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Saturday, September 28, 2019

जिसने यज्ञोपवीत धारण नहीं किया ,क्या वह भी गायत्री संध्योपासना कर सकता है?

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❓  जिसने यज्ञोपवीत धारण नहीं किया है ,क्या वह भी गायत्री संध्योपासना कर सकता है?
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🌞👉आशुतोष शर्मा जी ॐ
👉यज्ञोपवीत पवित्रता के नियम को धारण करने के लिए धारण करवाई जाती है किंतु जिस व्यक्ति ने यज्ञोपवीत धारण नहीं किया ,वह भी यदि अपने जीवन में पवित्रता के नियमों का स्वाभाविक रूप से पालन करने का संकल्प लेता  है तो कोई सी भी जाति या धर्म का व्यक्ति हो निश्चित रूप से वह दैनिक संध्या करने का अधिकारी है और उसको इससे जीवन के हर क्षेत्र में लाभ के अलावा कुछ भी प्राप्त नहीं होगा और कभी भी उसको नकारात्मक परिणाम होने के बारे में सोचना भी नहीं चाहिए। अधिकांशतः देखा जाता है,जिन लोगों ने यज्ञोपवीत धारण कर रखा है ,वे भी दिन भर जर्दा -गुटखा खाते रहते हैं ।क्या वे वास्तविक रूप में यज्ञोपवीत के नियम का पालन कर रहे हैं ? क्या यह पवित्रता युक्त आचरण है? कई कर्मकांडी  ऐसे हैं  जो इस आदत से ग्रस्त है,  क्या उन्हें कर्मकांड करवाने का अधिकार है ? यदि वेदों की ओर लौटेंगे तो पता लगेगा ऐसे लोगों को  किसी भी प्रकार से धार्मिक अध्यात्मिक कार्यक्रम करवाने का कोई अधिकार नहीं है ।यह जो पवित्रता है ,वह बाहर एवं भीतर से  जितनी अधिक होगी ,उतनी ही उस परब्रह्म परमात्मा की दिव्य ऊर्जा साधक के अंदर उतरती चली जाएगी। वास्तविक रूप में यदि देखा जाए तो बाहरी पवित्रता का महत्व आंतरिक पवित्रता की आदत को जागृत एवं विकसित करने के लिए ही है किंतु आज उस वास्तविक पवित्रता के अर्थ को लोगों ने भूला दिया है। बाहर से स्नानादि करके व्यक्ति पवित्र होने को तो महत्व देता है किंतु अपने अंतस्थ में जड़ जमा चुके विकारों को दूर करने के लिए कोई प्रयास नहीं करता। गुटका खाने की आदत है ,जर्दा खाने की आदत है ,अति काम,अति क्रोध,अति लोभ ,अतिमोह ,दंभ ,दुर्भाव, द्वेष, पाखंड ,झूंठ इन सभी विकारों से मुक्त होना ही वास्तविक पवित्रता है। यहां पर बडे विषयों का तो कोई स्थान ही नहीं है ।शराब मांस तो सर्व प्रमुख वर्जित है और कोई भी प्रारंभिक साधक इस कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता क्योंकि इन सभी विकारों से मुक्त होना ही तो साधना करने का वास्तविक उद्देश्य है। संध्या उपासना के द्वारा जब हम गायत्री महामंत्र से  उस परमपिता परमात्मा एवं जगत जननी मां से प्रार्थना करते हैं तो वह पिता ,वह मां जगत जननी अपनी शक्ति से इसी कार्य को सिद्ध करती है।साधक को उन सभी विकृतियों से मुक्त करती है जो उसे मोक्ष मार्ग पर जाने में बाधा उत्पन्न करते हैं । उसके जीवन की उन बाधाओं को दूर करती है, जो उसे शारीरिक ,मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से उन्नति प्राप्त करने में बाधक है । इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को यह ध्यान अवश्य होना चाहिए कि यदि हम गायत्री महामंत्र से संध्या उपासना कर रहे हैं तो हम उस परब्रह्म परमात्मा से ,उस जगत जननी मां से ,अपने जीवन को मोक्ष मार्ग की ओर ले जाने की प्रार्थना कर रहे हैं और मोक्ष का अधिकारी वही व्यक्ति है ,जिसने संसार को मोह की दृष्टि से नहीं ,लालच की दृष्टि से नहीं, काम ,क्रोध लोभ, मोह ,दंभ, दुर्भाव , द्वेष की दृष्टि से नहीं ,बल्कि कर्तव्य भावना से ओतप्रोत होकर के ,प्रेम पूर्ण होकर के ,सेवा भाव से भर कर के ,सिर्फ सांसारिक कार्यों का निमित्त मात्र बन कर के स्वाभाविक रूप से जन सामान्य के लिए इस मां आदिशक्ति के संसार के लिए कार्य करने को अपनी आदत बना लिया है ।बस जिसने बाहर एवं भीतर की पवित्रता को वास्तविक रूप में अपने जीवन में धारण कर लिया ,वह चाहे यज्ञोपवीत धारण करता है या नहीं ,वह गायत्री संध्या उपासना का सर्वश्रेष्ठ योग्य पात्र है ।उसे मां आदिशक्ति की दिव्य ऊर्जा का आत्म साक्षात्कार मात्र कुछ ही दिनों में स्पष्ट रूप से होने लगेगा ,निश्चित रूप से होने लगेगा। शत प्रतिशत होने लगेगा।
                   -- रामेश्वर हिंदू
   ⚜🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜
🌞👉 अखिल विश्व गायत्री परिवार अकलेरा
   ⚜🚩जय मां आदिशक्ति🚩⚜

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