🕉🚩 सनातन का दर्द 🚩🕉
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🕉️🚩 आत्मीय परिवार जनों , जय मां आदि शक्ति! कभी-कभी मेरे शब्द बहुत कड़वे हो जाते हैं । मैं इन्हें नियंत्रित करने का प्रयास भी करता हूं।कहा भी गया है-- सत्य बोलो ,प्रिय बोलो । अप्रिय सत्य मत बोलो। अर्थात सत्य बोलो किंतु कड़वा सत्य नहीं बोलना चाहिए। कड़वा बोलकर मुझे स्वयं को भी कड़वाहट का एहसास होता है, बुरा लगता है लेकिन अंदर से आवाज आती है-" नहीं इन शब्दों को मत रोक , इन्हें बहने देअपनी धार से क्योंकि ये तेरे शब्द नहीं; तू तो निमित्त मात्र है, येशब्द तो मेरे हैं"। अंदर से आत्मा बोलती है, मतलब कि मां आदिशक्ति ही बोलती है ।"
क्या करूं? मेरे धर्म का विज्ञान एवं वास्तविक सत्य सदगुरुदेव एवं जगत जननी मां की कृपा से मुझे ज्ञात हो गया है और इसे समझने में मुझे 15 वर्ष का समय लगा। मैंने इसे सिर्फ ग्रंथों को पढ़कर नहीं समझा जो ग्रंथों में लिखा है, उसे जीकर देखा है। व्यक्तिगत अनुभव से आत्मसात करके देखा है। उसके बाद पता चला है कि वैदिक युग से वर्तमान युग तक सनातन धर्म में कुछ भी नहीं बदला है। सनातन का सत्य जिस काल में वेद, उपनिषद दर्शन ग्रंथ लिखे गए उस समय जैसा था ,आज भी वैसा ही है। साधनाओं को सिद्ध करने में जितना समय उस समय लगता था ,आज भी उतना ही समय लगता है । योग, पंच महा यज्ञ,16संस्कार ,ॐ कार, गायत्री महामंत्र का जप एवं तंत्र का विज्ञान जैसा उस युग में था, वैसा ही आज भी है । कुछ भी नहीं बदला, कुछ भी नहीं! उस युग में भी मनुष्य की पूर्ण आयु 100 वर्ष मानकर ही आश्रम व्यवस्था की स्थापना की गई थी और आज भी यदि हम योग, ध्यान ,अच्छे खान-पान के आधार पर जीवन जिएं तो सौ वर्ष की आयु हम भी प्राप्त कर सकते हैं । कोई बड़ी बात नहीं है; और जहां तक बात है ध्यान के सिद्ध होने की ,मंत्र विज्ञान के सिद्ध होने की तो कोई सी भी साधन हो, यदि उसे हम गंभीरता से तल्लीनता से ,दृढ़ता से करते हैं तो अधिक से अधिक 12 वर्ष का समय लगता है। इससे अधिक समय नहीं लगता, किसी भी साधना को सिद्ध करने में। किसी भी साधना को एक पैर के अंगूठे पर खड़े होकर के ना तो करने की आवश्यकता है और ना ही ऐसा करके किसी साधना को सिद्ध किया जा सकता है। ना कभी कोई देवता सामने प्रकट होकर कभी यह कहता है कि मांग तुझे क्या चाहिए? जब साधक की उच्च अवस्था आती है तो वह जो चाहता है, वह स्वत ही अपने आप होने लगता है । की चेतना ब्रह्मांड व्यापी विस्तार प्राप्त कर लेती है और उस विस्तार के परिणाम स्वरूप उसके संकल्प अपने आप सिद्ध होने लगते हैं । संकल्प सिद्धि अपने आप में पूर्णतया विज्ञान है और यहां तक पहुंचाना कठिन है किंतु असंभव नहीं है । पुराणों में जिस तरीके से साधना से डराया गया है, यह अपने आप में धर्म अनुयाइयों को धर्म के मूल सिद्धांतों से दूर करने की साजिश थी, धर्म के व्यवसाय करण की निंदनीय साजिश थी। धर्म के इसी व्यवसाय करण ने सनातन के मूल सिद्धांतों को मिटा दिया और जो नियम नर को नारायण बनाते थे , हमें उन मूल सिद्धांत से पूर्णतया दूर कर दिया गया। मैंने पुराणों को बड़ी गहराई से अच्छी तरह से कई बार पढ़ पढ़ कर देखा है किंतु वास्तविकता यही है ,इनमें मूल उद्देश्य सनातन के मूल सिद्धांतों से भटकाना ही है। इन कहानियों, इन कथाओं के माध्यम से कल्पना के लोक में ले जाकर, कलयुग का नाम लेकर वास्तविक सत्य से दूर करना ही है। यह सिर्फ साधना से दूर करने की चाल थी, सत्य से भटकाने की घिनौनी साजिश थी । हां जैसा उपनिषदों में लिखा हुआ है, सत्य वैसा ही सामने आएगा एक साधक की नाडी़ शुद्धि कितने समय में हो जाती है ?ध्यान कितने समय में लगने लगता है? ब्रह्म साक्षात्कार का अनुभव कितने समय में आने लगता है ? समाधि की अवस्था कैसी होती है? और कितने समय में घटित हो जाती है? सब कुछ प्रमाणित है , सब कुछ ; किंतु जो पुराणों में लिखा हुआ है, वहां पर बहुत अधिक काल्पनिक है ,बहुत अधिक और सिद्धियों के बारे में भी कल्पना का बहुत अधिक प्रयोग किया गया है। इसलिए दर्द बहुत गहरा होता है, जब भी मैं किसी कथा वाचक को कथा सुनाते हुए देखता हूं या सुनता हूं तो मैं कुछ देर से अधिक नहीं सुन पाता क्योंकि थोड़ी सी देर में ही ऐसा प्रसंग आ जाता है जो पूर्णतया मिथ्या होता है, काल्पनिक होता है,बिना सिर पैर का होता है। इसलिए यह तो निश्चित है ,मेरे शब्द कभी मीठे नहीं हो पाएंगे । मैं अपने धर्म के विषय में जो कुछ जान गया हूं उसे अक्षरश: साबित करने के लिए हमेशा तैयार हूं और असत्य पाखंड को अधिक पचाने की स्थिति में बिल्कुल भी नहीं हूं।
