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Wednesday, August 14, 2019

सभी आध्यात्मिक प्रश्नों का हल एक स्थान पर...!?

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❓ सभी आध्यात्मिक प्रश्नों का हल----
🕉🌞निरालंबोपनिषद 🌞🕉

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🌞 यह उपनिषद् शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित है ।इस उपनिषद में ब्रह्म ,ईश्वर, जीव , प्रकृति, जगत, ज्ञान ,कर्म आदि का सुंदर विवेचन किया गया है ।निर्विकार ब्रह्म जब प्रकृति के साथ सृष्टि का सृजन करके उसका शासन संचालन करता है तो ईश्वर कहलाता है । इसी प्रकार विभिन्न संबंधों को परिभाषित किया गया है ।ऋषि जाति-पाति संबंधी  संशय का निवारण करते हुए कहते हैं कि वह आत्मा रक्त ,चमड़ा, मांस, हड्डियों आदि से संबंधित नहीं है। वह तो व्यवहार के क्रम में कल्पित व्यवस्था मात्र है।  इसी प्रकार अहंता, ममता आदि को त्यागकर इस्ट में समर्पित हो जाने को संन्यास कहते हैं ।उन्ही पुरुषों को मुक्त ,पूज्य ,योगी ,परमहंस आदि उपाधियों से विभूषित होने
की बात समझाई गई है ।ऐसी स्थिति प्राप्त करके ही साधक जन्म मरण के बंधनों को काट सकता है।

