Wikipedia

Search results

Monday, January 4, 2021

वैदिक युग में वर्ण व्यवस्था निर्धारण का आधार-2

🕉🌞🌞🌞🚩🌞🌞🌞🕉
                      🚩                                   🔥 वैदिक युग में वर्ण व्यवस्था का आधार  जन्म नहीं कर्म था ???

           - अखिलेश कुमार शर्मा                                      

🕉🌞 अखिलेश जी यह भी सत्य सनातन धर्म के साथ धोखा किया जा रहा है, अज्ञानता का अंधकार फैलाया जा रहा है  कि वैदिक युग में वर्ण व्यवस्था का आधार कर्म था। कर्म वर्ण व्यवस्था का आधार कभी नहीं था। वास्तविक सत्य तो यह है -वर्ण व्यवस्था के निर्धारण का वैदिक युग में आधार जन्म ही था किंतु किसी कुल ,गोत्र ,वंश में जन्म लेने से वर्ण निर्धारित नहीं होता था , बल्कि वर्ण निर्धारण का वास्तविक मापदंड "ज्योतिष विज्ञान "था। वर्ण व्यक्ति का कर्म नहीं वर्ण व्यक्ति के नैसर्गिक गुण हैं, जो उसे माँ आदिशक्ति जगत जननी प्रकृति से प्राप्त होते हैं, जन्म के साथ ही । जन्म के अनुसार  उस स्थान विशेष, उस समय  विशेष में इस संसार को संचालित करने वाले ग्रह नक्षत्रों की स्थिति किस प्रकार की थी ? उस अनुसार हमारे ऋषि मुनि शिशु  का  वर्ण  निर्धारित करते थे, जो कि हमारे महान साइंटिस्ट ऋषि मुनियों का  खोजा हुआ संसार का सबसे समृद्ध विज्ञान था और हैं। जिसे कभी कोई चुनौती नहीं दे सकता।ज्योतिष विज्ञान के अनुसार ही किसी भी बालक का जन्म के साथ ही वर्ण निर्धारण होता था। जिससे कि प्रकृति से प्राप्त उसकी संभावनाओं का  परिवार जनों को उसी समय बोध हो जाता था  और  उस बालक के नैसर्गिक  गुणों के अनुसार ही उसे गुरुकुल में  आगे बढ़ने  एवं अपने नैसर्गिक गुणों के अनुसार अर्जित की जाने वाली महान संभावनाओं को विकसित करने का  समुचित  अभ्यास शिक्षा पद्धति के द्वारा गुरुकुल में करवाया जाता था ,जहां तक बात है कर्म की तो जन्म से जो बालक जन्म जन्मांतर की यात्रा करते हुए अपने साथ जो मूल संस्कार लेकर आया है ,उन्हीं के अनुसार वह जीवन में आगे के कार्यों में सफलता प्राप्त कर सकता है और उसके पिछले जन्म के कर्म संस्कारों के अनुसार ही ग्रह नक्षत्रों के अनुसार उसे किसी समय विशेष एवं स्थान विशेष पर जन्म लेने की स्थिति निर्धारित होती है। इस विज्ञान के अनुसार उस समय विशेष पर यदि किसी बच्चे ने किसी शुद्र व्यक्ति के घर में जन्म लिया है एवं दूसरे बच्चे ने किसी  ब्राह्मण के घर में जन्म लिया है और दोनों का स्थान एक ही है तो दोनों की जन्म कुंडली एक समान होगी और निश्चित रूप से उनके गुण भी ग्रह नक्षत्रों से एक समान ही निर्धारित किए जाएंगे । उन दोनों बच्चों के विकास की दिशा धारा भी एक ही क्षेत्र में विशिष्ट रूप से निर्धारित होगी। यदि उस समय पर जन्म लिए दोनों बच्चों का वर्ण क्षत्रिय आता है तो एक बच्चे ने चाहे ब्राह्मण के घर में जन्म लिया है और दूसरे ने शूद्र के घर में किंतु दोनों के अंतस्थ में जीवन भर क्षत्रिय गुण का ही आधिक्य रहेगा । ऐसा बालक चाहे ब्राह्मण के घर में रहकर जप तप ध्यान का वातावरण देखेगा किंतु फिर भी  वह अपने आप को पराक्रमी एवं वीरता के गुणों से सराबोर ही पाएगाऔर  युद्ध एवं पराक्रम का उन्माद हमेशा अपने आप में महसूस करेगा। ऐसा ब्राह्मण बालक ही परम प्रतापी परशुराम के रूप में सामने आता है।  