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Sunday, September 1, 2019

श्वेताश्वरोपनिषद-8

🕉🌞श्वेताश्वरोपनिषद 🌞🕉  
               ⚜️🚩⚜️

👉 ओमकार के द्वारा साधक किस प्रकार उन परमात्मा का साक्षात करें ,इस जिज्ञासा पर आगे कहा जाता है--
🌞👉 अग्नि को प्रकट करने के लिए जैसे दो अरणियों का मंथन किया जाता है ,उसी प्रकार अपने शरीर में परम पुरुष परमात्मा को प्राप्त करने के लिए शरीर को तो नीचे की अरणि बनाना चाहिए और ओंकार को ऊपर की अरणि अर्थात शरीर को नीचे की अरणि की भांति समभाव से निश्चल स्थित कर के ऊपर की अरणि  की भांति ओमकार का वाणी द्वारा जप और मन से उसके अर्थ स्वरूप परमात्मा का निरंतर चिंतन करना चाहिए ।इस प्रकार इस ध्यान रूप मंथन के अभ्यास से साधक को काष्ठ में छिपी हुई अग्नि की भांति अपने हृदय में छिपे हुए परम देव परमेश्वर को देख लेना ,प्रत्यक्ष कर लेना चाहिए।
🌞👉 जिस प्रकार तिलों में तेल , दही में घी ,ऊपर से सूखी हुई नदी के भीतरी स्रोतों में जल तथा अरणियों में अग्नि छिपी रहती है ।उसी प्रकार परमात्मा हमारे हृदय रूप गुफा में छिपे हुए हैं ।जिस प्रकार अपने अपने स्थान में छिपे हुए तेल आदि उनके लिए बताए हुए उपायों से उपलब्ध किए जा सकते हैं ,उसी प्रकार जो कोई साधक विषयों से विरक्त होकर सदाचार ,सत्य भाषण तथा संयम रूप तपस्या के द्वारा साधन करता हुआ  पूर्वोक्त प्रकार से उनका निरंतर ध्यान करता है, उसके द्वारा वे परब्रह्म परमात्मा भी प्राप्त किए जा सकते हैं ।

🌞👉 आत्म विद्या  और तप जिनकी प्राप्ति के मूलभूत साधन हैं तथा जो दूध में स्थित घी की भांति सर्वत्र परिपूर्ण है ,उन सर्वांतर्यामी परमात्मा को वह पूर्वोक्त साधक जान लेता है। वे ही  उपनिषदों में वर्णित परम तत्व ब्रह्म हैं ।वे ही उपनिषदों में वर्णित परम तत्व ब्रह्म है। 
        🌹इति प्रथमअध्यायः 🌹                        
             🚩सत्यमेव जयते 🚩

            ⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
    
              🚩 जय गुरुदेव 🚩    
      ⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

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