🕉🌞श्वेताश्वरोपनिषद 🌞🕉
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👉 तत्व ज्ञानी ऋषि ब्रह्म के विषय में आगे कहते हैं--
🌞👉 ये परम देव ब्रह्म पुरुषोत्तम अपने ही भीतर हृदय में अंतर्यामी रूप में स्थित हैं। इनको जानने के लिए कहीं बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है । इन्हीं को सदा जानने की चेष्टा करनी चाहिए क्योंकि इनसे बढ़कर जानने योग्य दूसरी कोई वस्तु है ही नहीं ।इन एक को जानने से ही सब का ज्ञान हो जाता है। यही सब के कारण और परम आधार हैं। मनुष्य अर्थात जीवात्मा भोक्ता , भोग्य अर्थात प्रकृति और इन दोनों के प्रेरक परमात्मा को जानकर सब कुछ जान लेता है फिर कुछ भी जानना शेष नहीं रहता ।जिनके ये तीन भेद बताए गए हैं ,वे ही समग्र ब्रह्म हैं अर्थात जड़ प्रकृति, चेतन आत्मा और उन दोनों का आधार तथा नियामक परमात्मा-- ये तीनों ब्रह्म के ही रूप हैं ।
👉 इस जानने योग्य ब्रह्म तत्व को जानने का आगे उपाय बताया जाता है--
🌞👉 जिस प्रकार काष्ठ में स्थित अग्नि का रूप दिखाई नहीं देता परंतु इस कारण यह नहीं समझा जाता की अग्नि नहीं है । उसका होना अवश्य माना जाता है क्योंकि उसकी सत्ता मानकर अरणियों का मंथन करने पर उसका अग्नि रूप प्रकट किया जा सकता है। उसी प्रकार उपर्युक्त जीवात्मा और परमात्मा हृदय रूप अपने स्थान में छिपे रहकर प्रत्यक्ष नहीं होते परंतु ओम के जप द्वारा साधन करने पर इस शरीर में ही इनका साक्षात्कार किया जा सकता है -इसमें कुछ भी संदेह नहीं है ।
-- क्रमशः
⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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