🕉️🚩 विज्ञान भैरव तंत्र 🚩🕉️
🌞 धारणा -9🌞
https://maa-aadishaktikundaliniyog.in/
⚜️🚩 माता पार्वती को उस परमपिता परमात्मा के बौद्ध भैरव स्वरूप को प्राप्त करने का विज्ञान समझाते हुए भगवान शिव कह रहे हैं - कि हे पार्वती रंगीन मयूर पंखों की तरह मंडलों को अर्थात ज्ञानेंद्रियों अथवा उनकी तन्मात्राओं को पंचक शून्य मानकर हृदय में ध्यान करते हुए साधक का प्रवेश अनुत्तर शून्य में होता है।
🌞👏 साधक के दो शब्द- यहां पर भगवान शिव कह रहे हैं कि जब साधक ध्यान करते हुए ज्ञानेंद्रियों के मूल विषयों के स्थान पर अलग-अलग विषयों का चिंतन नहीं करके उन विषयों के स्थान पर ,उन इंद्रियों के ऊर्जा केंद्रों के पर सिर्फ शून्य का ध्यान करता है तो ऐसा साधक अनुत्तर शून्य में प्रवेश पा करके अपने हृदय में प्रविष्ट हो जाता है अर्थात अपने वास्तविक स्वरूप बौद्ध भैरव स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। इस धारणा में विशेष रूप से समझने का विषय यह है कि हमारी पंच ज्ञानेंद्रियों के विषयों के मूल स्थान वास्तव में कहां कहां पर हैं? नासिका जो की गंध को पहचानती है, इस ज्ञानेंद्रिय का मूल ऊर्जा केंद्र जन्माग्र अर्थात मूलाधार चक्र है। जिह्वा रस का आस्वादन करती है ,रस को पहचानती है। मुंह में निवास करती है किंतु इसकी उर्जा का मूल स्थान कंद अर्थात स्वाधिष्ठान चक्र है। दृष्टि जो कि सौन्दर्य को ग्रहण करती है, तेज को पहचानती है। निवास स्थान आंखें हैं किंतु इनकी उर्जा का मूल स्थान मणिपुर चक्र अर्थात नाभि है। त्वचा जो कि वायु के माध्यम से स्पर्श को ग्रहण करती है ,निवास स्थान संपूर्ण शरीर किंतु मूलतः ऊर्जा का केंद्र स्थान हृदय है। कर्ण जो कि ध्वनि के माध्यम से शब्द का अनुभव करते हैं , स्थान कान एवं ऊर्जा का मूल स्थान कंठ चक्र अर्थात विशुद्धि चक्र है। इस तरह से इस धारणा के माध्यम से भगवान शिव माता पार्वती को समझाना चाह रहे हैं कि इन सभी चक्रों पर अलग-अलग विषयों का ध्यान नहीं करके सिर्फ शून्य का ध्यान करने से साधक अंततः अपने हृदय में प्रविष्ट हो जाता है और वहां प्रविष्ट होकर अपने वास्तविक स्वरूप बौद्ध भैरव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है।
⚜️🚩सत्यमेव जयते🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव🚩⚜️
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति🚩⚜️
No comments:
Post a Comment