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❓ शरद तिवारी जी क्या सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर एवं कलयुग की काल गणना की अवधारणा वैदिक काल गणना के विज्ञान ज्योतिष में विद्यमान है? जो कि पूर्णतया सत्य आधारित है ..!
- रामेश्वर हिंदू अध्यात्मिक जिज्ञासा समाधान ग्रुप में ।
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नहीं मनगढ़ंत अंकगणित
- शरद तिवारी जी
शरद तिवारी जी जय मां आदिशक्ति! मतलब की यह गणना पुराणों की देन है जो कि सत्य के स्थान पर असत्य का मार्ग दिखाते हैं, धर्म अनुयायियों को सत्य से भटकाते हैं।
- रामेश्वर हिंदू
जी बिल्कुल
महाभारत काल के प्रमाण आज भी मौजूद है।5000 वर्ष पूर्व श्रीराम जी के पुत्र महाराज कुश की तीसरी पीढ़ी के राजा दुर्योधन की ओर से महाभारत युद्ध मे शामिल हुए।
यानी 7000 वर्ष पूर्व राम राज था।
- शरद तिवारी जी
🌞👏श्री श्री आप को शत-शत प्रणाम ! जी बिल्कुल आप ने वास्तविक सत्य को प्रकट किया है। पुराणों में सतयुग काल में इंसानों की आयु हजारों -लाखों वर्ष बता रखी है जबकि वेदों में इंसान की आयु 100 वर्ष ही बता रखी है और उसी आधार पर आयु काल को चार भागों में बांटकर आश्रम व्यवस्था का निर्धारण किया गया है। पुराणों में स्थान स्थान पर तपस्या के नाम पर व्यक्ति विशेष को सिद्धियां एवं वरदान प्राप्त करने के लिए हजारों वर्षों तक तपस्या करता हुआ बताया जाता है और जब वह तपस्या करके लौटता है तब तक उसका परिवार भी जीवित रहता है। इसका अर्थ है उस समय पर जनसामान्य का आयु काल लाखो वर्ष रहा होगा किंतु वेद एवं आगम अर्थात तंत्र ग्रंथों के आधार पर यह पूर्णतया असत्य साबित होता है। वैदिक युग में साधना के नाम पर बड़ी से बड़ी साधना योग मार्ग के द्वारा ही संपादित की जाती थी और तंत्र मार्ग में भी इसी पद्धति का अनुसरण किया जाता था जबकि पुराणों ने तपस्या का ऐसा भयंकर स्वरूप बता रखा है जिस प्रकार से कोई भी व्यक्ति कभी साधना कर नहीं सकता और यदि वह करेगा तो अपने प्राणों से हाथ धो बैठेगा । इन पुराणों में ज्ञान की कमी नहीं है किंतु भटकाव वादी पाखंड की भी कमी नहीं है । इनमें धर्म के नाम पर मूल सत्य ज्ञान से भटकाने का भरसक प्रयास किया गया है। ऐसा लगता है कि पुराणों की रचना करने के पीछे उद्देश्य ही सिर्फ वेदों के ज्ञान से भटकाने का रहा है। जो वेद सिर्फ और सिर्फ कर्म करके अपने आप को सिद्ध करने का ज्ञान देते हैं। जहां पर मानव मात्र के लिए परमात्मा को प्राप्त करने का मार्ग सिर्फ और सिर्फ योग मार्ग और जीवन भर अपने कर्तव्य कर्मो का निष्पादन करना निर्धारित किया गया है। उसके स्थान पर पुराण सिर्फ और सिर्फ भाग्यवाद का सहारा लेने का ज्ञान देते हैं। हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने का ज्ञान देते हैं । गज और ग्राह की कहानी सुना कर , भक्त प्रहलाद और बिल्ली के बच्चों की कहानी सुना कर विपत्ति के समय सिर्फ भगवान पर विश्वास रखकर हाथ पर हाथ धरकर बैठे रहने का भटकाव वादी अज्ञान देते हैं । अजामिल की कहानी सुना कर कलयुग में तो सिर्फ उठते बैठते भगवान का नाम लेने मात्र से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होने का दावा करके हैं। कलयुग में धर्म के चार स्तंभों में से सिर्फ दान ही एकमात्र मुख्य स्तंभ शेष रह गया है यह कह कर धर्म अनुयायियों को सिर्फ दान देने के लिए प्रेरित करते हैं ।