🕉🌞गोरख वाणी और गोरख योग 🌞🕉
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🌞 👉केता आवे केता जाई ,केता मांगै केता खाई।
केता रूप विरष तलि रहे ,गोरष अनभै कासौ कहै।।
🌞 महायोगी गुरु गोरखनाथ कह रहे हैं-- कि कितने ही जीव बराबर आते जाते रहते हैं ,कितनों ने मांगना खाना को ही योग समझ रखा है और कितनों ने बस्ती से अलग पेड़ों के नीचे रहना ही योग समझ रखा है । सब इस प्रकार की तथ्यहीन बातों में उलझे हुए हैं ।गोरख अभय ज्ञान कहे तो किससे कहें क्योंकि साधक बाहरी क्रियाओं को ही योग समझे हुए हैं।
👉 आगे महायोगी गुरु गोरखनाथ विद्वान पंडित जनों को संबोधित करके कहते हैं--- हे पंडित चलो जिसको तुमने पढ़ कर देखा है ,उस सार ज्ञान को रहकर भी देखो ।केवल पढ़ना ही काफी नहीं है ,सीखे को साधना भी करनी चाहिए ।पार उतरना कोरे पुस्तकीय ज्ञान से संभव नहीं है !अपने साधनात्मक कृत्य से ही संभव है । महायोगी कह रहे हैं कि मैं किसको साक्षी दूँ कि घट घट में ब्रह्म की ज्योति जगमगा रही है । इस प्रकाश के अपने भीतर स्थित होने पर भी पशु तो आँख रहते ही नहीं देखता है ।
🌞👏 साधक के दो शब्द-- यहां पर महायोगी गुरु गोरखनाथ संसार में विचरण कर रहे अज्ञानीयों को उस सत्य से रूबरू करवा रहे हैं जो परमात्मा के वास्तविक ज्ञान की ओर इशारा करता है । वर्तमान समय ही नहीं प्राचीन काल से ही अध्यात्म के नाम पर पाखंडवाद एवं आडंबर वाद का बोलबाला रहा है और यह पाखंडवाद एवं आडंबरवाद महायोगी गुरु गोरखनाथ के काल में भी व्याप्त था ,जिस पर से महायोगी गुरु गोरखनाथ अज्ञानता का आवरण हटा रहे हैं।योग के नाम पर किस प्रकार से समाज में लोगों ने बाहरी आडंबर को ही साधना समझ लिया ।उस सत्य को महायोगी समझा रहे हैं। साथ ही ऐसे व्यक्ति जो पुस्तकों को तोते की तरह रट लेते हैं किंतु ग्रंथों में लिखे हुए ज्ञान को अपने जीवन में उतारते नहीं ,जो साधना की वास्तविक पद्धति ग्रंथों में समझा रखी है ,उस अनुसार साधना करते नहीं । ऐसे पंडित लोगों को महायोगी गुरु गोरखनाथ सत्य का मार्ग दिखा रहे हैं और कह रहे हैं कि घट घट में उस सत्य स्वरूप परमात्मा का ज्योति स्वरूप जगमगा रहा है किंतु जो मूर्ख अज्ञानी हैं ,वे पशुओं के समान उस सत्य को आंखें होते हुए भी साधना करके देखना नहीं चाहते क्योंकि बिना साधना के उस ज्योति स्वरूप का कोई भी साक्षात्कार नहीं कर सकता ,जान नहीं सकता ,बौद्ध प्राप्त नहीं कर सकता और जब तक स्वयं साधना करके उस सत्य को कोई जान नहीं लेता ,तब तक चाहे कितने ही ग्रंथों को रट लो और बाहरी रूप से कितना ही ढोंग ,पाखंड ,आडंबर का आचरण कर लो। किसी भी प्रकार से किसी का हित संधान होने वाला नहीं है, इसलिए जिस किसी भी व्यक्ति को अपना आत्म कल्याण चाहिए ।उसके लिए सिर्फ और सिर्फ एक ही मार्ग है - "विज्ञान सम्मत तरीके से निरंतर साधना मार्ग पर आगे बढ़ना "। चरेवेति -चरेवेति -चरेवेति (चलते रहो !चलते रहो !चलते रहो )बस एक न एक दिन हम वहां पर निश्चित ही पहुंच जाएंगे ,जहां पर उस सत्य स्वरूप परमपिता परमात्मा एवं मां आदिशक्ति के वास्तविक विराट स्वरूप का आत्म साक्षात्कार होगा।
⚜️🚩👏 ज्योतिष विज्ञान पर आधारित वर्ण व्यवस्था के स्थान पर पाखंड वादी जातिवाद ; सनातन धर्म के लिए अभिशाप है , मानव मात्र के कल्याण के लिए इससे मुक्त होना ही होगा।
सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
( मेरी संपूर्ण पहचान)
🚩इति श्री गोरख वाणी🚩
⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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