Wikipedia

Search results

Sunday, July 7, 2019

बच्चों को महामानव कैसे बनाएं?

🕉🕉🕉🕉🌞🕉🕉🕉🕉
                 ⚜️🚩⚜️

बच्चों को महामानव कैसे बनाएं?

                               -  श्रुति सिन्हा

🕉🌞 बहिन  जय माँ  आदिशक्ति! आपने बहुत ही महत्वपूर्ण जिज्ञासा प्रकट की है। यदि वास्तविक अर्थ में धर्म का मर्म समझने का प्रयास किया जाए तो धर्म और कुछ नहीं सिर्फ और सिर्फ विकास की एक प्रक्रिया का नाम है, जिसके माध्यम से मानव प्राणी को दानव बनने से रोककर  देवता की श्रेणी में ले जाकर मानव मात्र ही नहीं बल्कि प्राणी मात्र के लिए कल्याणकारी विचारधारा को स्थायित्व प्रदान कर देना है। यदि समाज को वास्तविक अर्थ में मानवीय मूल्यों युक्त बनाना है और बच्चों को मानवता से महा मानवता की ओर ले कर जाना है तो  तो आधुनिक विज्ञान सम्मत शिक्षा के साथ वैदिक सनातन परंपरा के अनुसार आध्यात्मिक ज्ञान (योग विद्या) के साथ अस्त्र शस्त्र विद्या, यज्ञ विज्ञान एवं  उपनिषदों का ज्ञान देना अत्यंत आवश्यक है। बच्चों को महामानव के रूप में विकसित करने के लिए  वेद नहीं बल्कि उपनिषद सनातन की प्रथम आवश्यकता हैं। उपनिषदों में ही संपूर्ण अध्यात्म विद्या का रहस्य समझाया गया है। संसार का सारा ज्ञान मिलकर भी उपनिषदों का स्थान नहीं ले सकता। संख्या में उपनिषद 108 कहे गए हैं, किंतु इनकी संख्या  और भी अधिक हैं।ये बहुत बड़े एवं अति विस्तृत ग्रंथ भी नहीं हैं और वेदों के समान इनकी भाषा शैली भी कठिन नहीं है । वैसे उपनिषद वेदों का ही अंतिम भाग हैं। इन्हीं को वेदांत कहते हैं किंतु सामान्यतया जन सामान्य उपनिषदों से कहीं ना कहीं बहुत दूर हैं। वास्तविकता यह है जो धर्म का मर्म समझना चाहता है उस प्रत्येक व्यक्ति के घर में संपूर्ण उपनिषद अवश्य होने चाहिए। पूज्य सदगुरुदेव श्री राम शर्मा आचार्य जी द्वारा संपूर्ण उपनिषदों का संकलन मात्र तीन ग्रंथों के रूप में ब्रह्मविद्या खंड, साधना खंड एवं ज्ञान खंड के रूप में किया गया है। वर्तमान में उपलब्ध संपूर्ण उपनिषद मात्र ₹600 में किसी भी नजदीकी गायत्री शक्तिपीठ या शांतिकुंज हरिद्वार से प्राप्त किए जा सकते हैं । युग निर्माण चेतना केंद्र मथुरा से संपर्क साध कर आप डाक के माध्यम से भी घर बैठे संपूर्ण उपनिषद मंगवा सकते हैं। 
  👏 बच्चों को उनके कोर्स के साथ मुख्य मुख्य उपनिषदों का ज्ञान दिया जाए। संपूर्ण योग विद्या अर्थात ब्रह्मविद्या उपनिषदों में समाहित है। विज्ञान की भाषा में कहें तो गॉड पार्टिकल के अनुसंधान की संपूर्ण प्रक्रिया को विशुद्ध विज्ञान के आधार पर उपनिषदों में समझाया गया है। उपनिषद सिर्फ धार्मिक ग्रंथ नहीं बल्कि ये  विशुद्ध वैज्ञानिक ग्रंथ हैं। हमारे तत्व ज्ञानी ऋषि-मुनियों द्वारा दिए गए तत्व ज्ञान के साथ योग विद्या का प्रैक्टिकल ज्ञान भी चलता रहे। अस्त्र शस्त्र का प्रशिक्षण भी चलता रहे। आधुनिक विज्ञान सम्मत शिक्षा भी चलती रहे। यज्ञ विज्ञान भी शिक्षा पद्धति का अंग हो । यदि हम ऐसा कर सके तो वास्तविक रूप में ऐसे महामानवों को विकसित कर सकते हैं, जिनमें देवत्व का भाव कूट कूट कर भरा हो। वास्तविकता यह है -हमने समाज को योग का ज्ञान देना बंद कर दिया,  इसिलिए इस संसार में सिर्फ रोगी एवं भोगी ही दिखाई दे रहे हैं और सत्ता  हजारों सालों से सिर्फ भोगियों के हाथ में ही रही है । हमारे पास मस्तिष्क को विकसित करने की वह अद्भुत तकनीक है, जो संसार के अन्य किसी भी धर्म के पास नहीं। हम मस्तिष्क को 100% इस्तेमाल करने की सामर्थ्य जागृत कर सकते हैं। इसी को आज्ञा चक्र का