🕉🌞 जाबाल दर्शनोपनिषद 🌞🕉
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⚜️🌞 चतुर्थ खंड🌞⚜️
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👉 इस खंड में भगवान दत्तात्रेय द्वारा नाड़ी परिचय, आत्म तीर्थ तथा आत्मज्ञान की महिमा का वर्णन किया गया है। भगवान दत्तात्रेय आगे कहते हैं-
🌞 है सांङ कृति! यह मानव शरीर अपने हाथ की माप से 96 अंगुल का होता है। इस शरीर के मध्य भाग में अग्नि का स्थान निहित है। उसका वर्ण तपाए हुए स्वर्ण के सदृश है। गुदा भाग से दो अंगुल उधर्व की ओर तथा लिंग से दो अंगुल नीचे की ओर जो स्थान है, उसे ही मनुष्य देह का मध्य भाग समझना चाहिए। वही मूलाधार है। हे मुनिश्रेष्ठ! इस स्थान से नौ अंगुल उधर्व में कंद स्थान है।
🌞👉उस कंद की लंबाई चौड़ाई चार चार अंगुल की है तथा उसकी आकृति मुर्गी के अंडे की भांति है। हे मुनिश्रेष्ठ! उस कंद स्थान के मध्य भाग में नाभि केंद्र स्थित है। कंद के बीच में जो नाड़ी स्थित है, उसका सुषुम्ना नाम से उल्लेख किया गया है।
🌞👉 उस कंद के चारों तरफ 72000 नाड़ियाें का समूह स्थित है। सुषुम्ना, पिंगला,इड़ा ,सरस्वती, वरुणा पूषा ,यशस्विनी ,हस्ती जिह्वा, अलंबुषा,कूहू, विश्वोदरा , पयस्विनी, शंखिनी, और गांधारी- ये 14 नाड़ियां प्रमुख हैं।
🌞इन 14 में से भी प्रथम तीन नाड़ियां ही प्रमुख हैं। इन तीनों में से भी एक ही नाड़ी सुषुम्ना सर्वश्रेष्ठ है। शास्त्रज्ञ पुरूषों ने इसे ब्रह्म नाड़ी के नाम से संबोधित किया है।
🌞 पीठ के मध्य जो मेरुदंड है, वही हड्डियों का समुच्चय है। इससे होकर सुषुम्ना नाड़ी मस्तिष्क तक पहुंचती है।
🌞 हे मुनीश्वर! नाभि कंद से दो अंगुल नीचे कुंडलिनी स्थित है। इसको अष्ट प्रकृति रूपा( पृथ्वी ,जल अग्नि, वायु आकाश , मन ,बुद्धि और अहंकार) कहा गया है। यह अपने मुख से ब्रह्मरंध्र के मुख को ढक कर रखती है। सुषुम्ना के बाएं भाग में इड़ा और दाहिने भाग में पिंगला स्थित है।
🌞 हे मुने! अपनी इस देह में सिर के स्थान पर श्रीशैल नाम से युक्त तीर्थ स्थित है। ललाट में केदार तीर्थ प्रतिष्ठित है। हे महाप्रज्ञ! नासिका एवं भ्रकुटी के बीच में काशीपुरी स्थित है।
🌞 स्तन मंडल मध्य कुरुक्षेत्र का निवास है। कमल रूपी हृदय में तीर्थराज प्रयाग स्थापित है। हृदय के मध्य क्षेत्र में चिदंबरम तीर्थ विद्यमान है। मूलाधार स्थान पर कमलालय तीर्थ स्थापित है।
🌞👉 जो ऐसे श्रेष्ठ आत्म तीर्थ का त्याग करके बाह्य क्षेत्र के तीर्थों में भ्रमण करता है, वह हाथ में रखे हुए बहुमूल्य रत्न का परित्याग कर के कांच को ही ढूंढता रहता है।
🌞👉 भाव तीर्थ ही सबसे उत्तम तीर्थ है। योगी मनुष्य अपनी आत्मा के तीर्थ में ज्यादा से ज्यादा विश्वास एवं श्रद्धा रखने के कारण जल से पूर्ण तीर्थों एवं पाषाण आदि से विनिर्मित देव प्रतिमाओं की शरण नहीं प्राप्त करते।
🌞👉 बाहरी तीर्थों से आंतरिक क्षेत्र के तीर्थ अति श्रेष्ठ हैं । ये महातीर्थ हैं, इन आंतरिक तीर्थों के समक्ष अन्य सभी तीर्थ व्यर्थ हैं।
