🕉🌞श्वेताश्वरोपनिषद 🌞🕉
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👉 ऋषि आत्मा ,परमात्मा एवं प्रकृति का रहस्य समझाते हुए आगे कहते हैं--
🌞👉 यह प्रकृति तो क्षर अर्थात परिवर्तन होने वाली विनाश शील है और इसको भोगने वाला जीव समुदाय अविनाशी अक्षर तत्व है ।इन क्षर और अक्षर अर्थात जड़ प्रकृति व चेतन जीव समुदाय दोनों तत्वों पर एक परम देव परमेश्वर शासन करते हैं। वही प्राप्त करने के योग्य हैं ।उन्हें तत्व से जानना चाहिए ।इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उन परम देव परमात्मा का निरंतर ध्यान करने से उन्हीं में दिन - रात संलग्न रहने से और उन्हीं में तन्मय हो जाने से अंत में यह जीवात्मा उन्हीं को प्राप्त कर लेता है फिर इसकी संपूर्ण माया की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है अर्थात माया मय इस जगत से इसका हमेशा हमेशा के लिए संबंध छूट जाता है ।
🌞👉 परम पुरुष परमात्मा का निरंतर ध्यान करते -करते जब साधक उन परम देव को जान लेता है ,तब इसके समस्त बंधनों का सदा के लिए सर्वथा नाश हो जाता है क्योंकि अविद्या ,अहंकार , राग , द्वेष और मरण भय --इन पांचों क्लेशों का नाश हो जाने के कारण उसके जन्म मरण का सदा के लिए अभाव हो जाता है अतः वह फिर कभी बंधन में नहीं पड़ता ।वह इस शरीर का नाश होने पर तृतीय लोक अर्थात स्वर्ग के सबसे ऊंचे स्तर ब्रह्मलोक तक के बड़े से बड़े समस्त ऐश्वर्य का त्याग करके प्रकृति से वियुक्त होकर सर्वथा विशुद्ध कैवल्य पद को प्राप्त हो पूर्ण काम हो जाता है अर्थात उसे किसी प्रकार की कामना शेष नहीं रहती क्योंकि वह संपूर्ण कामनाओं का फल प्राप्त कर लेता है। वह संपूर्ण कामनाओं का त्याग कर देता है।
-- क्रमशः
⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
Jay Gurudev, outstanding article
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