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Sunday, July 21, 2019

गोरख वाणी 4

🕉🌞गोरख वाणी और गोरख योग 🌞

               ⚜️🚩⚜️

🌞👉 विज्ञान स्वरूप अलक्ष्य परब्रह्म ने दो दीपकों व्यक्त और अव्यक्त स्वरूप सविकल्प और निर्विकल्प समाधि की रचना की ।उन दोनों दीपकों में अलक्ष्य परब्रह्म का ही प्रकाश है।उसी एक ज्योति से तीनों लोक व्याप्त हैं ।उस ज्योति पर विचार करने से तीनों लोक सुझने लगते हैं, त्रिलोक दर्शिता आती है और हंस स्वरुप आत्मा ज्ञान रूप मोतियों को चुगने लगता है तथा उसे माणिक्य रूप केवल्यानुभूति हो जाती है।जिस ब्रम्ह पद का वर्णन शास्त्रों में नहीं किया जा सकता, उस पद को बिरले योगी ही जान पाते हैं।बाकि दुनिया तो माया में लिप्त होकर गोरखधंधों में ही लगी रहती है।
👏 साधक के दो शब्द- जब हम नियमित रूप से प्राणायाम का अभ्यास करते हुए निरंतर ध्यान का अभ्यास करते हैं तो धीरे-धीरे आज्ञा चक्र में हमारा ध्यान लगने लगता है । निरंतर अभ्यास करते रहने पर जब एक ही विषय में सदृश वृत्तियों का प्रवाह चित्त में निरंतर बहने लग जाता है, तब उसको एकाग्रता कहते हैं।यह चित्त की स्वाभाविक अवस्था है अर्थात जब चित में बाह्य विषयों के रजो तथा तमोगुण का प्रभाव न रहे, तब वह निर्मल मन चमकते हुए स्फटिक के सदृश स्वच्छ हो जाता है। उस समय उस चित में अनंत ज्ञान का आविर्भाव होने लगता है।इसी की अंतिम स्थिति विवेक ख्याति है।एकाग्रता कि इसी स्थिति को संप्रज्ञात या सविकल्प समाधि कहा जाता है। यही स्थिति योग में ज्ञान के स्वत: आविर्भाव की है।
👉 जब संप्रज्ञात समाधि के द्वारा पूर्णतया सद विवेक जाग्रत हो जाता है, तब साधक को प्रकृति के सर्व कार्यों का पूर्णतया ज्ञान होने लग जाता है। तब उस विवेक ख्याति युक्त ज्ञान से भी पर वैराग्य का उदय होता है क्योंकि विवेक ख्याति भी चित्त की ही एक वृत्ति है ।इस वृत्ति के भी निरुद्ध होने पर सर्व वृत्तियों के निरोध होने से चित्त की निरोध अवस्था होती है। इस निरोध अवस्था में किसी प्रकार की भी वृत्ति अर्थात विचार शेष नहीं रहते।समस्त प्रकार के तर्क वितर्क एवं विचारों से मस्तिष्क रहित हो जाता है । निरोध अवस्था में किसी प्रकार की भी वृत्ति न रहने के कारण कोई भी पदार्थ जानने में नहीं आता, इसलिए इस स्थिति को असंप्रज्ञात , निर्बीज या निर्विकल्प समाधि कहते हैं।इस स्थिति में सिर्फ शुद्ध परमात्म स्वरुप ही शेष रह जाता है अतः साधक इस स्थिति में पहुंचकर स्वयं ही सत्य स्वरुप परमात्मा के स्वरुप को धारण कर लेता है। वह ब्रह्म बन जाता है अर्थात जिस प्रकार से ब्रह्म निर्विकल्प निर्विचार शुद्ध चेतन ऊर्जा है ।उसी स्थिति को साधक प्राप्त कर लेता है । ब्रह्म बन जाने काअर्थ यह नहीं होता कि वह मां आदिशक्ति के संपूर्ण नियमों सेेेेे बिल्कुल परे चला जाता है या संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंता बन जाता है? इस स्थिति में साधक की संकल्प शक्ति तो अत्यधिक बढ़ जाती है और वह अपने संकल्प से बहुत कुछ कर भी सकता है किंतु संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित कर सके ऐसी शक्ति एवं सामर्थ्य प्राप्त कर पाना स्पष्ट रूप से असंभव दिखाई देता है।  साधक संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंता तो नहीं बल्कि अपने आप का पूर्ण नियंता  अवश्य बन जाता है।   माया का संपूर्ण आवरण साधक के मन मस्तिष्क से पूर्णतया समाप्त हो जाता है । 

              -- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव

                          ( मेरी संपूर्ण पहचान) 
           ⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️

          ⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
         
            ⚜️ 🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
       ⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

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