किसी नदी एवं किसी कुंड में नहाने मात्र से मोक्ष का अज्ञान देते हैं। इन पुराणों ने मोक्ष शब्द को ही मजाक का पात्र बना के रख दिया है जबकि वेदों में स्पष्ट रूप से लिखा हुआ है कि मोक्ष देवताओं को भी दुर्लभ है ,बड़े से बड़े ऋषि-मुनियों को भी दुर्लभ है क्योंकि जब तक कोई भी व्यक्ति अपने मानसिक विकारों से मुक्त नहीं हो जाता अपनी इच्छाओं एवं कामनाओं से निवृत नहीं हो जाता तब तक उसे मोक्ष किसी भी पुण्य कार्य से प्राप्त नहीं हो सकता क्योंकि पुण्य कर्मो का प्रतिफल स्वर्ग है मोक्ष नहीं! मोक्ष तो समस्त कर्मों के फल से निवृत्त होने की परिणिति है ।क्या किसी सरोवर में स्नान करने से ,किसी नदी में स्नान करने से किसी व्यक्ति की मानसिक प्रवृत्तियों पर कोई स्थायी प्रभाव पड़ता है ? क्या वह अपने अंतस में जड़ जमा चुके अति काम,अति क्रोध, अतिलोभ,अति मोह, दंभ ,दुर्भाव, द्वेष, जन्म मृत्यु का भय आदि से मुक्त हो पाता है। यदि नहीं तो फिर पुराणों में यह दावा किस लिए कि किसी स्थान विशेष पर स्नान करने मात्र से व्यक्ति को मोक्ष मिल जाएगा ?सिर्फ कथा सुन लेने मात्र से मोक्ष मिल जाएगा ? क्यों नहीं अंतस्थ की गहराई में डूब कर उस सत्य स्वरूप परमात्मा को खोजने का सत्य मार्ग धर्म अनुयायियों को दिखाया जाता है? वेदों ने यदि पुरुषार्थ कहा है तो सिर्फ मोक्ष मार्ग पर किए गए कठोर परिश्रम को कहा है और इस लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए वेदों ने बड़ा सुंदर मार्ग दिया है जिस पथ पर चलते हुए मानव मात्र शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से दिनोंदिन उत्कृष्ट व्यक्तित्व को धारण करता चला जाता है और जीवन में स्वयं न्यायोचित मार्ग पर चलते हुए साधक प्राणी मात्र के अंतिम एवं शाश्वत लक्ष्य मोक्ष को सिद्ध करने में समर्थ हो जाता है और यह सिद्धि सिर्फ और सिर्फ निरंतर ध्यान के मार्ग पर बढ़ते हुए ही प्राप्त होती है। इसके अलावा यहां तक पहुंचने का अन्य कोई मार्ग हैं ही नहीं ! माना कि प्रत्येक व्यक्ति की परिस्थिति योग मार्ग पर चलने की नहीं होती किंतु क्या इसका अर्थ यह है कि धर्म अनुयायियों को सत्य से भटका कर असत्य का मार्ग दिखाया जाए। इन पुराणों ने कथा सुनने मात्र से मोक्ष प्राप्ति का सिद्धांत देकर के सनातन धर्म के अनुयायियों के साथ बहुत बड़ा छल किया है। सत्य पथ के स्थान पर अज्ञान का ऐसा झुनझुना सनातन धर्म के अनुयायियों को पकड़ा दिया है जिससे कि सिर्फ और सिर्फ उनका शारीरिक ,मानसिक आध्यात्मिक एवं नैतिक मूल्यों से पतन होता जा रहा है ।