🕉🌞गोरख वाणी और गोरख योग 🌞🕉
⚜️🚩
👉 महायोगी गुरु गोरख नाथ योगी की वास्तविक शारीरिक पहचान बता रहे हैं--
🌞👉 जिनके बड़े बड़े कूल्हे और मोटी तोंद होती है, उन्हें योग की युक्ति नहीं आती ,समझना चाहिए कि उनकी गुरु से भेंट ही नहीं हुई है या उन्हें अच्छा योगी गुरु मिला ही नहीं है अथवा गुरु के शरीर के दर्शन पर भी उनकी वास्तविकता को उन्होंने नहीं पहचाना हैं ,उनकी शिक्षा से लाभ नहीं उठा सका है या उसके अधिकारी ही नहीं हुए हैं ।यदि साधक का शरीर खड़ -खड़ यानी चर्बी से मुक्त है और उसके नेत्र निर्मल एवं कांतिमय हैं तो समझना चाहिए कि उसकी गुरु से भेंट हो गई है ।
🌞👉 ब्रह्मरंध्र में कुंडलिनी प्रवेश से ब्रह्मांड फोड़ना चाहिए और शून्य रूप नगर को लूटना चाहिए, जिसका भेद कोई नहीं जानेगा ।महायोगी गुरु गोरखनाथ कहते हैं कि जब शरीर रूपी घर घेर लिया जाता है तभी पंचदेव अर्थात पंच इंद्रियों का स्वामी मन पकड़ने में आता है।
👏 साधक के दो शब्द- यदि कोई मोटा हो तो उसे महा योगी गुरु गोरखनाथ के इन शब्दों को दिल पर नहीं लेना चाहिए और ये मेरे शब्द भी नहीं है।किसी भी प्रकार की साधना के लिए शरीर का संतुलित होना अत्यंत आवश्यक है, जो व्यक्ति मोटे होते हैं ,उनके लिए योग की युक्ति अपनाना आसान नहीं होता। नियमित रूप से आसन, प्राणायाम के अभ्यास से मोटे लोग भी अपने शरीर को संतुलित कर सकते हैं।
🕉️🚩👏 आजकल सनातन धर्म में ऐसे ही गुरुओं की भरमार हैं, जिनके मोटे-मोटे कूल्हे एवं बड़ी सारी तोंद सहजता से दिखाई दे जाएगी। इन्हीं लोगों के लिए गुरु गोरखनाथ कह रहे हैं, कि इनको पहचान लो इन्हें कुछ नहीं आता। इनका शरीर ही गवाह है कि इन्होंने अपने शरीर को साधना की कसौटी पर कितना सादा है । महायोगी गुरु गोरखनाथ कह रहे हैं कि उन्हें कुछ भी ज्ञात नहीं है। बस दो-चार पुस्तक पढ़ ली, बढ़िया लच्छेदार भाषा में बोलना आ गया, फिर कलयुग में तो कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं है, तोंद फुला कर बैठे रहो और जमकर झूठ बोलते रहो। उठते बैठते भगवान का नाम ले लो; बस मोक्ष पक्का मिल जाएगा। अजामिल को भी तो मिला था। हो गया काम; फिर किसी चीज की कोई कमी नहीं है;किंतु वास्तविकता यह है--
जब साधक के शरीर में योग सिद्ध होने लगता है तो उसका शरीर पूर्णतया संतुलित नेत्र एवं चेहरे पर तेज स्पष्ट दिखाई देने लगता है। वाणी अत्यंत प्रभावशाली हो जाती है। काव्य सृजन एवं लेखन की क्षमता अत्यधिक बढ़ जाती है। चिंतन एवं मनन अत्यधिक विस्तृत हो जाता है। साधक के शब्द अत्यंत प्रभावशाली हो जाते हैं।
🌞👉 मूलाधार चक्र एवं मणिपुर चक्र में विद्यमान कुंडलिनी शक्ति को जब साधक उधर्व करता है तो वह चेतन शक्ति ऊपर बढ़ती हुई सहस्रार चक्र में पहुंचती है ,जो साधक पूर्णतया सहस्रार चक्र को जागृत कर ब्रह्मरंध्र को भेद लेता है उसका भेद संसार में कोई नहीं जान सकता क्योंकि वह संपूर्ण संसार का भेद जानने में समर्थ हो जाता है। जब सहस्रार चक्र जागृत हो जाता है तो असीम आनंद की अनुभूति होने लगती है और उस आनंद में मन पूर्णतया विलीन हो जाता है, संपूर्ण इंद्रियां वश में हो जाती है ।मन पूर्णतया वशीभूत हो जाता है।
🌞👉 इस स्थिति में पहुंचे हुए साधक के मन एवं इंद्रियाँ तो वशीभूत हो जाती हैं किंतु अहंकार यहाँ पर भी जीवित रहता है। अहंकार ब्रह्म भाव में पूर्ण स्थायित्व प्राप्त करने के बाद ही विगलित हो पाता है या अहंकार को साधक अपने जागृत विवेक से ही नियंत्रित कर पाता है। स्पष्ट शब्दों में कहें तो यह कि अहंकार का अंत सिर्फ और सिर्फ निर्विकल्प समाधि में प्रविष्ट होने के बाद ही संभव है क्योंकि यहां प्रविष्ट होने पर संस्कारों के सभी बीज गल जाते हैं और शुद्ध चैतन्य ब्रह्म ही शेष रह जाता है।
⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
No comments:
Post a Comment