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Thursday, September 12, 2019

क्या स्त्री भी कुंडलिनी जागृत कर सकती है और इसका परिणाम क्या है??

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❓ क्या एक स्त्री भी योग साधना करके कुंडलिनी जागृत कर सकती है? और इसका परिणाम क्या है?

                           -- निधि त्रिवेदी
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🌞👉 बहिन निधि त्रिवेदी जी जय मां आदिशक्ति! 
-बहिन योग साधना के क्षेत्र में महिला एवं पुरुष दोनों में कोई भेद नहीं है ।एक महिला भी योग साधना कर सकती है और  महिला भी पुरुष के समान कुंडलिनी शक्ति जागृत कर सकती है। माता पार्वती ने भगवान शिव के सानिध्य में स्वयं कुंडलिनी शक्ति जागृत की थी। पुरुष में जो शक्ति वीर्य में होती है ,स्त्री के अंदर वही शक्ति रज में होती है ।प्राणवायु के सुषुम्ना मार्ग में सहस्रार चक्र तक प्रवाहित होने के बाद पुरुष का वीर्य उधर्वगामी  होकर सहस्रार चक्र में चला जाता है , उसी प्रकार से  योगिनी स्त्री का प्राण जब सुषुम्ना मार्ग में प्रवाहित होकर सहस्रार चक्र में प्रवाहित होने लगता है तो स्त्री का रज सहस्रार चक्र में प्रवाहित होने लगता है। स्त्री एवं पुरुष दोनों की  काम शक्ति का कार्य सृजन करना ही है और यह जहां पर भी जाती है सृजन ही करती है । इस शक्ति को नष्ट नहीं किया जा सकता,सिर्फ रूपांतरित किया जा सकता है । जब यह मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र के माध्यम से प्रवाहित होती है तो यह  अपने ही समान संतति का सृजन करती है। यह शक्ति युग्म में होने पर ही अपना वास्तविक अस्तित्व प्रकट कर पाती है। एक स्त्री अकेली सृजन नहीं कर सकती और एक पुरुष भी अकेला सृजन नहीं कर सकता । इस संसार को चलाने के लिए  शिव एवं शक्ति की जरूरत निश्चित रूप से पड़ेगी । पुरुष शिव है और स्त्री शक्ति दोनों का युग्म ही सृजन करने में समर्थ है। प्रत्येक सृजन का कारक योग है । बिना योग के सृजन नहीं और जब स्त्री पुरुष की यही शक्ति उधर्वगामी होकर सहस्रार चक्र में प्रवाहित होती है तो यह सहस्रार चक्र में जाकर  शिव के साथ  संयुक्त होकर  योग को प्राप्त करती है। यही योग शिव एवं शक्ति का सायुज्य है । यह शक्ति एवं शिव का योग  शक्तिहीन शिव को शक्तिशाली बना देता है। फिर यह योग ब्रह्मांड व्यापि चेतन ऊर्जा में बदल जाता है और शिव एवं शक्ति का सायुज्य प्राप्त कर चुके साधक के विचारों में असीम शक्ति भर देता है। एक सामान्य व्यक्ति के विचार इस सृष्टि में कोई भी बड़ा बदलाव करने में समर्थ नहीं होते किंतु कुंडलिनी जागृत साधक के चिंतन मात्र से संसार में बहुत कुछ बदलने लगता है। साधक अपनी इंद्रियों एवं मन को पूरी तरह से नियंत्रित करने में सक्षम हो जाता है ।यही कुंडलिनी ऊर्जा के जागरण का विशेष महत्व एवं परिणाम है और इस स्थिति तक स्त्री एवं पुरुष दोनों पहुंच सकते हैं । इसमें स्त्री एवं पुरुष का कोई भेद नहीं।

           -- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव (मेरी संपूर्ण पहचान) 
                      
        ⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️

          ⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
               ⚜️जय गुरुदेव⚜️
      ⚜️🚩जय मां आदिशक्ति🚩⚜️

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