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🌞👉 उस कल्याणकारी गुरू, सत चित और आनंद की मूर्ति को नमस्कार है ।उस निष्पक्ष ,शांत आलंबन रहित तेज स्वरुप परमात्मा को नमन है ।जो निरालंब का आश्रय ग्रहण करके सांसारिक आलंबन का परित्याग कर देता है ।वह योगी और सन्यासी है ।वही मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी है ।
🌞👉 इस संसार के अज्ञानी जीवो के सभी कष्टों को शांत करने के निमित्त जो जो ज्ञान आवश्यक है ।उसकी आशंका करके मै उसके उत्तर के रूप में  यहां पूछता हूंँ, कहता हूंँ।
🕉🌞👉 ब्रह्म क्या है ?ईश्वर कौन है ?जीव कौन है ?प्रकृति क्या है ?परमात्मा कौन है ?ब्रह्मा कौन है ?विष्णु कौन है? रुद्र कौन है ?इंद्र कौन है ?यम कौन है ?सूर्य कौन है ?चंद्र कौन है ?देवता कौन है ?असुर कौन हैं ?पिशाच कौन है? मनुष्य क्या है ?स्त्रियां क्या है? पशु आदि क्या है ?स्थावर जड़ क्या है ? ब्राह्मण आदि क्या है ?जाति क्या है ? कर्म क्या है? ज्ञान और अज्ञान क्या है ? सुख-दुख क्या है ?स्वर्ग नर्क क्या है ? बंधन और मुक्ति क्या है ?उपासना करने योग्य कौन है ?शिष्य कौन है ? विद्वान कौन है ?मूर्ख कौन है ?  असुरता  क्या है ? तप  क्या है ? परम पद किसे कहते हैं ?ग्रहणीय और  अग्रहणीय  क्या है ? सन्यासी कौन है ?इस प्रकार शंका व्यक्त करके  ऋषि ने ब्रह्मादि का स्वरूप विवेचित किया।
👏साधक के दो शब्द --यह उपनिषद् किस ऋषि द्वारा लिखा गया है ,यह तो  स्पष्ट नहीं है किंतु इस उपनिषद का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण है। आत्मज्ञान की राह में बढ़ने वाले साधक के समक्ष जो भी प्रश्न आते हैं । उन समस्त प्रश्नों का इस उपनिषद में  पूर्ण सत्य आधारित हल  प्रस्तुत किया गया है। आप सभी के मन में भी इनमें से बहुत से प्रश्न हो सकते हैं निश्चित रूप से यह उपनिषद् अधिकांश जिज्ञासाओं का निवारण कर देगा।
🌞👉 महर्षि ने विभिन्न प्रश्नों की कल्पना करके संपूर्ण प्रश्नों का उचित समाधान  प्रस्तुत किया है।
❓ ब्रह्म क्या है?
🌞👉  बुद्धि ,अहंकार, पृथ्वी, जल ,अग्नि ,वायु, आकाश स्वरूप वृहत ब्रह्मांड कोष वाला ,कर्म और ज्ञान से प्रतिभासित होने वाला ,अद्वितीय ,संपूर्ण नाम रूप आदि उपाधियों से रहित, सर्वशक्ति संपन्न, आदि एवं अंतहीन ,शुद्ध ,शिव ,शांत,निर्गुण और अनिर्वचनीय ,चैतन्य स्वरूप तत्व परब्रम्ह कहलाता है ।
❓ ईश्वर क्या है?
👉अब ईश्वर के स्वरूप का कथन करते हैं --यही ब्रह्म जब अपनी प्रकृति के सहारे संपूर्ण लोकों का सृजन करता है  और अंतर्यामी रूप से उस में प्रविष्ट होकर ब्रह्मा ,विष्णु और महेश के रूप में रजोगुण ,सतोगुण एवं तमोगुण के रूप में विद्यमान होकर बुद्धि और इंद्रियों को नियंत्रित करता है तब उसे ईश्वर कहते हैं।
❓ जीव क्या है?
🌞👉 जब इस चैतन्य स्वरुप ईश्वर को ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश  आदि नामों और रूपों के द्वारा त्रिगुण से ग्रस्त होकर देह का मिथ्या अभिमान हो जाता है कि मैं स्थूल शरीर हूंँ तब उसे जीव कहते हैं ।यह चैतन्य सो अहम स्वरुप में एक होने पर भी ,शरीरों की भिन्नता के कारण जीव  अनेक प्रकार से बन जाता है।
❓ प्रकृति क्या है?
🌞👉 जो ब्रह्म के सानिध्य से चित्र विचित्र संसार को रचने की शक्ति वाली है तथा ब्रह्म की बुद्धि रूपा शक्ति है ।उसे ही प्रकृति कहते हैं ।
