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गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वर:।
गुरुर् साक्षात् परब्रह्म: , तस्मै श्री गुरुवे नमः।।
अखंडमंडलाकारम् ,व्याप्तम् येन चराचरम्।
तत् पदम् दर्शितं येन, तस्मै श्री गुरवे नमः।।
आप सभी आत्मीय परिवार जनों को गुरु पूर्णिमा महा पावन पर्व की हार्दिक मंगल कामनाएं, बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
🚩👏 सद्गुरुदेव एवं जगत जननी मां की कृपा हम सब पर हमेशा बनी रहे।
🕉गुरु का वरण क्यों🕉
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⚜️🚩साधक को चाहिए कि अपनी साधना के लिए कोई शिक्षक,आचार्य या मार्गदर्शक का वरण करें। जिससे साधना संबंधी शंकाओं तथा समय समय पर उठने वाले प्रश्नों एवं विघ्नों का समाधान उनके द्वारा होता रहे। बीच−बीच में ऐसी परिस्थितियाँ आती रहती हैं, ऐसे अनुभव होते रहते हैं जिनके कारण चित्त विचलित हो जाता हैं, मन में संकल्प विकल्प उठने लगते हैं, उन विक्षेपों का समाधान न हो तो साधना में मन नहीं लगता ।संदेहों की वृद्धि से श्रद्धा और विश्वास में न्यूनता आ जाती है। इस प्रकार के विघ्नों को टालने के लिए ऐसे शिक्षक या यूं कहें गुरु की आवश्यकता है जो साधक के मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा कर सकें,किंतु आज कल गुरुडम काफी बदनाम हो चुका है। धूर्त, अर्थ−लोलुपa, मूर्ख, भ्रष्ट, स्वार्थी एवं ब्रह्मत्व से रहित गुरुओं की बाढ़ सी आई हुई है। शिष्य का कान फूँक कर कुछ उलटा सीधा मंत्र बता देना और फिर सदा उनसे दक्षिणा की याचना करते रहना ,यही गुरुओं का कार्य रह गया है। इसके अतिरिक्त कभी कभी तो इन लोगों द्वारा शिष्यों के साथ भयंकर विश्वासघात ,अपहरण ,भ्रम में डाल देना ,चरित्र नाश आदि अनेक कुकर्म भी होते देखे जाते हैं । ऐसी दशा में इन गुरु नाम धारियों के प्रति अविश्वास एवं तिरस्कार के भाव जन साधारण के मन में फैलना स्वाभाविक है। इतना होते हुए भी शिक्षक की आवश्यकता कम नहीं हो जाती है। वनस्पति घी दुकानों में पटा पड़ा है, गाँवों की झोपड़ियों तक उसका प्रवेश हो गया है तो भी असली घी के महत्व में कुछ कमी नहीं आई है। नकली सोने के जेवर और नकली जवाहरात प्रचुर परिमाण में बाजार में मौजूद हैं, इस पर भी असली सोने और असली जवाहरात का गौरव तनिक भी नहीं घटा है। आज का घृणित गुरुडम सर्वथा तिरस्कार का पात्र है ,इस पर भी आत्मोन्नति के लिए सच्चे शिक्षकों की, सच्चे मार्गदर्शक गुरुओं की आवश्यकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। उनकी जैसी आवश्यकता प्राचीन काल में थी वैसी ही आज भी है क्योंकि
गुरुबिन भव निधि तरे न कोई।
जो विरंची शंकर सम होई।।
🔥एक आत्मा की शक्ति से दूसरी आत्मा को आत्मबल प्राप्त होता है ; इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए साधकों को अपनी पीठ पर एक बलवान रक्षक और सामर्थ्यवान मार्गदर्शक की नियुक्ति करनी होती हैं। यह दृढ़ पुरुष गुरु अथवा शिक्षक कहलाता है। इसे नियुक्त करने से पूर्व उसके ज्ञान ,आचरण और व्यक्तिगत अनुभव को देख लेना आवश्यक है। जिसमें यह तीनों बाते उचित मात्रा में हों उसे ‘आचार्य’ कहते हैं। परीक्षा करके संतोष प्राप्त कर लेने के उपरान्त इस आचार्य को निष्कपट भाव से, श्रद्धा और विश्वास पूर्वक अपना पथ प्रदर्शक मान लेना चाहिए। किसी भी प्रकार का संशय उत्पन्न होने पर गुरु से संशय का शीघ्र निवारण कर लेना चाहिए क्योंकि संशय युक्त मन साधना में सबसे बड़ी बाधा है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है-- संश्यात्मा विनश्यति। संशय ही आत्म उन्नति में सबसे बड़ी बाधा है और जो आपके मन मस्तिष्क में उठने वाले समस्त संशयों को गिरा दे, वही सच्चा आचार्य, सच्चा सद्गुरु हो सकता है और ऐसा आचार्य ही इस भवसागर से पार उतारने में समर्थ हो सकता है।
-- पूज्य सदगुरुदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी
🚩 एक बार फिर से आप सभी आत्मीय परिवार जनों को गुरु पूर्णिमा पावन पर्व की हार्दिक मंगल कामनाएं, बहुत-बहुत शुभकामनाएं।
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩 जय मांँ आदिशक्ति 🚩⚜️
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