🕉🌞योग तत्वोपनिषद -3🌞🕉
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🌞 भगवान श्री हरि विष्णु ब्रह्मा जी को योग का तत्व समझाते हुए कह रहे हैं कि --वह निष्कल (कला रहित) मल रहित, शांत सर्वातीत ( सब से परे) निरामय ( रोग रहित )तत्व जीव रूप में पुण्य और पाप के फलों से पूर्ण हो जाता है।
👉 वह परमपिता परमात्मा सत चित आनंद पूर्ण पवित्र एवं समस्त प्रकार के तत्वों से रहित है। तत्वों का होना ही अशुद्धि का धोतक है। जो तत्व जितना स्थूल है ,वह तत्व उतना ही शरीर में अशुद्धि को उत्पन्न करता है और जो तत्व जितना सूक्ष्म है, उतना ही वह तत्व परब्रह्म परमात्मा के नजदीक है।जैसे जैसे साधक योग साधना में उच्च स्तर को प्राप्त करता जाता है वैसे वैसे उसका शरीर स्थूल तत्वों को छोड़ता जाता है एवं उसमें सूक्ष्म तत्वों का आधिक्य होता जाता है और अंत में संपूर्ण शरीर में आकाश तत्व का आधिक्य हो जाता है ।संपूर्ण शरीर प्रकाश तत्व से भर जाता है। संपूर्ण नाड़ियां दिव्य हो जाती है । उस स्थिति में सत चित आनंद परम ब्रम्ह परमात्मा जो निष्कल है ।तत्व अतीत है ,उसका स्वरूप प्रकट होता है। वह स्थूल तत्व नहीं, वह तत्वातित अर्थात समस्त तत्वों से परे है किंतु वही तत्वातित तत्व सृष्टि में उत्पन्न होने के लिए जीव भाव को ग्रहण करता है ,जब सत्य स्वरूप आत्मा जीव भाव को ग्रहण करती है तो वह सुख एवं दुख से ग्रस्त हो जाती है जबकि परमपिता परमात्मा सुख एवं दुख से परे है। वह सत चित आनंद स्वरूप है।
🌞👉 यहां यह प्रश्न उठता है कि जब वह परमात्मा सभी भाव और पद से परे ,नित्य, ज्ञानरूप एवं माया रहित है ,तब वह जीव भाव को कैसे प्राप्त हो जाता है?
🌞 उस परमात्म तत्व में जल के सदृश स्फुरण हुआ और उसमें अहंकार की उत्पत्ति हुई तब पंचमहाभूत रूप( पृथ्वी, जल ,अग्नि, वायु एवं आकाश) धातु से गुणात्मक पिंड उत्पन्न हुआ।
🌞 उस परमात्मा ने सुख -दुख से युक्त होकर जीव भावना की, इससे उसे जीव नाम दिया गया।
🌞👉 काम ,क्रोध ,लोभ, मोह, मद ,जन्म- मृत्यु ,कार्पण्य अर्थात कंजूसी शोक, तंद्रा ,क्षुधा, तृष्णा, लज्जा ,भय, दुख, विषाद ,हर्ष आदि समस्त दोषों से मुक्ति मिल जाने पर जीव को केवल अर्थात विशुद्ध माना जाता है।
👉योग साधना के द्वारा इन सभी जीव भाव को उत्पन्न करने वाले दोषों से मुक्त होने का साधक के द्वारा अभ्यास किया जाता है, जब साधक इन सब भावों से मुक्त हो जाता है तो उसके अस्तित्व में केवल्य घटता है। वह विशुद्ध सत्य स्वरूप ही शेष रह जाता है।
🌞👉 भगवान श्री हरि विष्णु ब्रह्मा जी से कहते हैं कि अब उन दोषों को दूर करने का उपाय बतलाता हूंँ। योग विहीन ज्ञान मोक्ष देने वाला कैसे हो सकता है । ज्ञान रहित योग से भी मोक्ष नहीं प्राप्त हो सकता। इस कारण मोक्ष के अभिलाषी को ज्ञान और योग दोनों का ही दृढ़ अभ्यास करना चाहिए।
🌞 साधक के दो शब्द-- भगवान श्री हरि विष्णु सर्वप्रथम उस परमपिता परमात्मा का जो संपूर्ण ब्रह्मांड का नियंता है जो तमोगुण, रजोगुण एवं सतोगुण से अतीत अर्थात त्रिगुणातीत है । ऐसे उस परमात्मा का स्वरूप वर्णन करते है। साथ ही जिस प्रकार से वह परमात्मा आत्मा के रूप में जीव भाव को धारण करता है, उस विषय को समझाते है। जब विशुद्ध परमात्मा जीव भाव को प्राप्त करके सुख दुख से ग्रस्त होकर जीवात्मा बन जाताहै तो वह विभिन्न प्रकार के दोषों से ग्रस्त हो जाता है। जो जीवात्मा पुनः उस सत्य स्वरूप सत चित आनंद विशुद्ध परमात्मा में एकाकार होना चाहता है, उसे पुनः इन सभी दोषों से मुक्त होना पड़ता है तभी वह जीवात्मा विशुद्ध परमात्मा में एकाकार हो पाता है । यह विशुद्ध कैवल्य अवस्था मृत्यु के पश्चात नहीं बल्कि जीते जी योग साधना के माध्यम से प्राप्त करनी होती है किंतु भगवान श्रीहरि समझा रहे है कि सिर्फ योग की क्रियाओं से ही मोक्ष नहीं मिल सकता ।योग के साथ सत्य ज्ञान को जब जीवात्मा धारण करके समस्त प्रकार के तर्क वितर्क से रहित होकर सिर्फ और सिर्फ निष्कल स्वरुप को प्राप्त कर लेता है।तभी वह मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी होता है। मोक्ष प्राप्त करने का यही एकमात्र मार्ग है। इसके अलावा मोक्ष किसी भी जीवात्मा को प्राप्त नहीं हो सकता किंतु वर्तमान में न जाने कौन कौन सी मिथ्यावादी कल्पनाएं चला कर मोक्ष प्राप्त करने का पाखंड पूर्ण असत्य मार्ग बताया जाता है जोकि काल्पनिक एवं वेद विरूद्ध है।
👏 सत्य सनातन ज्ञान ही मानव मात्र ही नहीं प्राणी मात्र के कल्याण के लिए है। यदि आप शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नति की ओर अग्रसर होना चाहते हैं तो उपनिषदों में व्याप्त ब्रह्म विद्या का ज्ञान ग्रहण कीजिए। योग विद्या के साथ-साथ सत्य विज्ञान को धारण कीजिए ।यही एक धर्म, अर्थ ,काम एवं मोक्ष को सिद्ध करने वाला मार्ग है , अन्य कोई नहीं।
ज्ञ -क्रमशः
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⚜🚩सत्यमेव जयते 🚩
जय गुरुदेव
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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