❓ परमात्मा कौन है?
👉 देह आदि से परे रहने के कारण  ब्रह्म को ही परमात्मा कहते हैं ।
   ❓❓❓❓⁉
🌞👉 यह परमात्मा ब्रह्मा , विष्णु, महेश, इंद्र , यम, सूर्य ,चंद्र आदि देवताओं के रूप में ,यही  असुर, पिशाच, नर -नारी और पशु पक्षी आदि के रूप में प्रकट होता है ।यही जड़ पदार्थ और ब्राह्मण, क्षत्रिय ,वैश्य ,शूद्र भी है ।
🌞👉 यह संपूर्ण ब्रह्मांड  ब्रम्ह ही है । इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है ।
❓ जाति क्या है?
   👉 जाति शरीर के चर्म ,रक्त, मांस ,अस्थियों और आत्मा की नहीं होती ।इसकी  परिकल्पना तो केवल व्यवहार के निमित्त की गई है।
👉 ऋषि यहां स्पष्टता से कहते हैं कि जाति शरीर भेद से नहीं व्यवहार भेद से निर्धारित की गई है ।
🌞👉 इंद्रियों के द्वारा की जाने वाली क्रियाओं को कर्म कहते हैं जिस क्रिया को  अध्यात्म  निष्ठा से भावपूर्वक  किया जाता है ।वही कर्म है। कर्तापन और  भोक्ता पन के अहंकार के द्वारा फल की इच्छा से किए गए बंधन स्वरूप- नित्य नैमित्तिक यज्ञ, व्रत, तप,  दान आदि कर्म अकर्म कहलाते हैं।
🌞👉 सृष्टि की सभी बदलने वाली वस्तुओं में एक ही अपरिवर्तनशील चेतन तत्व विद्यमान है ,अन्य कुछ भी नहीं है, द्रष्टा और दृश्य जो कुछ भी है ,सब कुछ चेतन तत्व ही है । सबके अंदर यह चेतन तत्व ही विद्यमान रहने पर भी ऐसा प्रतीत होता है मानो वह घट वस्त्र आदि रूप में ही परिवर्तित हो गया है । इसी साक्षात्कार की अनुभूति को ज्ञान कहते हैं ।यह अनुभूति शरीर और इंद्रिय आदि पर नियंत्रण रखने से  और सद्गुरु की उपासना (नजदीक बैठना ) उपदेशों के श्रवण ,चिंतन -मनन और निदिध्यासन करने से होती है।
🌞👉 जिस प्रकार रस्सी में सर्प की भ्रांति होती है ,उसी प्रकार सब में विद्यमान ब्रह्म और देव, पशु- पक्षी ,मनुष्य ,स्थावर ,स्त्री -पुरुष, वर्णाश्रम ,बंधन -मुक्ति आदि सभी अनात्म वस्तुओं में भेद मानना ही अज्ञान है।
🌞👉 अनात्म (नश्वर )विषयों का चिंतन करना दुख कहलाता है।
🌞👉 सत्  (अनश्वर )का समागम ही स्वर्ग है अर्थात सत्पुरुषों का संग ही स्वर्ग है। नश्वर संसार के विषयों में रचे-बसे लोगों का संसर्ग ही नर्क है ।
🌞👉 अविद्या की वासना द्वारा उत्पन्न इस प्रकार का विचार कि मैं हूंँ ,यही बंधन है ।
🌞👉 माता -पिता , भ्राता ,पुत्र गृह ,उद्यान ,खेत ,पत्नी-पुत्र आदि मेरे अपने हैं ।यह सांसारिक विचार भी बंधन ही हैं ।
🌞👉 कर्तापन के अहंकार का भाव भी बंधन रूप है।
🌞👉 अणिमा ,महिमा,  गरिमा , प्राप्ति ,प्राकाम्य ,ईशित्व , और वशित्व ये  अष्ट सिद्धियां एवं ऐश्वर्य प्राप्त करने का संकल्प भी बंधन युक्त है ।
👉 क्योंकि यदि योगी इस जन्म में इन सिद्धियों को प्राप्त नहीं कर सका तो अगला जन्म निश्चित ही मिलेगा और यदि इन सिद्धियों में उलझ कर रह गया तो फिर बारंबार आवागमन निश्चित है।
🌞👉 मनोकामना की पूर्ति के संकल्प पूर्वक की गई देवताओं या मनुष्यों की उपासना भी बंधन युक्त है।
🌞👉 यम नियम से युक्त योग का संकल्प भी बंधन युक्त है।
🌞👉 वर्ण और आश्रम आधारित धर्म-कर्म के संकल्प भी बंधन स्वरूप है।
🌞👉 आज्ञा  भय, संशय आदि आत्म गुणों के संकल्प भी बंधन युक्त है ।
⚜🚩👉 जब नित्य और अनित्य वस्तुओं के विषय में विचार करने से नश्वर संसार के सुख एवं दुखात्मक सभी विषयों से ममता रूपी संपूर्ण बंधन नष्ट हो जाएं ,आसक्ति समाप्त हो जाए ,उस स्थिति को मोक्ष कहते हैं ।
