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❓मुक्ति कामनाओं के त्याग से प्राप्त होती है या ईश्वर आराधना से ?कृपया विस्तार से समझाने का कष्ट करें!
- महावीर वैष्णव
🕉 महावीर जी जय मां आदिशक्ति ! जहां तक बात है मुक्ति की तो मुक्ति ईश्वर की उपासना एवं कामनाओं के त्याग दोनों को साथ लेकर चलने से होती है और आत्म साक्षात्कार के बिना संपूर्ण कामनाओं का त्याग संभव ही नहीं। जब "जगत मिथ्या , आत्म तत्व सत्य" का रहस्य समझ में आता है, तभी जाकर के सच्ची विरक्ति जागृत हो पाती है। इस संसार से विरक्त हो जाना कोई सहज एवं सरल प्रक्रिया नहीं है ; जिसे कि मुँह से बोले गये शब्दों के समान प्राप्त कर लिया जाए। बड़े-बड़े संत महात्मा विरक्ति का सिर्फ नाटक करते हुए दिखाई देते हैं , किंतु वास्तविक विरक्ति से वे बहुत दूर खड़े होते हैं। पूर्ण विरक्ति तक पहुंचना हर किसी के लिए सहज प्रक्रिया पूर्ण कार्य नहीं, यह स्थिति उस परमपिता परमात्मा एवं जगत जननी मां की कृपा के बिना किसी को भी सहजता से प्राप्त नहीं होती और जगत जननी मां एवं परमपिता परमात्मा की कृपा दृढ़ संकल्प के साथ कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ने वाले साधकों को ही प्राप्त होती है ,इसलिए जिसने इस संसार सागर के मकड़जाल की रचना की है, और हम सब आत्माओं को इसमें उलझा दिया है । इससे बाहर निकालने के लिए बनाने वाले की ही खुशामद करनी होगी। इसी खुशामद को पूजा ,प्रार्थना ,साधना ,उपासना आदि नामों से जाना जाता है। इस संसार सागर में गिरने का अर्थ है- शुद्ध आत्म तत्व में विकृतियों का आ जाना और इससे मुक्त होने का अर्थ है -- आत्म तत्व का विकृतियों से मुक्त हो जाना और यह सब उस परम सता की उपासना के बिना कभी भी संभव नहीं है। उसकी आराधना उपासना करना तो नितांत ही आवश्यक है; क्योंकि वही है, जो हमें इससे बाहर निकलने की इजाजत दे सकता है।उसकी इच्छा के बिना तो हम यहां से बाहर भी नहीं जा सकेंगे और इसी साधना -उपासना से साधक को आत्म तत्व का ज्ञान प्राप्त होता है। बिना आत्म तत्व का ज्ञान प्राप्त किए मुक्ति संभव नहीं । जिसने बीज की मूल संरचना को नहीं समझा, वह वृक्ष के पूर्ण विकास एवं जीवन काल को कैसे समझ सकता है? यदि किसी वृक्ष का संपूर्ण विकास जानना है तो उसे उसके पत्तों से लेकर, टहनियों से होते हुए , तने में उतर कर जड़ों को खोजना होगा। माना कि अब बीज का अस्तित्व कहीं नहीं मिलेगा क्योंकि वह वृक्ष के अंदर विलुप्त हो गया है, समा गया है, खो गया है किंतु आज जो वृक्ष दिखाई दे रहा है; यह उसी बीज का परिणाम है जो किसी समय पर बोया गया था ! तभी वह अनुसंधानकर्ता वृक्ष के संपूर्ण रहस्य का ज्ञान प्राप्त कर सकेगा। आज बीज तो नहीं है किंतु उस बीज का सूक्ष्म रूप ही विशाल वृक्ष का आकार ग्रहण कर चुका है; इसका प्रमाण अवश्य मिलेगा । उस बीज के गुण इस वृक्ष में हमेशां विद्यमान रहेंगे। वृक्ष के अंदर बीज विलुप्त हो गया या यूं कहें कि बीज ही वृक्ष हो गया । उसी प्रकार से इस शरीर के अंदर हमारी आत्मा रोम रोम में समायी हुई है और वही आत्मा परमात्मा के प्रकाश