इसी भाग्यवादी विचारधारा की वजह से आज सनातन धर्म के अनुयायी कर्म हीनता की ओर अग्रसर हो गए हैं। धर्म अनुयायी यह भी निर्धारित करने में सक्षम नहीं है कि वास्तविक अर्थ में उन्हें करना क्या चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए ? ज्ञान क्या है और अज्ञान क्या है ? धर्म क्या है और अधर्म क्या है ? इसी अज्ञानता युक्त पद्धति की वजह से धर्म अनुयायी नहीं समझ पा रहे हैं कि जो संकट धर्म एवं मानवता पर निरंतर बढ़ता जा रहा है उससे लड़ने के लिए समय रहते कमर कस लें बल्कि उन्हें किसी अवतार के आने की प्रतीक्षा है और यह कभी होगा नहीं क्योंकि इंसान को स्वयं ही अपनी क्षमताओं का विकास करके अन्याय से लड़ने के लिए लोहा लेना पड़ता है। भगवान राम ने रावण को अकेले ही नहीं जीत लिया था उन्होंने भी वानर जाति की सेना बनाई थी। भगवान श्री कृष्ण ने कंस को तो मारा किंतु जरासंध की शक्ति के समक्ष मजबूरी वस मथुरा को छोड़ कर के द्वारिका भागना पड़ा। सीधे युद्ध में स्वयं भगवान श्री कृष्ण जी जरासंध से जीत नहीं पाए । जरासंध मरा किंतु अपने ही घर के अंदर उसके स्वयं के वचन के अधीन होकर ।सोचिए कितना बड़ा न्याय प्रिय योद्धा रहा होगा जो अपने ही घर में मारा गया और संपूर्ण सेना ने कोई प्रत्युत्तर नहीं दिया । हम जिन्हें राक्षस कह कर बुलाते हैं सोच कर देखिए वे कितने न्याय प्रिय एवं वचन के पक्के थे? गिने-चुने अपवादों को छोड़ कर के अधिकांश योद्धा युद्ध में भी पूर्ण नियमों का पालन करते थे । भगवान श्री कृष्ण ने महाभारत को अकेले ही नहीं जीत लिया था पांडवों को स्वयं लड़ करके इस युद्ध को जितना पढ़ा था और उन्होंने इस युद्ध में बहुत कुछ खोया था। वे स्वयं चाहे जीवित रह गए किंतु उनके वंश में भी उनके अलावा कोई जीवित नहीं रहा था। कीमत उन्होंने भी भरपूर चुकाई थी। आज जब नैतिक मानवीय मूल्यों का कोई महत्व ही नहीं है । राक्षसी प्रवृतियां आज नंगा नाच नाच रही है। वर्तमान समय के राक्षस तो इतने निर्दयी हैं कि उन्हें देखकर तो भगवान की भी रूह कांप जाती होगी और यदि यह सब देख कर भी सनातन धर्म के अनुयायियों को कोई प्रेरणा नहीं मिल रही है, उठ खड़े होने का साहस जागृत नहीं हो रहा है कुछ बोलने से पूर्व ही डर सताने लगता है तो इसके पीछे और कोई कारण नहीं सिर्फ और सिर्फ पुराणों के द्वारा दिया गया भगवान के भरोसे बैठे रहने का अज्ञान का अंधकार एवं इसके परिणाम स्वरूप उत्पन्न हुई कायरता ही इसके पीछे मूल कारण है। धर्म के मूल सिद्धांतों का ज्ञान नहीं होना ही मूल कारण है और यह कारण सिर्फ और सिर्फ पुराणों ने उत्पन्न किया है। सिर्फ और सिर्फ पुराणों ने उत्पन्न नहीं किया है।
👏 हे मेरे धर्म के अनुयायियों अभी भी वक्त है समय रहते सजग हो जाओ। वेदों की ओर लौट जाओ क्योंकि ज्ञान के प्रकाश के बिना अज्ञान का अंधेरा नहीं मिटाया जा सकेगा। धर्म अनुयायियों में यदि नई ऊर्जा एवं जोश का संचार किया जा सकता है तो सिर्फ और सिर्फ वेद- उपनिषदों का ज्ञान देकर के ही किया जा सकता है । धर्म के प्रति यदि सच्ची निष्ठा, सच्चा भाव जागृत किया जा सकता है तो सिर्फ और सिर्फ वेद- उपनिषदों का ज्ञान देकर किया जा सकता है। अभी भी वक्त है पुराणों को छोड़ो और वेदों का ज्ञान धर्म अनुयायियों को देना शुरू करो ! फिर देखिए कैसे जनसामान्य का भाव बदलता है...!
- योगाचार्य रामेश्वर हिंदू
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Sunday, February 27, 2022
चार युगों का सत्य
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