🌞👉 शरीर के अंदर निवास करने वाला प्रदूषित मन बाहर के तीर्थों में गोते लगाने मात्र से पवित्र नहीं होता क्योंकि मदिरा से भरा हुआ घड़ा ऊपर से सैकड़ों बार पवित्र जल से धोया जाए तब भी उस घड़े के अंदर मदिरा के रहने से वह अपवित्र ही बना रहता है।अपने शरीर में ही जो विषुव योग उत्तरायण एवं दक्षिणायन काल तथा सूर्य चंद्रमा के ग्रहण हैं । उनमें नासिका एवं भौंहों के मध्य में वाराणसी आदि तीर्थों में स्नान करके मनुष्य पवित्र हो जाता है।
🌞👉 अज्ञानियों के अंत:करण की शुद्धि के लिए ज्ञान योगियों के चरणों का जल ही सर्वोत्तम तीर्थ रूप है।
🌞👉 इसी शरीर में भगवान सदाशिव के रुप में परमात्म सत्ता विद्यमान है। इन भगवान शिव को न जानने वाला मूढ, अज्ञानी मनुष्य तीर्थ, दान,काष्ठ एवं पत्थर में ही सदैव भगवान को ढूंढता रहता है।
🌞👉है साड्क्रते ! जो अपने अंतःकरण में नित्य सतत स्थित रहने वाले परमात्म तत्व की अवहेलना करके केवल मात्र बाहर की स्थूल प्रतिमाओं का ही सेवन करता है । वह हाथ में रखे हुए अन्न के ग्रास को फेंककर केवल अपनी कोहनी ही चाटता रहता है।
🌞👉 योगी मनुष्य अपनी आत्मा में ही परमात्म तत्व का दर्शन करते हैं, प्रस्तर खंड एवं काष्ठ से निर्मित प्रतिमाओं में नहीं। अज्ञानी मनुष्यों के हृदय में परमात्मा के प्रति भावना जागृत करने के लिए ही प्रतिमाओं की कल्पना की गई है।
🌞👉 इससे भिन्न न कोई पूर्व कारण है और न ही पर,जो सत्य स्वरुप ,अनुपम और प्रज्ञान घन स्वरुप है, ऐसे उस आनंदमय ब्रह्म को जो स्वयं अपने आत्मा के रुप में दृष्टिपात करता है, वही वास्तव में यथार्थ देखता है।
🌞👉 हे महामुने! यह मानव शरीर नाड़ियों का समुदाय मात्र है, जो सदां ही सारहीन है। इसके प्रति आत्मभाव का परित्याग कर के बुद्धि के द्वारा यह निश्चय करो कि मैं स्वयं ही परमात्म स्वरुप हूंँ,जो इस शरीर में रहकर भी इससे सदां ही प्रथक है, महान है ,व्यापक है तथा सभी का ईश्वर है। उस आनंदस्वरूप शास्वत परमात्म तत्व को जानकर बुद्धिमान धीर पुरुष कभी भी शोक को प्राप्त नहीं होता। हे मुने! सद्ज्ञान के बल से भेद जनक अज्ञान का विनाश हो जाने पर कौन आत्मा एवं ब्रह्म में मिथ्या भेद की बात कहेगा।
🚩साधक के दो शब्द- भाइयों बहनों! उपनिषद के इस खंड में भगवान दत्तात्रेय के द्वारा जो वास्तविक सत्य प्रकट किया गया है ,अपने आप में बहुत ही गहरा एवं सत्य का पथ प्रदर्शन करने वाला है ।वर्तमान समय में सत्य सनातन धर्म में प्रचलित विभिन्न प्रकार की मान्यताओं का यह उपनिषद स्पष्ट रूप से खंडन करता हुआ दिखाई दे रहा है। जिन दिव्य महान विभूतियों को पुराणों ने अवतार के रूप में प्रस्तुत किया है ,उनमें से अधिकांश दिव्य विभूतियों ने धर्म को सही मार्ग दिखाने एवं वास्तविक सत्य को प्रकट करने का भरसक प्रयास किया है किंतु वर्तमान में उन्हीं दिव्य चेतनाओं को आधार बनाकर के धर्म को अज्ञानता के अंधकार की ओर धकेल दिया गया है। जिन भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा विष्णु महेश का अवतार माना जाता है ,उन्हीं भगवान दत्तात्रेय