को भी धारण करती है। जो अपनी आत्मा तक पहुंच गया ,वह अपने सृजन कर्ता परमात्मा तक भी पहुंच गया । जिसने अपने मूल कारण को जान लिया और अब इस संसार से जिसको कोई भी लेना देना नहीं ,कोई आसक्ति नहीं, कोई मोह नहीं, कोई कामना नहीं , निश्चित रूप से वह अपने मूल स्वरूप में ही समा जायेगा ,अनंत काल के लिए किंतु यहां पहुंचने के बाद भी यदि कोई व्यक्ति किसी कामना को शेष रखता है; कुछ पाना एवं कुछ करने की अभिलाषा रखता है तो उसका पुनर्जन्म होना निश्चित है अर्थात स्वरूप के ज्ञान के साथ आसक्ति के त्याग होने पर ही मुक्ति संभव है ; दोनों में से एक के होने से मुक्ति नहीं होती । यह वैसी ही घटना है -- जब कोई व्यक्ति अथक परिश्रम करके प्रधानमंत्री की कुर्सी को प्राप्त करें और वहां पहुंचने पर उस पद पर स्थिरता से बैठने में परेशानी महसूस करें क्योंकि नीचे के किसी पद के कर्मों में आसक्ति अभी भी शेष है। मुक्ति के मार्ग में यह आसक्ति ही सबसे बड़ा बंधन है किंतु आत्म स्वरूप का बोध प्राप्त करना उससे भी बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि जब तक आत्म स्वरूप का ज्ञान नहीं होता, आसक्ति का त्याग अत्यंत दुर्लभ है। सच तो यह है - आत्म स्वरूप के बौद्ध के मार्ग में चलते हुए साधक इस संसार से अपनी आसक्ति को अधिकांशतया त्याग चुका होता है। यह आसक्ति के त्याग का ही वास्तविक मार्ग है। स्थूल को छोड़ते हुए सूक्ष्म में समा जाना ही आत्म अनुसंधान की यात्रा है। और सब कुछ करते हुए भी किसी विषय में आसक्त नहीं होना ; यही मुक्ति है ,यही केवल्य है, यही ज्ञान है ,यही समाधि है और यही शून्य हैं जहां सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है। बस हमें कुछ होना नहीं है जो है उसे मिटाना है और मिटाने की यात्रा ही साधना है, जप,तप,ध्यान है ;मोक्ष का मार्ग है । जिस दिन मिटा लिया उस दिन यात्रा समाप्त मुक्ति निश्चित किंतु हम मिटना नहीं ,हम कुछ होना चाहते हैं । हम खोना नहीं, कुछ पाना चाहते हैं और यही कामना मुक्ति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध है। चाह मिटी , चिंता मिटी और जैसे ये मिटी वह घटेगा जो शाश्वत सत्य है ,इस सृष्टि का मूल कारण है। किंतु यहां पर सावधान होना आवश्यक है ,चाह एवं चिंता बिना आत्म स्वरूप के ज्ञान के कभी किसी की नहीं मिटती है और यही साधना- उपासना करके प्राप्त करने की विषय वस्तु है । इसलिए जब तक आत्म स्वरूप का बोध नहीं ,तब तक चाह बरकरार रहेगी और जैसे ही उसे जाना फिर वहां पर कुछ नहीं बचेगा ,सब कुछ खो जाएगा और सब कुछ खोकर सब कुछ पा लिया जाएगा, Kintu is sthiti mein bhi कर्तव्य Bodh ka Ehsas nishchit Roop se Hona chahie. Dharm Sanskriti Satya nyaay paropkar AVN Manavta ke liye Karya karne ki chah Yahan per use Astitva ke dwara fir se Jaga Di Jaati Hai aur yah karna bhi chahie Kyunki Satya Atma Gyani hi is Sansar ko सही राह दिखा सकता है ।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
( मेरी संपूर्ण पहचान)
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