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Monday, July 8, 2019

मन से पार साकार से जा सकते हैं या निराकार से!!?

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❓ मन से पूर्णतया पार जाने के लिए साकार उपासना सहायक है या निराकार?
                                  - कुलदीप गुर्जर

https://maa-aadishaktikundaliniyog.in/
🕉🌞 कुलदीप जी जय मां आदिशक्ति ! वेद, उपनिषद ,षड्दर्शन एवं आगम शास्त्र के अनुसार और मैंने अब तक जो अनुभव किया है, उसके अनुसार सत्य यह है कि हम यदि किसी भी प्रकार के आकार की कल्पना करते हैं तो चाहे साधना के कितने ही ऊंचे स्तर पर चले जाएं ,हम मन से परे नहीं जा सकते । हम तीन गुणों से परे नहीं जा सकते। जब तक आकार जीवित है, तब तक मन भी जीवित है और जब तक मन जीवित है,तब तक ब्रह्म का संपूर्ण स्वरूप नहीं जाना जा सकता। आप निर्विकल्प ,निर्विचार अवस्था को तभी प्राप्त करेंगे, जब आप पूर्णतया आकार हीन  निराकार ब्रह्म की उपासना करेंगे । स्वामी रामकृष्ण परमहंस वर्षों से मां काली की उपासना कर रहे थे  और माँ काली उनके चिंतन में साक्षात प्रकट होती थी, 

 किंतु एक बार तोतापुरी जी महाराज आकर स्वामी जी से कहते हैं कि तू मुझे गुरु रूप में स्वीकार कर मैं तुझे आत्मज्ञान की दीक्षा देने के लिए आया हूंँ तो स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहते हैं कि मुझे किसी गुरु की आवश्यकता कहां है? मैं तो स्वयंसिद्ध हूंँ ! मांँ आदिशक्ति का स्वयं साक्षात्कार करता हूंँ। जब तोतापुरी जी महाराज उन्हें समझाते हैं तो स्वामी जी कहते हैं कि मैं मांँ काली से पूछूंगा । स्वामी जी साधना में बैठते हैं ,मां काली का आह्वान करते हैं और मांँ काली स्वामी जी से वार्तालाप करती है। स्वामी जी पूछते हैं- तोतापुरी जी महाराज मुझे शिष्य बनाने के लिए आए हैं, तो माँ मुझे शिष्य बनने या गुरु बनाने की कहां आवश्यकता है? मुझे तो पहले से ही आपका सत्य ज्ञान एवं दिव्य साक्षात्कार प्राप्त हो चुका है,  तब मां काली कहती है - "तुम्हें तोतापुरी  महाराज को गुरु रूप में स्वीकार करना चाहिए क्योंकि वास्तविक तत्वज्ञान तुम्हें वे ही सिखाएंगे क्योंकि तुम्हें अभी वास्तविक तत्व ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ है।" कहने का अर्थ यह है कुलदीप जी -यदि हम आकार को माध्यम बनाकर साधना करते हैं तो हमारे ध्यान की ऊर्जा उस आकार को पूर्णतया साकार बना देगी! वह आकार हमारे समक्ष पूर्णतया जीवंत एवं क्रियाशील हो जाएगा किंतु वह आकार ब्रह्म का वास्तविक स्वरुप नहीं है क्योंकि वह मन की कल्पना है,मन के द्वारा गढ़ा गया है ।  पृथ्वी, जल ,अग्नि, वायु, आकाश ,मन, बुद्धि ,अहंकार  ये  जीव आत्मा का दृष्टिगोचर होने वाला भौतिक  स्वरूप है । ये सभी मां आदिशक्ति प्रकृति के ही तत्व हैं । जब तक इन 8 तत्वों में से एक भी तत्व जीवित है तब तक मानव आत्मा ,जीवात्मा ही रहेगा  और जैसे ही इन 8 तत्वों से जीवात्मा मुक्त हो जाता है तो फिर वह आत्मा साक्षात परमात्मा बन जाती है। यहां पर परमात्मा बनने का अर्थ है परमात्मा  के गुणों को अपने अंतस में धारण कर लेना। यहां पहुंच कर शुद्ध निर्विकल्प अवस्था प्राप्त होती है ।कोई विचार नहीं ,कोई चिंतन नहीं, कोई आकार नहीं । पूर्ण निराकार । इसलिए ब्रह्म का वास्तविक स्वरुप तो निराकार ही है किंतु वह ब्रह्म साकार भी है,यदि हम उसे साकार मानेंगे ।यदि हम उसे साकार में देखेंगे तो वह साकार में भी है क्योंकि वह तो कण-कण में है।ऐसा कोई स्थान ही नहीं जहां पर वह विद्यमान नहीं ? जहां तक बात है विभिन्न तीर्थ स्थानों की तो वहां पर धार्मिक कार्यक्रम होते हैं । बहुत से लोग जाकर उस प्रतिमा में ईश्वर का भाव देखते हैं ।ईश्वर के रूप में उस प्रतिमा को देखते हैं तो उस प्रतिमा के अंदर आत्म शक्ति के प्रभाव से जीवंतता बढ़ती जाती है ,प्राण शक्ति बढ़ती जाती है । जहां पर भावना जीवंत है ,वहां पर परमात्मा को अपना स्वरूप निश्चित रूप से प्रकट करना ही पड़ता है। किंतु जब योग साधना के माध्यम से उस परम चेतना को हम अपने अंदर ही देखते हैं, एहसास करते हैं कि वह दिव्य ऊर्जा मेरे अंदर है तो धीरे-धीरे वह ऊर्जा हमारे शरीर में जागृत होने लगती है और हमारी चेतना ब्रह्मांड व्यापी विस्तार ग्रहण करती जाती है । आप मंदिर जाओगे तो भिखारी बनकर याचना करने के लिए किंतु यदि आप अपने शरीर के अंदर जाओगे तो आप स्वयं दाता बन जाओगे  आप स्वयं के ही नहीं दूसरों के भी दुखों को दूर कर सकते हो ।आप स्वयं ही जागृत नहीं होंगे दूसरों को भी जागृत कर पाओगे। इसलिए यदि ईश्वर की प्राण प्रतिष्ठा करनी है तो अपने व्यक्तित्व को उज्जवल बनाओ । अपने व्यक्तित्व से इनतत्वों को निकाल कर बाहर करो, जो प्रकृति से जुड़े हुए हैं ।पृथ्वी ,जल ,अग्नि, वायु ,आकाश ,मन ,बुद्धि, अहंकार ।जैसे जैसे हम इन से मुक्त होते जाएंगे वैसे वैसे हमारी आत्मचेतना विराट का अस्तित्व धारण करती जाएगी ।फिर एक समय ऐसा आता है जब हम प्रकृति से परे चले जाते हैं और हमारा संकल्प सिद्ध होने लगता है ।हमारे विचार ब्रह्मांड में कार्य करने लगते हैं और यह संसार हमारे सकारात्मक संकल्प से सुंदर आकार ग्रहण करने लगता है ।यह ब्रह्म का जागृत स्वरुप है ।हमने अपने आपको शून्य में पहुंचा कर इस प्रकृति को नया आयाम देना शुरू कर दिया। यह स्थिति कुछ भी नहींं करके बहुत कुुुछ कर पाने की है।

            -- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव

                        ( मेरी संपूर्ण पहचान  ) 


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