यदि भगवान परशुराम  की जन्म कुंडली वास्तविक रूप में प्राप्त हो सके तो देखा जा सकता है कि उनका मूल रूप से वर्ण क्षत्रिय ही होगा। दूसरी ओर जिस बालक ने किसी शूद्र के घर में जन्म लिया है वह अपने पिता के  आलसी, प्रमादी,  कर्तव्य हीन ,अकर्मण्य व्यक्तित्व से प्रभावित नहीं रहेगा बल्कि वह  अपने आप को प्रचंड पौरुष एवं क्रिया शक्ति से हमेशा सराबोर पायेगा । वह शूद्रता अर्थात आलस्य ,प्रमाद, अकर्मण्यता के गुणों में लिप्त रहकर जीवन निर्वहन नहीं करेगा बल्कि  कहीं न कहीं अपने प्रचंड पौरुष का प्रदर्शन करके अपने जीवन को उच्चता की ओर ले जाने का अथक प्रयास करेगा। इन दोनों बालकों के अंदर प्रचंड पराक्रम एवं वीरता का  गुण स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता रहेगा। इस वजह से वर्ण निर्धारण के साथ ही उसे कार्य विशेष के क्षेत्र में भेजने का उचित ज्ञान विज्ञान भी दिया जाता था और यहां पर इस सामाजिक कार्य में कोई जाति नहीं थी, कोई संप्रदाय वाद नहीं था, कोई भेदभाव नहीं था सिर्फ और सिर्फ शुद्ध विज्ञान के आधार पर बालक बालिकाओं का वर्ण निर्धारित किया जाता था । एक पिता के 4 पुत्र चार अलग-अलग क्षेत्रों में कार्य करते थे। एक का जन्म के अनुसार वर्ण विप्र हो सकता था तो वह ब्राह्मण कर्म करता था । दूसरे का क्षत्रिय तो वह क्षत्रिय कर्म करता था ।तीसरे का वैश्य तो  वह  वैश्य कर्म करता था। चौथे का शूद्र होने पर वह शुद्र कर्म करता था और यह व्यवस्था किसी भी प्रकार से समाज में भेदभाव प्रदर्शित नहीं करती बल्कि एक विज्ञान का प्रदर्शन करती है ,समुचित रूप में नैसर्गिक रूप से प्राप्त संभावनाओं के विकास का पूर्ण विज्ञान सम्मत आधार तैयार करती है। यह वर्ण व्यवस्था निर्धारण का विज्ञान  जितना वैदिक युग में प्रासंगिक था, आज भी उतना ही प्रासंगिक है और यह बालक - बालिकाओं के  शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास को भी पूर्ण सुनिश्चित करता है क्योंकि यह उनकी नैसर्गिक योग्यताओं के अनुसार उन्हें अपने जीवन में उन्नति प्राप्त करने का सहज अवसर प्रदान करता है। इस विज्ञान के माध्यम से माता-पिता एवं गुरुजनों को बालक बालिका की प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक संभावनाओं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है ,जिससे बालक बालिका के भविष्य निर्धारण में अत्यंत सहायता मिलती है। आज इस समाज में हो क्या रहा है? बालक बनना तो शिक्षक चाहता है किंतु माता-पिता उसे डॉक्टर बनाना चाहते हैं। यही तो सबसे बड़ी विडंबना है कि माता-पिता को बच्चे की नैसर्गिक संभावनाओं का बोध ही नहीं है। बडे ही आश्चर्य की बात है जब हमारे पास इतना विस्तृत एवं महत्वपूर्ण विज्ञान है फिर भी हम उससे समुचित लाभ नहीं उठा पा रहे हैं ।आखिरकार क्यों ?  मैं पूर्ण दावे के साथ कह रहा हूँ ज्योतिष के अनुसार जिस व्यक्ति का जैसा वर्ण और गण आता है वह चाहे लाख प्रयास कर लें फिर भी वह अपने वर्ण एवं गण  के बाहर  स्वाभाविक रूप से नहीं जा सकेगा,क्योंकि वह जो है वही उसका वर्ण एवं गण है। जन्म जन्मांतर की यात्रा के परिणाम स्वरूप उसे जो नैसर्गिक गुण प्राप्त हुये हैं ,वही तो उसका वर्ण एवं गण हैं।  प्राणायाम, धारणा, ध्यान , मंत्र जप की विज्ञान सम्मत पद्धति का  अभ्यास  करने पर ही व्यक्ति  अपने वर्ण से ऊपर उठ सकता है  जो कि  विकास की एक प्रक्रिया है।  यदि किसी ब्राह्मण के घर में शूद्र वर्ण के बालक ने जन्म लिया है  तो वह अपने इस जीवन में ब्राह्मण  कर्म के साथ कभी भी समुचित न्याय नहीं कर  सकेगा क्योंकि उसकी प्रवृत्ति इस ओर होगी ही नहीं! ऐसा व्यक्ति सिर्फ ब्राह्मण शब्द का  सहारा लेकर ऐन- केन प्रकारेण अपना पेट भरने का प्रयास करने में ही लगा रहेगा किंतु वह वास्तविक रूप में ब्राह्मणत्व को कभी भी सिद्ध नहीं कर पाएगा । सदियों से  यह  अन्याय धर्म के साथ होता आ रहा है और आज वास्तविक ब्राह्मणत्व विलुप्ति के कगार पर खड़ा है । शूद्रों ने ब्राह्मणों का चोला ओढ़ लिया है । दूसरी ओर यदि  किसी शूद्र के घर में विप्र वर्ण के बालक ने जन्म लिया है  तो यह बालक