https://maa-aadishaktikundaliniyog.in/ 🕉🌞वज्रसूचिकोपनिषद 🌞🕉
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🌞👉 यह उपनिषद सामवेद से संबंधित है ।इसमें कुल 9 मंत्र हैं । इस उपनिषद में चारों वर्णों में से ब्राह्मण की प्रधानता का उल्लेख किया गया है तथा ब्राह्मण कौन है , इसके लिए कई प्रश्न किए गए हैं ।क्या ब्राह्मण जीव है ?शरीर है? जाती है ?ज्ञान है ?कर्म है या धार्मिकता है? इन सब संभावनाओं का निरसन कोई न कोई कारण बताकर कर दिया गया, अंत में ब्राह्मण शब्द की वास्तविक परिभाषा समझाते हुए उपनिषदकार ने वास्तविक अर्थ में ब्राह्मण शब्द को परिभाषित किया है और ब्राह्मणत्त्व मानवता की चर्म पराकाष्ठा है, इस सत्य को समझाया है ।
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🌞👉 अज्ञान नाशक ज्ञान नेत्र वालों के भूषण रूप वज्र सूची उपनिषद का वर्णन करता हूं--
👉 ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं ।इन वर्णों में ब्राह्मण की प्रधानता है ।ऐसा वेद वचन है और स्मृति में भी वर्णित है। अब यहां पर प्रश्न यह उठता है कि ब्राह्मण कौन है? क्या वह जीव है? अथवा कोई शरीर है ? अथवा जाती या कर्म अथवा ज्ञान अथवा धार्मिकता है?
🌞👉 इस स्थिति में यदि सर्वप्रथम जीव को ही ब्राह्मण माने कि ब्राह्मण जीव है तो यह संभव नहीं है क्योंकि भूतकाल और भविष्य काल में अनेक जीव हुए हैं व होंगे ।उनका सब का स्वरूप भी एक जैसा ही होता है । जीव एक होने पर भी स्व स्व कर्मों के अनुसार उनका जन्म होता रहता है और समस्त शरीरों में जीवो में एकत्व रहता है ,इसलिए जीव को ब्राह्मण नहीं कह सकते। 🌞👉 क्या शरीर ब्राह्मण है ?नहीं ,यह भी नहीं हो सकता ! चांडाल से लेकर सभी मानव के शरीर एक जैसे ही अर्थात पंच भौतिक होते हैं ।उनमें जरा -मरण, धर्म -अधर्म आदि सभी समान होते हैं ।ब्राह्मण गौर वर्ण , क्षत्रिय रक्त वर्ण ,वैश्य पीत वर्ण और शूद्र कृष्ण वर्ण वाला ही हो ऐसा कोई निश्चित नियम देखने में नहीं आता तथा यदि शरीर ब्राह्मण है तो पिता के शरीर के दाह संस्कार करने से पुत्र आदि को ब्रह्म हत्या आदि का दोष भी लग सकता है जबकि ऐसा नहीं होता ।अस्तु शरीर का ब्राह्मण होना सिद्ध नहीं होता।
🌞👉 क्या जाति ब्राह्मण है? अर्थात ब्राह्मण कोई जाति विशेष है? नहीं ,यह भी नहीं हो सकता क्योंकि विभिन्न जातियों एवं जंतुओं में भी बहुत से ऋषि-मुनियों की उत्पत्ति वर्णित है जैसे मृगी से श्रृंगी ऋषि की, कुश से कौशिक ऋषि की ,जंबूक से जाम्बूक ऋषि की ,वल्मिक अर्थात बांबी से वाल्मीकि ऋषि की ,मल्लाह अर्थात धीवर कन्या मत्स्यगंधा से वेदव्यास की ,शशक पृष्ठ से गौतम ऋषि की, उर्वशी नामक अप्सरा से वशिष्ठ की ,कुंभ अर्थात कलस से अगस्त्य ऋषि की उत्पत्ति वर्णित है ।इस प्रकार पूर्व में ही कई ऋषि बिना ब्राह्मण जाति के ही प्रकांड विद्वान हुए हैं ,इसलिए जाति विशेष भी ब्राह्मण नहीं हो सकती।
🌞👉 क्या ज्ञान को ब्राह्मण माना जाए ?ऐसा भी नहीं हो सकता क्योंकि बहुत से क्षत्रिय जैसे कि राजा जनक आदि भी परमार्थ दर्शन के महान ज्ञाता हुए हैं ।अस्तु ज्ञान भी ब्राह्मण नहीं हो सकता ।
🌞👉 तो क्या कर्म को ब्राह्मण कहा जाए ?नहीं ऐसा भी संभव नहीं है ,क्योंकि समस्त प्राणियों के संचित ,प्रारब्ध और आगामी कर्मों में साम्य प्रतीत होता है तथा कर्मों से प्रेरित होकर ही व्यक्ति क्रिया करते हैं ।अतः कर्म को भी ब्राह्मण नहीं कहा जा सकता।
🌞👉 क्या धार्मिक व्यक्ति ब्राह्मण हो सकता है ?यह भी सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता क्योंकि क्षत्रिय आदि बहुत से लोग स्वर्ण आदि का दान करते रहते हैं , इसलिए धार्मिक भाव से युक्त व्यक्ति भी ब्राह्मण नहीं हो सकता ।
