरा हो जाता है। चौबीस लक्ष और सवालक्ष की साधना के बारे में फिर कभी लिखेंगे ,इस अंक में सबसे छोटे 24 हजार के साधन के संबंध में लिख रहे हैं। 
जेष्ठ सुदी 10 को गंगादशहरा है। यह गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व है। इसी महापर्व के दिन विश्वामित्र ऋषि ने गायत्री का महाविज्ञान मनुष्यों के सम्मुख प्रकट किया था और इसी दिन भागीरथ ने पुण्य श्लोका गंगा का अवतरण लोक में किया था। जैसे आश्विन और चैत्र की ऋतु संध्याएं -नवदुर्गाएं -गायत्री साधना के लिए उपयुक्त अवसर हैं वैसे ही जेष्ठ सुदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक 24 हजार जप पूरे कर लेने चाहिए और गायत्री जयन्ती-गंगादशहरा-के दिन पूर्णाहुति का हवन एवं ब्रह्मदान करना चाहिए। 
नौ दिन में 24 हजार जप पूरे किये जाये जो प्रति दिन करीब 2667 मंत्र जपने होते है मात्रा में 108 दाने होने से 24 मालाएं प्रति दिन जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। इतने मन्त्र जपने में करीब 2 घन्टे लगते हैं। आजकल गर्मियों के दिनों में प्रातःकाल शौच स्नान से निवृत्त होकर 4 बजे साधना पर बैठ जाना कुछ कठिन नहीं हैं। 7 बजे जप पूरा हो जाता है। जिन्हें प्रातःकाल जल्दी ही कोई काम करना हो वे 1 घन्टे सवेरे 1 घन्टा शाम को अपना समय विभाजित कर सकते हैं। 
साधना आरंभ करने से पूर्व किसी सुयोग्य गायत्री उपासक को पथ प्रदर्शक आचार्य नियुक्त कर लेना चाहिए। उसके संरक्षण पथ प्रदर्शन के साधन करना उचित होता है। गायत्री को माता, आचार्य को पिता, मानकर साधना करनी चाहिए। अनियंत्रित, मनमानी, अविधिपूर्वक की हुई ऊटपटाँग साधना वह परिणाम नहीं दे पाती है जो देना चाहिए । 
शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्ध वस्त्र धारण करके साधना के लिए कुश के या खजूर बेत आदि वनस्पतियों से बने आसन पर बैठना चाहिए। मुख प्रातःकाल पूर्व को, सायंकाल 2 घन्टे सूर्योदय से पूर्व और शाम को सूर्यास्त के 1 घन्टे पश्चात् इन तीन घन्टों को छोड़ कर रात्रि के अन्य भागों में गायत्री जप नहीं करना चाहिए। पालथी मार कर बैठें रीढ़ की हड्डी सीधी रहे। खुली हवा का एकान्त स्थान ढूँढ़ना चाहिए। यदि बहुत आदमियों की दृष्टि पड़ती हो तो कपड़े से माला को ढक लेना चाहिए या गौमुखी में हाथ डाल लेना चाहिए। 
माला चन्दन या तुलसी की लेनी चाहिए। तर्जनी उंगली से जप के समय माला का स्पर्श नहीं करना चाहिए। बीच का बड़ा दाना (सुमेरु) उल्लंघन नहीं करना चाहिए। माला पूरी हो जाने पर उसे पीछे को ही लौटा लेना चाहिए। जहाँ माला न हो वहाँ उंगलियों के पौरों से भी जप की गणना की जा सकती है। जप इस प्रकार करना चाहिए कि कंठ से ध्वनि होती रहे होठ हिलते रहें पर पास बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से मन्त्र को न सुन सके। जो ब्रह्म संध्या की विधि जानते हैं वे पहले ब्रह्म संध्या करके तब जप आरंभ करें जो नहीं जानते हैं वे उसे छोड़ दे और गायत्री और गुरु का ध्यान एवं पूजन करके जप आरम्भ कर दें।                 

अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य में रहना आवश्यक है। सिर के बाल नहीं कटाने चाहिए। ठोड़ी की हजामत अपने हाथ से बनाई जा सकती है। चारपाई या पलंग त्याग कर तख्त या जमीन पर सोना चाहिए। आहार-विहार सात्विक रखें। अपने शरीर और वस्त्रों को जहाँ तक हो सके कम ही स्पर्श होने देना चाहिए। अनुष्ठान के दिनों में एक समय अन्नाहार एक समय दूध फल इस प्रकार का अर्ध उपवास चल सके तो और भी उत्तम है। 
जप के समय हृदय या मस्तक से ज्योतिर्मयी गायत्री का भक्ति भावपूर्वक ध्यान करते चलना चाहिए। जप पूरा हो जाने पर कम से कम 108 आहुतियों का हवन करना चाहिए, हवन बिना किसी पंडित आदि की सहायता के स्वयं भी किया जा सकता है। अकेले करना हो तो घी और सामग्री दोनों वस्तुएं मिला लेनी चाहिए। कई व्यक्ति शामिल होकर करें तो एक घी ले लें अन्य लोग सामग्री ले लें। गायत्री मन्त्र से ही आहुति डाले। प्रति आहुति में कम से कम 3 मासे सामग्री तथा 1 मासे घी होना चाहिए इस प्रकार हवन में कम से कम 6 छटाँक सामग्री और 2 छटाँक घी अवश्य होना चाहिए। पूर्णाहुति में मेवों मिष्ठान्नों की विशेष आहुति अन्त में देनी चाहिए यज्ञ की भस्म को किसी पवित्र स्थान में विसर्जित कर दें। 
शास्त्रों में उल्लेख है कि बिना दान का यज्ञ निष्फल होता है। इसलिए अनुष्ठान के अन्त में कुछ न कुछ दान करना आवश्यक है। ब्रह्मभोज, गुरु पूजा, दक्षिणा, महाप्रसाद विवरण आदि अनेक प्रकार से अपनी श्रद्धा और सामर्थ्यानुसार दान किया जा सकता है। इनमें एक अच्छा सस्ता और सर्वोत्तम सुपरिणाम उत्पन्न करने वाला दान यह है कि गायत्री साहित्य का सत्पात्रों को दान किया जाय, जिनमें साधना की ओर प्रवृत्ति है वे चाहे ब्राह्मण हों या अब्राह्मण ऐसे ब्रह्मदान के अधिकारी है। (1) गायत्री ही कामधेनु है (2) वेद−शास्त्रों का निचोड़ गायत्री (3) गायत्री की सर्वसुलभ साधनाएं, यह छह-छह आने मूल्य की हमारी सस्ती पुस्तकें इस प्रकार के दान के लिए बहुत ही उपयुक्त है। गायत्री के 24 अक्षर एवं 14 पद हैं। अपनी सामर्थ्य के अनुसार 24 या कम से कम 14 पुस्तकें सत्पात्रों का दान करने से अनुष्ठान के अन्त में ब्रह्मदान का उद्देश्य भली प्रकार पूरी हो जाता है। किसी के शरीर को भोजन करा देने की अपेक्षा उसको कल्याण के आनन्द मय मार्ग पर ले जाने वाला ज्ञान-दान देना अधिक महत्व पूर्ण है। 
अनुष्ठान प्रत्यक्ष धर्म है। इसका परिणाम तुरन्त दिखाई देता है। इससे अधिक फलदायिनी, नास्तिकों को आस्तिक बनाने वाली साधना दूसरी नहीं हैं। जिन्हें श्रद्धा न हो वे परीक्षा के तौर पर एक छोटा अनुष्ठान करके देखें। इससे उन्हें सन्तोष जनक परिणाम की प्राप्ति होगी। 
- 🚩🔥सदगुरुदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी

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