🕉🔥योगतत्वोपनिषद-4 🔥🕉
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🌞👉 भगवान श्री हरि विष्णु परमपिता ब्रह्मा जी को योग का तत्व समझाते हुए कह रहे हैं कि हे ब्रह्मदेव !अज्ञान से ही यह सारा संसार बंधन स्वरूप है तथा ज्ञान के द्वारा ही इस संसार से निवृत्ति हो सकती है ज्ञान स्वरुप ही आदि में है और ज्ञान के माध्यम से ही ज्ञेय को प्राप्त किया जा सकता है।
👉 भगवान श्री हरि समझा रहे हैं कि अज्ञान से ही यह संपूर्ण संसार बंधन युक्त है क्योंकि ईश्वर का बंधन एवं मोक्ष के निमित्त जीवात्मा के प्रति कोई भी दायित्व नहीं है। जीवात्मा स्वयं ही अपने बंधन एवं मोक्ष का कारण है। जब तक जीवात्मा इस संसार से अपने आपको जोड़ कर रखता है , मोह एवं आसक्ति रखता है । तब तक वह इस संसार को छोड़कर परमात्मा के स्वरूप को प्राप्त होने की योग्यता प्राप्त नहीं कर पाता क्योंकि वह उस सत्य स्वरुप परमात्मा को नहीं बल्कि संसार को चाहता है किंतु जिस जागृत जीवात्मा को यह सत्य मालूम हो जाता है कि संसार मिथ्या एवं परमपिता परमात्मा ही सत्य स्वरूप है ।मेरा वास्तविक स्वरूप वही है तो वह इस संसार से अपनी आसक्ति का त्याग करके उस सत्य स्वरूप को ही अपना परम लक्ष्य स्वीकार कर लेता है। इससे वह संसार में जीवन जीता हुआ कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए उनमें आसक्ति का त्याग कर देता है ।संसार के कर्तव्य कर्मों का पालन करते हुए आवश्यक भोगों को भोगता तो है किंतु उनमें आसक्ति का त्याग कर देता है। इसी सत्य ज्ञान को धारण करने से वह जानने योग्य परमात्मा को जान पाता है, प्राप्त कर पाता।
🌞👉 जिसके द्वारा अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो और केवल्यपद ,परमपद निष्कल, निर्मल, सच्चिदानंद स्वरुप ,उत्पत्ति स्थिति ,संहार एवं स्फुरण का ज्ञान हो ,वही वास्तविक ज्ञान है।
👉 भगवान श्रीहरि कह रहे हैं कि जिस ज्ञान के द्वारा जीवात्मा अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर सके, संपूर्ण दोषों से रहित कैवल्य अवस्था जिसे परमपद कहते हैं ।संपूर्ण कलाओं से रहित जो स्वरूप है ,उसका ज्ञान करवाने वाले ज्ञान की पद्धति को ही वास्तविक ज्ञान कहते है। जहां तक बात है जीवात्मा को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने की तो उस वास्तविक स्वरूप का ज्ञान सिर्फ और सिर्फ योग पद्धति के अलावा किसी भी प्रकार से प्राप्त नहीं किया जा सकता ।जब तक योग की क्रियाओं के माध्यम से सत् चित आनंद ब्रह्म तत्व तक नहीं पहुंचा जाता, मन को योग की क्रियाओं से क्रिया हीन नहीं बना दिया जाता। तब तक आत्मा के वास्तविक स्वरूप का किसी भी प्रकार से ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। ग्रंथों के पठन से ,गुरु के शब्दों से ,आत्मा के वास्तविक स्वरुप को नहीं समझा जा सकता। सिर्फ और सिर्फ साधना पद्धति को अपनाकर आत्म साक्षात्कार करने पर ही आत्म ज्ञान प्राप्त होता है ,तभी जीवात्मा मुक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर हो पाता है अतः योग पथ ही वह मार्ग है जो संपूर्ण सत्य ज्ञान का मार्ग दिखाता है। गुरु मार्गदर्शन करता है, राह में आने वाली बाधाओं से बचाकर आगे बढ़ाता है किंतु मार्ग पर चलना स्वयं को ही पड़ता है,तभी वास्तविक सत्य ज्ञान का बोध होता है।
- क्रमशः
🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜
माँ आदिशक्ति कुंडलिनी योग परिक्रमा मार्ग झालरापाटन 🔥
🔱 जय गुरुदेव🔱
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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