🕉 🌞गोरख वाणी 🕉
⚜️🚩https://maa-aadishaktikundaliniyog.in/👉 परमतत्व तक किसी की पहुंच नहीं , वह इंद्रियों का विषय नहीं ,अगोचर है। वह ऐसा है कि न उसे हम बस्ती कह सकते और न शून्य। न यह कह सकते हैं कि वह कुछ है और न यह कि वह कुछ नहीं है। वह भाव और अभाव, सत और असत दोनों से परे है। वह आकाश मंडल में बोलने वाला बालक है। आकाश मंडल में बोलने वाला इसलिए कहा कि शून्य अथवा आकाश या ब्रह्मरंध्र में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है, वहीं पहुंचने पर ब्रह्म साक्षात्कार हो सकता है। वहीं आत्मा को ढूंढना चाहिए।बालक इसलिए कि जिस प्रकार बालक पाप-पुण्य से अछूता है, उसी प्रकार परमात्मा भी निर्लेप है।
🌞👉 न देखे हुए अर्थात परब्रह्म को देखना चाहिए और देख कर उस पर विचार करना चाहिए। जो आंखों से देखा नहीं जा सकता उसे चित में रखना चाहिए। पाताल (मणिपुर चक्र )की गंगा( कुंडलिनी शक्ति) को ब्रह्मांड( ब्रह्मरंध्र या सहस्रार दल) में प्रेरित करना चाहिए। वहीं पहुंचकर योगी साक्षात रुप निर्मल रस को पीता है।
🌞👉 अक्षय परब्रह्म यहां अर्थात सहस्रार या ब्रह्मरंध्र (शून्य) में ही है। यहीं वह अलोप है।तीनों लोकों की रचना यहीं से हुई है। ब्रह्म का ही व्यक्त स्वरूप यह ब्रह्मांड है। ब्रह्मरंध्र रूप केंद्र ही से उसने अपना सर्वधिक प्रसार किया है। ऐसा जो अक्षय परब्रह्म सर्वदा हमारे साथ रहता है, ऐसे सत्य स्वरूप परब्रह्म को छोड़कर अज्ञानी मनुष्य उस परब्रह्म को न जाने कहां कहां ढूंढता रहता है ।इसी कारण उस को प्राप्त करने के लिए अनंत सिद्ध योग मार्ग में प्रवेश कर योगेश्वर हो जाते हैं।
🌞👉 परब्रह्म का ठीक-ठीक निर्वचन किताबी धर्मों की पुस्तकें नहीं कर सकती, यदि ब्रहम के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान पाना चाहते हो तो ब्रह्मरंध्र यानी गगन शिखर में समाधि द्वारा जो शब्द प्रकाश में आता है अर्थात अनहद नाद सुनाई देता है, उसमें विज्ञान रूप लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त करो!
👏 साधक के दो शब्द- यदि किसी मनुष्य के मन में उस सत्य स्वरुप परमात्मा को जानने की जिज्ञासा है तो निश्चित रूप से वह उस परमात्मा के सत्य स्वरूप को स्वयं जान सकता है किंतु उसे बाहर संसार में कहीं नहीं पाया जा सकता। उसे सिर्फ और सिर्फ हमारे शरीर के अंदर ही पाया जा सकता है,क्योंकि इस शरीर में वह पहले से ही विद्यमान है। बस फर्क सिर्फ इतना सा है कि हम उस का साक्षात्कार नहीं कर पाते।साक्षात्कार सिर्फ और सिर्फ वही तपस्वी साधक कर पाता है जो अपने आपको यम-नियमों में बांधकर साधना का मार्ग अपनाता है। जब साधक अपने शरीर में प्राणायाम एवं ध्यान से ऊर्जा का संचार करता है तो उसके शरीर में सोयी हुई समस्त शक्तियां जागृत होने लगती हैं । जिसके परिणाम स्वरूप साधक के व्यक्तित्व में चमत्कारी परिवर्तन आने लगते हैं। वह अद्भुत व्यक्तित्व एवं कौशलों का धनी हो जाता है। साधना करता हुआ साधक जब अपनी प्राण ऊर्जा को आज्ञा चक्र तक ऊपर उठानेे में समर्थ हो जाता है तो वहां पर उसे अनहद नाद रूपी परब्रह्म परमात्मा के शब्द स्वरूप का साक्षात्कार होता है । महायोगी गुरु गोरखनाथ केेे अनुसार ब्रह्मरंध्र पर पहुंचने पर नाद सुनाई देता है किंतु साधक ने यही जाना है - सिर्फ आज्ञाा चक्र तक पहुंचने मात्र सेे नाद का प्रकटीकरण हो जाता है । इससे ऊपर सहस्त्रार चक्र तक पहुंचने पर असीम आनंददायी तेजोमयी प्रकाश स्वरूप का आत्म साक्षात्कार होता है। इससे ऊपर या सहस्रार चक्र में ही ही स्थित ब्रह्मरंध्र वह स्थान है, जहां से साधक अपने आत्म स्वरूप में पूर्णतया एकात्म भाव प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है और उसकी चेतना ब्रह्मांड व्यापी विस्तार को प्राप्त करने लगती है ।ब्रह्मरंध्र ही वह केंद्र है जहां से साधक स्वयं उस परब्रह्म परमात्मा की दिव्य चेतना से पूर्णतया एकाकार हो पाता है। संकल्पना की सिद्धि यहीं पहुंचने के बाद प्राप्त होती है । निर्विकल्प, निर्विचार अवस्था की प्राप्ति यहीं पहुंचकर प्राप्त होती है ।इसीलिए प्रत्येक साधक का लक्ष्य ब्रह्मरंध्र तक पहुंचना होना ही चाहिए।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव (मेरी संपूर्ण पहचान )
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⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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