🕉️🚩 सिद्धिविनायक गणेश का स्वरूप🚩⚜️
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🔥🚩 रिद्धि- सिद्धि एवं बुद्धि के दाता मूलाधार चक्र के अधिष्ठाता, विघ्न हरण ,मंगल करण, सिद्धि विनायक, वक्रतुंड, महाकाय, गणों (इंद्रियों ) के अधिपति अर्थात मन के स्वामी गणपति देव की कृपा आप सब परिवार जनों पर हमेशा बनी रहे।
🚩👏 आत्मीय परिवार जनों आज हम सिद्धिविनायक भगवान गणपति के आध्यात्मिक स्वरूप को समझने का प्रयास करें--
🚩👏मनुष्य की पांच इन्द्रियां ही मनुष्य की गणेन्द्रियां हैं।
एक अच्छा शिष्य और एक अच्छा विद्यार्थी बननें के लिए जो
आवश्यक गुण चाहिये वे सभी भगवान गणपति के स्वरूप से ग्रहण किये जा सकते हैं , सीखे जा सकतें हैं।
🚩👉छोटी आंखे अर्थात् किसी भी होनें वाली घटना का सूक्ष्म अध्ययन करें।
बडे कान अर्थात् ज्ञानी जनों
एवं गुरुजनों की बातों को और
संसार की हर ध्वनि को ध्यान से
सुनें।
🚩👉लम्बी सूंड अर्थात् जैसे हाथी हर घटना या गंध को सूंड से दूर से ही ग्रहण कर लेता है ,वैसे ही हर होने वाली घटना को होने से पूर्व ही भांप लें, चिंतन मनन कर लें ।
🚩👉बडा मस्तक अर्थात् मस्तिष्क में अधिक से अधिक
धारण करके रखें।
🚩👉बडा पेट अर्थात् हर अच्छी बुरी बात को पचा लें। प्रशंसा और बुराई दोनों को हजम करना सीखें।
🚩👉टूटा हुआ एक दांत अर्थात् कभी भी व्यर्थ में बडा होनें या ज्ञानी होनें का दिखावा न करें क्योंकि अहंकार को तोड़े बिना आत्मज्ञान संभव नहीं है।
🚩👉 चूहे पर सवारी अर्थात् जिसकी प्रवृत्ति विषय को गहनता से कुरेदने की है, वही बुद्धि की चरम् पराकाष्ठा तक पहुंच कर प्रत्येक कर्म में रिद्धि- सिद्धि रूपी दो पत्नियों को प्राप्त करेगा।
🚩👉जब एक साधक या शिष्य के अंतस्थ में ये गुण प्रतिष्ठित हो जाते हैं , तब ही वह श्रेष्ठ साधक, श्रेष्ठ शिष्य बनता है और
सफलता अर्थात् साधना की सिद्धि रूपी लड्डू उसके हाथ में आते हैं।
भगवान गणपति की प्रतिमा अपने आप में एक संपूर्ण आध्यात्मिक संदेश देती है किंतु हम इन संदेशों तक नहीं पहुंच पाते। तत्वज्ञानियों का कर्तव्य है की इन रहस्यों को खोलकर समझाएं किंतु वह कार्य भी नहीं हो पा रहा है। इसीलिए विभिन्न प्रश्न भी समय-समय पर उठते रहते हैं। जो साधक भगवान गणपति के स्वरूप से, मूर्ति से गणेश के गुणों
को धारण कर लेता है ,वह ईश्वर
अर्थात् शिव-शक्ति को पानें का
मार्ग सुलभता से पा लेता है।
किसी भी कार्य का सुभारम्भ तभी सफल होता है, जब आप गणेश के
गुणों को धारण करें।
अतः सबसे पहले श्रीगणेश करनें
का यही तात्पर्य है कि आप गणों अर्थात् अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करें और आध्यात्मिक यात्रा की ओर या जीवन पथ पर किसी भी लक्ष्य की ओर आगे बढ़ाना प्रारंभ करें। इस यात्रा की शुरुआत मूलाधार चक्र से होती है और मूलाधार चक्र काम का केंद्र है ,भगवान गणपति स्वयं काम के अधिष्ठाता देव है, या यूं कहें काम स्वरूप हैं। समस्त कामनाओं की सिद्धि इसी एक तत्व पर टिकी है। जो इसे सिद्ध करता है, नियंत्रित कर लेता है और उधर्व मुख रूपांतरित कर देता है, वह रिद्धि एवं सिद्धि को साधता हुआ शिव एवं शक्ति के संयुक्त सायुज्य को प्राप्त कर लेता है। निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि हमारा सतो मुखी मन जो इंद्रियों का अधिष्ठाता है, प्रेरक एवं नियंता है, वही भगवान गणपति का स्वरूप है । यह मन दुर्गुणों में लिप्त होने पर रावण एवं कंस बन जाता है, महिषासुर बन जाता है और यही नियंत्रित एवं सत्व गुणों को धारण करने पर रिद्धि सिद्धि का दाता गणेश बन जाता है। हमारा मन यदि बुद्धि के नियंत्रण में है तो सारी सफलताएं इसी के पास छिपी है और यदि यह अनियंत्रित है तो फिर असफलता के द्वारा भी यहीं से खुलते हैं, और मूलत: इस मन की शक्ति काम के केंद्र मूलाधार चक्र में छिपी हुई है, इसलिए जब मूलाधार चक्र की ऊर्जा रूपांतरित होती है ; बुद्धि के नियंत्रण में होती है तभी गणों का अधिपति गणेश वास्तविक अर्थ में रिद्धि-सिद्धि एवं बुद्धि का दाता बनकर अपनी कृपा का आशीर्वाद बरसा पाता है।
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
🚩🔥 गणपति बप्पा मोरिया 🔥🚩
⚜️🚩जय श्री राम🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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