लाख विपरीत परिस्थितियों के बावजूद धर्म एवं अध्यात्म के क्षेत्र में अपना मार्ग अवश्य प्रशस्त करेगा संत शिरोमणि रविदास जी के समान ,  क्योंकि  जगत जननी मांँ आदिशक्ति प्रकृति ने उसे नैसर्गिक रूप से  वे क्षमतायें ,वे योग्यताएं देकर भेजा हैं,  जिससे कि वह संसार का मार्गदर्शन कर सके किंतु स्वार्थी समाज ने परंपराओं के नाम पर समाज को विकृत स्वरूप दे दिया है । मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं के विकास में बाधाएं उत्पन्न कर दी है फिर भी बादलों की घोर घटाओं के बीच जिस प्रकार से सूरज अपनी रोशनी प्रकाशित कर ही देता है ,उसी प्रकार जन्मजात नैसर्गिक क्षमताओं युक्त व्यक्तित्व अपनी प्रतिभा का लोहा अवश्य मनवा लेते हैं ।यही बालक है जो ब्राह्मणत्व को वास्तविक रूप में चरितार्थ करके  दिखायेगा । जन्मपत्रिका में यदि विप्र वर्ण, देव गण आया है तो चाहे उसने किसी भी जाति  या कुल में  जन्म लिया हो, वह अपने उत्कृष्ट व्यक्तित्व एवं कृत्रित्व से अवश्य यशस्वी बनेगा, इसमें कोई संशय नहीं है। इसलिए धर्म अनुयायी बंधु जनों! सत्य सनातन धर्म के साथ बहुत बड़ा धोखा  हुआ है और हो रहा है, जातिवाद के नाम पर। इस धोखे से धर्म को बाहर निकालना है, तभी  सनातन धर्म को वास्तविक रूप में बचाया जा सकेगा। वरना ब्राह्मण वेशधारी शूद्र इस धर्म को निरंतर शूद्रता  के गर्त में गिराते  रहेंगे। समय रहते संसार के सबसे वैज्ञानिक धर्म  के साथ हो रहे इस अन्याय को रोकना अत्यंत आवश्यक है, तभी सत्य सनातन धर्म की रक्षा की जा सकेगी वरना धर्म को शूद्रता के गर्त में गिरने से कभी कोई महापुरुष  बचा नहीं सकेगा क्योंकि आध्यात्मिक धर्म कर्म एवं समाज को मार्गदर्शन करने का दायित्व  पुराणों की रचना के  बाद से ही   ब्राह्मणों के हाथ में नहीं रहा बल्कि ब्राह्मणों के हाथ से यह अधिकार पाखंडीयों ने छीन  लिया है।कालखंड विशेष में कोई न कोई ब्राह्मण इस धरती पर आकर के सत्य का मार्ग प्रशस्त करने का प्रयास करता है किंतु पाखंड वादी उस महान विभूति का हमेशा घोर विरोध करके उसकी आवाज को दबाने का प्रयास करते हैं। ऐसे ही महान ब्राह्मण स्वामी दयानंद सरस्वती जी थे,  पूज्य सद्गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी थे और हैं क्योंकि गुरुदेव सूक्ष्म  शरीर से आज भी हम सबके बीच में विद्यमान है। ब्राह्मणत्व मानवता की चरम पराकाष्ठा है, इसे जप,  तप, धारणा  ध्यान करके अर्जित किया जाता है। जब की शूद्रता मानव मात्र की निम्नता गामी   प्रवृतियां ,जिन से ऊपर उठकर ही ब्राह्मणत्व  को सिद्ध किया जा सकता है। ब्राह्मणत्व मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है जोकि अपने आप में मुक्त अवस्था को दिखाता है। विप्र वर्ण धारी व्यक्ति ब्राह्मणत्व  को प्राप्त करने की दिशा में सबसे तीव्र गति से आगे बढ़ता है किंतु जन्म के आधार पर  विप्र वर्ण का व्यक्ति भी ब्राह्मण नहीं होता है। उसे भी ब्राह्मणत्व प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या के मार्ग से गुजर कर ही वहां तक जाना पड़ेगा। 

👏 इसलिए यदि  सत्य सनातन धर्म को बचाना है तो उखाड़ फेंको पाखंड वादी जातिवाद को, जिससे कि मानवीय मूल्यों का साम्राज्य फिर से संपूर्ण भारतवर्ष ही नहीं संपूर्ण विश्व में विस्तृत किया  जा सके। 

       ⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️

         ⚜️ 🚩 जय गुरुदेव 🚩 ⚜️
      ⚜️🚩 जय मांँ आदिशक्ति 🚩⚜️                          

No comments:

Post a Comment

मंदिर की पुकार

🕉️🚩🚩 मंदिर की पुकार🚩🚩🕉️ 🕉️ रुको ! रुको ! अरे! कुछ देर रुको!  कहां देखते हो ? मैं कोई और नहीं!   मैं वही हूं ,जिसके दरवाजे पर तुम खड़े...