के शब्दों को व्यवसायवाद में लिपट चुका धर्म कोई विशेष स्थान नहीं दे सकता। चाहे भगवान शिव के अवतार महायोगी गुरु गोरखनाथ की वाणी हो, भगवान कपिल की वाणी हो या स्वयं भगवान शिव की वाणी ,यदि उस तत्व दर्शन से व्यवसाय वाद पर चोट लगती है तो हम उसका खंडन करने से चुकेंगे नहीं ! आज हमारे लिए धर्म का वास्तविक मर्म महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर अज्ञान एवं ढोंग पाखंड का साम्राज्य हमेशा बना रहे यह आवश्यक है और यह सत्य सनातन धर्म के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति है । यदि हम धर्म के वास्तविक मर्म को समझने के लिए सत्य परक ग्रंथों की खोज करते हैं तो बाजार में संपूर्ण उपनिषदों का उपलब्ध हो पाना भी अत्यंत दुर्लभ हो गया है क्योंकि अधिकांश प्रकाशनों ने इन विशिष्ट ग्रंथों का प्रकाशन करना ही बंद कर दिया है क्योंकि इन ग्रंथों का प्रकाशन व्यवसायवाद एवं पाखंडवाद पर सीधी चोट करता है। आज हमारे लिए धर्म महत्वपूर्ण नहीं रह गया है ,बस धर्म के नाम पर हमारी दुकान कैसे चले? यही महत्वपूर्ण हो गया है और यही कारण है कि हम धर्म को सत्य से असत्य की ओर ,ज्ञान से अज्ञान की ओर, और प्रकाश से अंधकार की ओर धकेल ते जा रहे हैं। इन अवतारी दिव्य विभूतियों की वाणी ,जहां पर जाकर के ढोंग ,पाखंड ,आडंबर एवं असत्य पर चोट करती है ,वहीं से हम उन विचारों को नकारना प्रारंभ कर देते हैं ।हम हमारे अवतारों के विचारों को स्वीकार करने की स्थिति में भी नहीं है। बड़े आश्चर्य की बात है, जिन्हें हम अवतार एवं भगवान मानते हैं ,उनके शब्दों के लिए हमारे जीवन में कोई स्थान नहीं है। परमात्मा का स्वरूप साकार भी है एवं निराकार भी किंतु साकार के माध्यम से निराकार में उतरना ही जप, तप ,ध्यान आदि का मूल लक्ष्य है । जीवन भर सिर्फ साकार में अटके रहना सिर्फ और सिर्फ अज्ञान ग्रस्त बने रहने की स्पष्ट पहचान है क्योंकि उस परम चेतना का वास्तविक स्वरूप साकार नहीं है। वह तो निराकार ही है, वह निराकार ही साकार रूप में प्रकट होता है किंतु यह साकार स्वरूप मां आदिशक्ति जगत जननी प्रकृति के सहयोग से ही संभव होता है, जिसे उस परब्रह्म परमात्मा की माया कहते हैं, शिव की शक्ति का आवरण कहते हैं।
⚜️🚩 ज्योतिष विज्ञान पर आधारित पूर्ण विज्ञान सम्मत वर्ण व्यवस्था के स्थान पर शुद्ध पाखंड आधारित जन्मगत जाति व्यवस्था सनातन धर्म के लिए अभिशाप है। यह जातिवादी व्यवस्था नैसर्गिक गुण आधारित नहीं बल्कि जन्म से ही कर्मों पर रिजर्वेशन को दिखाती है, और वही कर्म समाज में भेद एवं छुआछूत का कारण बनकर समाज विकृतियों में जकडता चला गया। यह एक वर्ग को अहंकारी तो दूसरे को हीन भाव से ग्रस्त बनाती है और ये दोनों ही स्थितियां आत्म उत्थान के मार्ग में बहुत बड़ी बाधा हैं।
- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
( मेरी संपूर्ण पहचान)
-क्रमशः ⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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