👉 अर्थात ऋषि के अनुसार किसी भी शास्त्रोक्त कर्म को करना बंधन नहीं है ।उस कर्म के साथ जुड़ा हुआ भाव एवं आसक्ति बंधन का मूल कारण है । अनासक्त भाव से किया गया कोई भी कर्म करने वाले को बंधन युक्त नहीं करता । जिस किसी भी कार्य को यदि हम कर रहे हैं और उसका प्रभाव हमारे मन पर पड़ रहा है तो निश्चित रुप से वह कार्य हमें बंधनयुक्त करेगा क्योंकि यहां से आसक्ति उत्पन्न होती है। जहां आशक्ति है वहां पर मुक्ति नहीं । दृष्टा भाव ही एकमात्र मुक्त अवस्था है ।
❓ उपास्य कौन है?
👉 समस्त शरीरों में स्थित चैतन्य स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त कराने वाला गुरु ही  उपास्य (नजदीक बैठने योग्य )है ।
❓ शिष्य कौन है?
👉 जिसके हृदय में विद्या द्वारा नष्ट  हुए जगत के अवगाहन से उत्पन्न ब्रह्म रूप ज्ञान शेष रहे ,वही शिष्य है ।
❓ विद्वान कौन है?
  👉 सबके अंतर में स्थित आत्म तत्व के विज्ञानमय स्वरूप को जानने वाला ही विद्वान है।
❓ मूर्ख कौन है?
👉 कर्त्तापन आदि के भाव में आरूढ व्यक्ति ही मूढ अर्थात मूर्ख है।
❓ आसुरी तप क्या है?
👉 जो ब्रह्मा विष्णु महेश  और  इंद्र आदि देवताओं के ऐश्वर्य की कामना पूर्वक व्रत, जप, यज्ञ आदि में अंतर आत्मा को तपाये  तथा अति उग्र राग, द्वेष, हिंसा आदि दुर्गुणों से युक्त होकर जो तप  करें, वह आसुरी तप कहलाता है ।
❓ वास्तविक तप क्या है?
👉 ब्रह्म सत्य है  और जगत मिथ्या है, इस प्रकार के प्रत्येक्ष ज्ञान से ब्रह्मा आदि देवों के ऐश्वर्य प्राप्त करने के संकल्प बीज को  जला डालना ही वास्तविक तप  कहा गया है ।
❓ परम पद क्या है?
👉 प्राण ,इंद्रिय ,अंतःकरण आदि से भिन्न सच्चिदानंद स्वरूप और नित्य मुक्त ब्रह्म का स्थान 'परम पद 'कहलाता है ।
❓ ग्रहण करने योग्य क्या है ?
👉  देश काल वस्तु की मर्यादा से परे चिन्मात्र स्वरूप जो कुछ है , वही ग्रहण करने योग्य है ।
❓ अग्राह्य क्या है ?
👉  निज स्वरूप से परे माया द्वारा कल्पित और बुद्धि द्वारा इंद्रिय गम्य जगत की सत्यता का चिंतन करना अग्राह्म है ।
❓ सन्यासी ,मुक्त ,पूज्य ,योगी परमहंस ,अवधूत और ब्राह्मण कौन है ?
👉  जो समस्त कर्मों में ममता एवं अहंकार का  परित्याग करके ब्रह्म की शरण में जाकर और तू वही है ,'मैं ब्रह्म हूंँ, 'जो कुछ भी यह है ,सब कुछ निश्चित ही ब्रह्म  ही है, ब्रह्म के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, आदि इन महा वाक्यों द्वारा 'मैं ब्रह्म हूंँ । इस प्रकार का निश्चय करके निर्विकल्प समाधि में लीन रहकर परम स्वतंत्र और यति स्वरूप होता है ,वह पुरुष ही सन्यासी कहलाता है ,वही मुक्त पूज्य ,योगी ,परमहंस ,अवधूत और ब्राह्मण कहलाने योग्य होता है ।   
👏 इस प्रकार यह  अत्यंत महत्वपूर्ण निरालंबोपनिपद अध्यात्म जगत से जुड़े हुए समस्त प्रश्नों का पूर्ण सत्य आधारित हल प्रस्तुत करता है। निश्चित ही इन प्रश्नों में से बहुत सारे प्रश्न आपके मन मस्तिष्क में घूमते होंगे और यह उपनिषद आपके उन समस्त प्रश्नों का आपको सही सही जवाब दे रहा है । 

           ⚜️ 🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️

   ⚜️ मांँ आदिशक्ति कुंडलिनी योग, झालरापाटन ⚜️

            ⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️

       ⚜️🚩जय मांँ आदिशक्ति 🚩⚜️

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