🕉🌞जाबालदर्शनोपनिषद 🌞🕉
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🌞पंचम खंड 🌞
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👉 इस खंड में नाड़ी शोधन एवं आत्म शोधन की संपूर्ण विधि समझायी गई है --
🌞👉 सांग कृति ने भगवान दत्तात्रेय जी से प्रश्न किया हे ब्रह्मन् ! नाड़ी शोधन की क्या प्रक्रिया है ? यह मुझे ठीक तरह से एवं अति संक्षेप में बताने की कृपा करें;जिससे कि मैं नाड़ी शुद्धि पूर्वक सदां ही परमात्म तत्व का ध्यान करते हुए इस जीवन से मुक्ति प्राप्त कर सकूंँ।
तब भगवान दत्तात्रेय जी ने कहा -- हे सांग कृते! मैं अति संक्षेप में नाड़ी शुद्धि का वर्णन करता हूंँ। शास्त्र आदि के विधि वाक्यों द्वारा जो भी कर्म कहे गए हैं ,उनके प्रति कर्तव्य बुद्धि से संलग्न रहना चाहिए ।कामना एवं फल प्राप्ति के संकल्प को त्याग देना चाहिए ।
🌞👉 योग के यम आदि आठों अंगों का अनुसरण करते हुए शांत एवं सत्य प्रायण रहना चाहिए । अपनी आत्मा के ध्यान में शतत लगे रहना चाहिए तथा ज्ञानी विद्वतजनों की सेवा में उपस्थित होकर उन से भलीभांति शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।
🌞👉 पर्वत शिखर, नदी तट, बिल्व वृक्ष के पास में ,एकांत वन अथवा और अन्य किसी पवित्र एवं सुंदर प्रदेश में आश्रम का निर्माण कर चित्त को एकाग्र करके वहां निवास करें। तत्पश्चात वहां पूर्व या उत्तर की ओर मुंह करके किसी भी आसन से बैठे किंतु ग्रीवा ,मस्तक तथा शरीर को समान भाव से रखकर मुख बंद किए हुए ठीक प्रकार से स्थित हो जाएं ।नासिका के अग्रभाग पर अर्थात भृकुटी पर चंद्र मंडल की भावना करनी चाहिए तथा वहां ओमकार रूप प्रणव के बिंदु में तुर्य रूप परमात्म तत्व को अमृत का स्रोत बहाते हुऐ बंद आंखों के द्वारा प्रत्यक्ष देखना चाहिए ।उस समय चित्त को पूर्ण रूप से एकाग्र रखना चाहिए।
👉 इसके पश्चात इड़ा नाड़ी के द्वारा अर्थात नासिका के बाएं छिद्र से प्राणवायु को आकृष्ट करके उदर में ग्रहण कर लेना चाहिए और इस शरीर के बीच में प्रतिष्ठित जो अग्नि तत्व है ,उसी का चिंतन करते हुए ऐसा भाव ग्रहण करना चाहिए कि उस वायु का सानिध्य प्राप्त करके अग्निदेव ज्वाला सहित मानो प्रज्वलित हो उठे हों । इसके पश्चात प्रणव के बिंदु एवं नाद से संयुक्त होकर अग्नि बीज ' रं 'का चिंतन करना चाहिए । इसके बाद श्रेष्ठ साधक पिंगला नाड़ी अर्थात नासिका के दक्षिण छिद्र के द्वारा प्राण वायु को विधिपूर्वक धीरे-धीरे बहिर्गमन करें। फिर पिंगला नाड़ी के माध्यम से पहले की भांति प्राणवायु को अपने अंदर धारण करके अग्नि बीज का चिंतन करना चाहिए । इस प्रकार प्रतिदिन त्रिकाल संध्या के समय इस क्रिया को करने से साधक की नाड़ी शुद्ध एवं पवित्र हो जाती है।
👉 इस नाड़ी शुद्धि के पृथक चिन्ह भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं-- शरीर हल्का हो जाता है ,जठराग्नि तीव्र हो उठती हैं और अनाहत नाद की अभिव्यक्ति होने लगती है ।ये लक्षण ही सिद्धि के प्राकट्य का बोध कराते हैं। जब तक ये लक्षण दिखाई न दें तब तक इसी तरह अभ्यास करते रहना चाहिए।
👏 साधक के दो शब्द-- साधक भाइयों बहनों ! महायोगी भगवान दत्तात्रेय ने यहां पर आश्रम बनाने के संबंध में जो ज्ञान दिया है ,वह वर्तमान परिस्थितियों में जनसामान्य के लिए संभव नहीं है ,इसलिए जो जहां पर जैसे रह रहा है , वहीं पर ही उसी स्थिति में हम सबको अभ्यास करना चाहिए । समय काल की परिस्थितियां अलग अलग होती है और उसी अनुरूप हमें हमारी परिस्थितियों को समझ कर के साधना पथ पर आगे बढ़ना चाहिए। जिस प्रकार से भोजन हमारी मूलभूत आवश्यकता है ,उसी प्रकार से नियमित योगाभ्यास भी हमारे जीवन की मूलभूत आवश्यकता है क्योंकि हमारा वास्तविक स्वरूप क्या है ?इस प्रश्न का जवाब हमें सिर्फ और सिर्फ योग मार्ग पर चलने पर ही मिल सकता है। साथ ही प्रत्येक व्यक्ति के शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिए योग अत्यंत आवश्यक पद्धति है। योग पथ मानव मात्र को सर्वांगीण विकास का मार्ग दिखाता है अतः मानव मात्र को योग पथ पर चलना चाहिए और योग का वास्तविक स्वरूप समझकर हम सबको मानव मात्र को इसके लिए प्रेरित करना चाहिए। योग सबके लिए है ।योग आसन प्राणायाम ही नहीं है !! योग ध्यान भी है ,योग मंत्र जप भी है ,योग नादानुसंधान भी है ,आत्मज्ञान की हर पद्धति योग की ही पद्धति है । किसी भी मार्ग से आत्म अनुसंधान अर्थात् परमात्मा से एकात्मकता स्थापित की जाए । मार्ग चाहे कोई भी हो किंतु जिस मार्ग से आत्म ज्ञान मिलता है --वह हर मार्ग"योग "ही है।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
(मेरी संपूर्ण पहचान )
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