🕉🌞गोरख वाणी 🌞🕉
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🌞👉 अहंकार को तोड़ना चाहिए, निराकार आत्मा को प्रस्फुटित करना चाहिए ।जैसे भू पृष्ठ को तोड़कर अंकुर बाहर निकलता है ,उसी प्रकार अहंकार को तोड़कर आत्मा प्रस्फुटित होती है ।जहां गंगा अर्थात इड़ा ,जमुना अर्थात पिंगला का पानी सोख लिया गया अर्थात दोनों का प्रभाव मिटाकर सुषुम्ना में मिला लिया गया तथा सहस्रारस्थ चंद्रमा और मूलाधारस्थ सूर्य दोनों का विरोधी स्वभाव मिटाकर सम्मुख कर दिया गया जिससे अमृत का स्राव नष्ट नहीं होने पाया ।हे अवधूत !वहां की पहचान अथवा लक्षण बताओ ?
👏 साधक के दो शब्द-- यहां पर महायोगी गुरु गोरखनाथ कह रहे हैं कि अहंकार को तोड़ना चाहिए अर्थात योगी को अपने अहंकार को समाप्त करना चाहिए क्योंकि जब अहंकार मिटता है तभी निर्विकार आत्मा अपने संपूर्ण अस्तित्व को प्रकट कर पाती है । अहंकार समाप्त होने पर ही शुद्ध चैतन्य आत्मा अपने वास्तविक प्रकाश को प्रकाशित कर पाने में समर्थ होती है ।जब तक अहंकार साधक के मन मस्तिष्क में कायम रहता है तब तक आत्मा के वास्तविक प्रकाश का साधक अनुभव प्राप्त नहीं कर पाता । इसलिए यदि किसी भी साधक को अपनी आत्मा के वास्तविक स्वरुप को जानना है तो उसे अहंकार को समाप्त करना चाहिए,तभी आत्मा के वास्तविक प्रकाश का पूर्ण स्वरूप प्रकट हो पाएगा। साधक जितना निर्मल मन होगा ,जितना छल, कपट, राग ,द्वेष ,पाखंड, झूठ आदि से मुक्त होगा ।आत्मा का प्रकाश उतना ही अधिक स्पष्टता से प्रकट होगा। आगे महायोगी गुरु गोरखनाथ कहते हैं कि जब इड़ा और पिंगला नाड़ी को सम करके सुषुम्ना में प्राण का प्रवाह किया जाता है एवं सहस्रार स्थित चंद्रमा और मूलाधार स्थित सूर्य की ऊर्जा के विरोधी स्वभाव को मिटा कर सम्मुख कर दिया जाता है तो इससे अमृत का स्राव नष्ट नहीं होने पाता। यहां पर महायोगी गुरु गोरखनाथ एक प्रश्न छोड़ देते हैं कि हेअवधूत !उस स्थिति की पहचान या लक्षण बताओ?? महायोगी गुरु गोरखनाथ ने इस प्रश्न को समझाया भी नहीं , स्पष्ट भी नहीं किया और यह प्रश्न अपने आप में पहेली बनकर उपस्थित है! बड़ा ही महत्वपूर्ण प्रश्न है यह और गूढ रहस्य से सराबोर । सहस्रार चक्र विचारों का केंद्र है और मूलाधार चक्र ऊर्जा का केंद्र है ।सहस्रार चक्र से निरंतर विचार उत्पन्न होते रहते हैं और मूलाधार चक्र एवं स्वाधिष्ठान चक्र से निरंतर काम ऊर्जा उत्पन्न होती रहती है । यह ऊर्जा कामोत्तेजना के रूप में प्रत्येक व्यक्ति के अंदर उत्पन्न होकर मस्तिष्क को इसकी आगोश में ले लेती है ।विचारों को अपनी क्रियाशीलता से प्रभावित करती है। यह ऊर्जा निरंतर बाहर निकलना चाहती है। इस सृष्टि का अधिकांश क्रियाकलाप इसी एक ऊर्जा के द्वारा संचालित है। मूलाधार चक्र की ऊर्जा बाहर निकल रही है और इस सृष्टि को आगे बढ़ा रही है अर्थात सर्जन कर रही है। दूसरी ओर हमारा मस्तिष्क विचारों का केंद्र है और विचारों के द्वारा हमारी उर्जा निरंतर क्षीण होती रहती है। यदि व्यक्ति बैठा भी है और किसी प्रकार से कोई कार्य नहीं कर रहा फिर भी उसका मस्तिष्क निरंतर विचारों के द्वारा ऊर्जा का हनन करता रहता है। मनुष्य जीवन में ये दोनों ही कार्य उसे मृत्यु के नजदीक लेकर जाते हैं। इन दोनों कार्यों में प्रत्येक व्यक्ति निरंतर अपनी उर्जा को नष्ट करता रहता है। मस्तिष्क के विचार ही है जो उसे समस्त कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं और प्रत्येक कर्म में वह अपनी ऊर्जा को नष्ट करता है किंतु जब साधक साधना मार्ग का अवलंबन प्राप्त करता है और आसन ,प्राणायाम एवं ध्यान का अभ्यास करता है तो उसकी स्थिति बदलने लगती है। जो मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र की ऊर्जा निरंतर बाहर निकलने के लिए दबाव डालती थी ।अब वह ऊर्जा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ने लगती है और उसका प्रभाव कम होने लगता है। जिस मस्तिष्क में निरंतर विचारों का प्रभाव चलता रहता था अब वह मस्तिष्क धीरे धीरे विचारों को छोड़ने लगता है और जब साधक निरंतर अभ्यास करता रहता है तो एक समय ऐसा आता है जब मस्तिष्क सिर्फ एक केंद्र बिंदु पर पूर्ण एकाग्रता से टिक जाता है ,रुक जाता है ,विचार शून्य हो जाता है । उस स्थिति में सहस्रार चक्र से अमृत का अद्भुत स्राव होने लगता है । साधक आनंद की धारा से सराबोर हो जाता है और जो मूल आधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र की ऊर्जा बाहर निकलने के लिए हमेशा माध्यम तलाशती थी अब वह ऊर्जा भी ध्यान के अभ्यास से ऊपर चढ़ के सहस्रार चक्र में चली जाती है । इससे साधक के शरीर में उत्पन्न होने वाली संपूर्ण उर्जा का संरक्षण हो जाता है और यहां से साधक के नये जीवन का सूत्रपात होता है ।उसका संपूर्ण कायाकल्प हो जाता है । वास्तविक अर्थ में योग के चर्म लक्ष्यों की शुरुआत इसके बाद होती है। योगी की आयु बढ़ती है लेकिन आयु बढ़ने का प्रभाव बहुत कम योगी के शरीर में आ पाता है । वास्तविकता तो यह है -यदि रज -वीर्य एवं अमृत के स्राव को पूर्ण स्थिर कर लिया जाए तो व्यक्ति वृद्ध नहीं हो सकता क्योंकि आयु बढ़ने के साथ शरीर की जो कोशिकाएं नष्ट होती हैं , वे कोशिकाएं नष्ट होने की गति बिल्कुल धीमी हो जाती हैं। जब कोशिकाओं के नष्ट होने की गति अत्यंत धीमी हो जाती है तो व्यक्ति की आयु बढ़ने के लक्षण भी उसके शरीर पर उस अनुपात में प्रकट नहीं हो पाते जितनी साधक की आयु होती है और इस प्रकार से साधक सामान्यतः वृद्धावस्था की आयु में भी युवा के समान ही दिखाई देता है।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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