🚩👏 मैं सनातन धर्म के उज्जवल भविष्य के लिए आप सबसे निवेदन करता हूं-- यदि आप सनातन धर्म पर गर्व करते हैं तो सनातन के नियमों को अपनाइए। सिर्फ बार-बार कथा सुनने से किसी को कभी मोक्ष नहीं मिलता, किसी कथा में नाचने से कभी किसी को मोक्ष नहीं मिलता, दान करने से किसी को कभी मोक्ष नहीं मिलता, किसी कुंड में ,किसी नदी में स्नान करने से कभी किसी को मोक्ष नहीं मिलता। "मोक्ष अपने विकारों से मुक्त होने पर मिलता है;" अपने अस्तित्व का बोध प्राप्त करके आसक्ति का पूर्णतया त्याग करने से मिलता है"। यदि किसी कथा में नाच लेने से आप अपने विकारों से मुक्त हो जाते हैं ; यदि दान करने से आप अपने अहंकार से मुक्त हो जाते हैं ; यदि आप किसी नदी या कुंड में स्नान करने से अपने मन मस्तिष्क में भरे हुए मेल को धोने में समर्थ हो जाते हैं तो निश्चित रूप से आप यह सब करके मोक्ष के अधिकारी हो जाएंगे; किंतु क्या एक करोड़ में से एक व्यक्ति भी है ,जो यह कह सके कि यह सब करके वह अपने विकारों से मुक्त होने में समर्थ है, क्योंकि यह सब करने से आप कभी भी अपने विकारों से मुक्त नहीं हो पाएंगे। मैं भी नहीं हो सकता, आप भी नहीं हो सकते । दान करने वाला दान करके अहंकार रहित नहीं , बल्कि अहंकार का पोषण करने के लिए दान करता है, जबकि दान कर्तव्य पालन के लिए होना चाहिए। मैं यह नहीं कह रहा कि मैं विकारों से पूर्णतया मुक्त हूं, किंतु हां इतना अवश्य कह रहा हूं ,"मैं विकारों से मुक्त होने की पद्धति को अच्छी तरह से समझ गया हूं, जान गया हूं ;और मोक्ष क्या है और कैसे प्राप्त किया जा सकता है ? यह वास्तविक सत्य भी मैंने हमारे तत्वदर्शी ऋषियों के अमूल्य ज्ञान जो कि वेद, उपनिषद ,आगम में है ; अच्छी तरह से समझ करके ,साधना करके आत्म अनुभव से जान लिया है। इसलिए आओ सनातन को फिर से सनातन की ओर लेकर जाएं और हम अपने धर्म को पाखंडवाद से मुक्त करें। असत्य से मुक्त करें ,अधर्म से मुक्त करें क्योंकि ऐसा करने पर ही सनातन धर्म फिर से पुनर्जीवित हो सकेगा। अभी हम जिसे सनातन समझ रहे हैं ;यह सनातन नहीं ,सनातन के स्थान पर शुद्ध पाखंडवाद है, जो हमें सनातन से दूर ले गया है ,बहुत अधिक दूर। हमें वापस अपनी जड़ों पर लौटना ही होगा ,लौटना ही होगा। तभी हम फिर से संपूर्ण विश्व में सनातन का परचम लहरा पाएंगे और विश्व गुरु की पदवी के साथ भी न्याय कर पाएंगे।
🚩👏 तीर्थ यात्रा मैं भी करता हूं, साकार पूजा मै भी करता हूं, मंदिर मै भी जाता हूं, दान मैं भी करता हूं किंतु सत्य समझता हूं, सत्य जानता हूं। तीर्थ यात्रा करनी चाहिए किंतु तीर्थ कर लेने से मुझे मोक्ष कभी नहीं मिल सकता, यह भी वास्तविक सत्य है। जीवन में आए हैं तो हमारे ऋषियों की तपो भूमि का दर्शन करना ,उस ऊर्जा का अनुभव करना अपने आप में पवित्र एवं पूण्य कार्य है किंतु स्वयं साधना उपासना नहीं करके, जप- तप, ध्यान नहीं करके बिना विकृतियों से मुक्त हुए मोक्ष प्राप्त होने का भ्रम पाल लेना और इस भ्रम में इस मनुष्य जीवन को समाप्त कर लेना; यह धर्म नहीं, यह धर्म का ज्ञान नहीं यह तो निश्चित रूप से अधर्म है। धर्म की राह से भटकना है; इसलिए आओ हम धर्म की राह पर चलें। भटकाव से उबड़कर वास्तविक सत्य की राह पर चलें।
- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
(मेरी संपूर्ण पहचान)
⚜️🚩सत्यमेव जयते🚩⚜️
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⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
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