🌞👉 तब ब्राह्मण किसे माना जाए ?इसका उत्तर देते हुए उपनिषदकार ऋषि कहते हैं-- जो आत्मा के द्वेत भाव से युक्त न हो , जाति गुण और क्रिया से भी युक्त न हो , जो षढ भाव ( शम, दम , उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा , समाधान )इनसे युक्त हो , । जो सत्य ज्ञान आनंद स्वरूप स्वयं निर्विकल्प स्थिति में रहने वाला अशेष कल्पो का आधार रूप समस्त प्राणियों के अंतस में निवास करने वाला ,अंदर-बाहर आकाशवत व्याप्त, अखंड आनंदवान ,अप्रमेय , अनुभव गम्य ,अप्रत्यक्ष भाषित होने वाले आत्मा का करतलवत परोक्ष एवं अपरोक्ष का भी साक्षात्कार करने वाला ,काम -राग, द्वेष आदि दोषों से रहित होकर कृतार्थ हो जाने वाला ,शम-दम आदि से संपन्न मात्सर्य , तृष्णा , आशा ,मोह ,आदि भावों से रहित दंभ ,अहंकार आदि दोषों से चित्त को सर्वथा अलग रखने वाला हो , "वही ब्राह्मण है ।" ऐसा श्रुति ,स्मृति ,पुराण आदि इतिहास का अभिप्राय है। इस अभिप्राय के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार से ब्राह्मणत्व को सिद्ध नहीं किया जा सकता । आत्मा ही सत चित आनंद स्वरूप तथा अद्वितीय है ।इस प्रकार के ब्रह्म भाव से संपन्न मनुष्य को ही ब्राह्मण माना जा सकता है ।इसके अलावा किसी भी व्यक्ति को ब्राह्मण नहीं माना जा सकता ।
👏 भाइयों ,बहनों हमारा सत्य सनातन धर्म पूर्ण वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है। इसमें किसी को भी ऊंचा नीचा दिखाया नहीं गया है किंतु काल कालांतर में पाखंडवाद की छाया ने वर्ण व्यवस्था को विकृत स्वरूप प्रदान कर दिया। यह उपनिषद स्पष्ट रूप से ब्राह्मणत्व की वास्तविक परिभाषा हमें समझा रहा है किंतु शायद इस संसार में इस प्रकार के ब्राह्मण खोज पाना तो अब असंभव हो गया है । ब्राह्मणत्व वर्तमान समय में भारतवर्ष से ही नहीं शायद भूमंडल से विलुप्त होने के कगार पर है। बस धरती मां अपने गर्भ में बीज अवश्य समेट कर रखती है ब्राह्मणत्व अभी भी फिर से भारतवर्ष में अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त करेगा और फिर से सतयुग लौटेगा। वर्तमान में तो ब्राह्मण का अर्थ ही लोगों के द्वारा ढोंगी ,पाखंडी, आडंबर वादी समझा जाता है। हाँ हम सबको प्रयास करके भारतवर्ष में फिर से ब्राह्मणत्व को उसके वास्तविक गौरव के साथ स्थापित करना होगा। जैसे- जैसे ब्राह्मणत्व स्थापित होगा वैसे -वैसे सनातन संस्कृति फिर से अपने चरम शिखर की ओर अग्रसर होती चली जाएगी किंतु यह ब्राह्मणत्व किसी कुल ,गोत्र वंश या जाति विशेष के व्यक्तियों से आगे नहीं बढ़ेगा, यह मानव मात्र के जप ,तप ,ध्यान,दान, एवं साधनात्मक प्रयासों से आगे बढ़ेगा । इस सृष्टि में जितना ब्राह्मणत्व बढ़ेगा उतना ही कल्याणकारी परिदृश्य स्वतः ही दिखाई देने लगेगा। वास्तव में ब्राह्मण कोई शरीर नहीं है। ब्राह्मणत्व तो एक उपलब्धि है जो जीते जी साधक के द्वारा प्राप्त कर ली जाती है। जिसने ब्रह्म को अर्थात परमपिता परमात्मा को जान लिया और उसमें दृढ़ता पूर्वक स्थिर हो गया । जिसके लिए प्राणी मात्र सिर्फ और सिर्फ परमात्मा का स्वरूप है । ऐसा ब्रह्म भाव रखने वाला व्यक्ति ही "ब्राह्मण "है। बाकी सब व्यक्ति अपनी अपनी वृतियों के अनुसार क्षत्रिय ,वैश्य, शूद्र हैं। जिस में कूट-कूट कर लोभ,लालच भरा हुआ है जो धन को ही महत्व देता है ,वह कभी भी ब्राह्मण नहीं हो सकता । जो अपने आप को ऊंचा और बाकी सब को नीचा देखा है वह ब्राह्मण कभी नहीं हो सकता । जो आंतरिक गुणों का परीक्षण न कर सके, जिसके लिए चमडे का बना बाहरी आवरण ही महत्वपूर्ण है, ऐसा व्यक्ति ही चमार है । यही इस उपनिषद का वास्तविक सत्य तत्व दर्शन है।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव (मेरी संपूर्ण पहचान )
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