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एक जिज्ञासा है मेरी!
एक विशेष मंत्र का नियत समय औऱ विधि विधान से नित्य जाप करना औऱ दिन भर ईश्वर के भजन सुनकर मगन रहना औऱ भजन गुनगुनाते रहना।
क्या दोनों का फल एक समान है ? क्या दोनों भक्ति की श्रेणी मे आतें हैं?
दोनों में क्या श्रेष्ठ है? अथवा दोनों ही करने योग्य हैं !
इतना ही काफी है जीवन सुधारने हेतु या कुछ औऱ भी ? ?
- सीमा चौहान जी
🌞👉बहिन जी ॐ ! आपके प्रश्न हमेशा अत्यंत गहराई युक्त होते हैं और आज भी उसी गहराई को लिए हुए आपके समस्त प्रश्न हैं । किसी भी ध्यान की पद्धति का मूल लक्ष्य है -"चित्त की वृत्तियों का भटकाव रोककर एकाग्र करना अर्थात उनका निरोध करना"। ध्यान का अर्थ है-" किसी एक ही विषय का निरंतर चिंतन करते रहना"। जहां तक बात है बैठ कर सुबह शाम मंत्र जप के साथ ध्यान करने की तो यह किसी भी आत्मज्ञान के पथ पर बढ़ने वाले साधक के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पद्धति है ,जिसके बिना कोई भी साधक आत्म ज्ञान को प्राप्त नहीं कर सकता। वास्तविक रूप में देखा जाए तो सच्ची भक्ति जागृत करने का यही एक वास्तविक मार्ग है। सच्चा एवं वास्तविक भक्त बनने का यही एकमात्र वास्तविक मार्ग है क्योंकि बिना ध्यान के साधक तत्व ज्ञानी नहीं हो सकता ,उसके अंदर वास्तविक सत्य ज्ञान जागृत नहीं हो सकता । ग्रंथों के पढ़ने से भजन कीर्तन करने से हमारे अंदर परमात्मा के प्रति आस्तिक भाव जागृत होता पथ पर आगे बढ़ने का मार्ग एवं हौसला मिलता है किंतु वास्तविक सत्य ज्ञान जागृत नहीं होता । ज्ञान सिर्फ ध्यान की अनंत गहराई में ही जागृत होता है जिसे संप्रज्ञात समाधि के नाम से संबोधित किया जाता है। इसी स्थिति में साधक प्रकृति एवं पुरुष के वास्तविक सत्य को समझ पाता है। हांँ दिन भर भजन कीर्तन के माध्यम से उस परमात्मा से लो लगाए रखना ध्यान का ही एक चलते फिरते माध्यम अवश्य है। इसलिए दोनों ही मार्गो को एक साथ लेकर चलने में ही सर्वांगीण विकास छिपा हुआ है। एक सच्चे साधक एवं सच्चे भक्त के लिए दोनों मार्गों को एक साथ लेकर चलना नितांत आवश्यक लगता है। दोनों ही भक्ति मार्ग के अंतर्गत ही आते हैं और दोनों से ही उस परमपिता परमात्मा तक पहुंचने में साधक को सहायता मिलती है किंतु जहां तक बात है श्रेष्ठता कि तो नियमित रूप से सुबह-शाम बैठकर ध्यान करना चलते फिरते भजन किर्तन करने से बहुत अधिक श्रेष्ठ है। नियमित रूप से बैठकर ध्यान करने वाला साधक जिस सत्य को प्राप्त कर सकता है उसे चलते-फिरते भजन करने वाला व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। यदि अपवाद के रूप में मीरां एवं अन्य भक्तों का उदाहरण दिया जाएगा तो इसके लिए मैं पहले ही एक लेख लिख चुका हूंँ। जिनको भी इस सत्य को वास्तविक रूप में समझना हो उस लेख को ब्लॉगर पर जाकर स्वाध्याय करें। आपने आगे पूछा है कि क्या नियमित रूप से मंत्र जप एवं ध्यान करने के साथ दिनभर प्रभु के स्मरण में भजन कीर्तन करते रहना ,इतने मात्र से कल्याण हो जाएगा या इसके अलावा और कुछ भी करना पढेगा? तो निश्चित रूप से करना पढेगा । हमें हमारे व्यक्तित्व को पूर्णतया परिवर्तित करना पढेगा । खुदगर्जी पूर्ण मानसिकता से परोपकारमयी जीवन को धारण करना पढेगा ।हमें हमारे खान-पान को पूरी तरह से शुद्ध सात्विक बनाना पढेगा। मानव मात्र ही नहीं ,प्राणी मात्र के हित के लिए जीवन को लगाना पढेगा, तभी जाकर के हम वास्तविक रूप में मुक्ति के मार्ग को प्रशस्त कर सकेंगे। तभी जाकर के हमारा कल्याण होगा। तभी जाकर के हम हमारे जीवन को वास्तविक रूप में सही दिशा एवं दशा दे सकेंगे।
- रामेश्वर हिंदू
⚜🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜
🌞👉 अखिल विश्व गायत्री परिवार अकलेरा
⚜🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜
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