संपूर्ण जागरण कहा जाता है। जिस दिन पूर्णरूपेण आज्ञा चक्र जाग्रत हो जाता है ,वही स्थिति शत-प्रतिशत प्रज्ञा के उपयोग की होती है । प्राणायाम ,ध्यान एवं गायत्री महामंत्र का जप इन सब के अभ्यास से मानव चेतना में वह प्रकाश उत्पन्न होता है, जो वास्तविक अर्थ में मानव प्राणी को देवत्व की ओर लेकर जाता है ,किंतु सनातन धर्म के साथ सबसे बड़ी विडंबना यह हो गई है कि हमने अपने वास्तविक ज्ञान को स्वयं ही मिट्टी पलीत कर लिया। आज हम सत्य का नहीं बल्कि ढोंग ,पाखंड, आडंबर का बचाव करने की मुद्रा में खड़े हो गए हैं। निश्चित है ,हम अपने पैर स्वयं काट रहे हैं। यदि कोई देवत्व प्राप्त मनुष्य सत्य का प्रकाश जन-जन तक पहुँचाना  चाहता है तो पाखंडवादी पाखंड को बचाने के लिए  अपनी ताकत लगा देते हैं। यही घटिया सोच सनातन धर्म को विकसित मानसिकता की ओर आगे नहीं बढ़ने दे रही है। सनातन के ज्ञान को कोई प्रचारित प्रसारित नहीं कर रहा किंतु आज योग विज्ञान बिक रहा है और संपूर्ण विश्व  उसे खरीद रहा है। वह भी महंगे दाम पर ,किंतु  भारतवर्ष में आज भी आश्चर्य की बात है । यह सत्य दिव्य ज्ञान उस स्तर पर विकसित नहीं हो पाया है । जिस स्तर पर होना चाहिए था।  आज संपूर्ण विश्व  सनातन के मूल ज्ञान को अपनाकर  अपनी बुद्धि को विकसित कर चुका है ।बौद्ध अनुयायी आज इसी ज्ञान के दम पर अपने विवेक को विकसित कर चुके हैं ।पाश्चात्य जगत भी इसी पद्धति का अनुसरण करके विकसित मस्तिष्क को प्राप्त कर चुका है किंतु जिस देश ने  सत्य ज्ञान दिया उसी के अनुयायी ढोंग , पाखंड ,आडंबर में लिपटे हुए हैं  और तरह-तरह की मनगढ़ंत कहानियों में उलझ कर विज्ञान के इस तर्कसंगत युग में भी न जाने कैसी-कैसी मूर्खतापूर्ण बातों पर विश्वास करके बैठे हैं। यदि धर्म अनुयायियों में वास्तविक रूप में सत्य चेतना का प्रसारण करना है तो सबको विज्ञान सम्मत साधना पद्धति "योग पद्धति "से जोड़ना होगा ।इस पद्धति में किसी को कोई दिमाग लगाने की आवश्यकता नहीं है।हमारे  ऋषि-मुनियों ने इस पद्धति को  अपने आप में  संसार की सर्वश्रेष्ठ पद्धति के रूप में विकसित किया है ।सीधा पकवान तैयार है !! बस  उठाओ और खाओ !! इसमें  जिसकी जिस जिस पकवान को खाने की क्षमता हो उस उस पकवान को खाएं और आनंद का लाभ उठाएं!!! यदि कोई डायबिटीज का मरीज है  ?कोई अस्थमा का मरीज है  ?कोई  हर्ट का मरीज है  तो अपने अपने  पथ्य -अपथ्य के अनुसार  पकवान का उपयोग करें !!! जिसको जो सूट नहीं करता ,उसे छोड़ दें अर्थात  बच्चे एवं युवा  अधिकांश आसनों का भी अभ्यास करें ।प्राणायाम करें । ध्यान करें ।मंत्र जप भी करें ।जो वृद्ध है ,बीमारी से ग्रस्त है , किसी प्रकार की अंग विकृति से ग्रस्त हैं।वे अपनी सुविधा के अनुसार आसन में बैठकर प्राणायाम करें । ध्यान करें  एवं मंत्र जप करें ।वेदों में अलग-अलग आवश्यकता के अनुसार अलग-अलग मंत्र दिए हुए हैं !! थोड़ा विशेषज्ञों से अपनी आवश्यकता  बता कर  मंत्र जान लें  और उसी अनुरूप मंत्र का जप करें ।यदि स्वास्थ्य लाभ चाहिए तो महामृत्युंजय मंत्र है ।यदि  ब्रह्म साक्षात्कार चाहिए ! संपूर्ण ब्रह्मांड के ज्ञान को प्रकाशित करने वाली दिव्य प्रज्ञा चाहिए !संपूर्ण पाप  मुलक प्रवृत्तियों से मुक्ति चाहिए!! दरिद्रता एवं कर्ज से मुक्ति चाहिए !साथ में ब्रह्म तेज के साथ अंत समय में मुक्ति चाहिए तो गायत्री महामंत्र हैं न । मंत्रों की  दिव्य शब्द शक्ति आपके व्यक्तित्व को अपनी शक्ति से आच्छादित कर लेती है  फिर आप अपनी इच्छा से नहीं  ,उस पूर्ण ब्रह्म परमात्मा एवं मां आदिशक्ति जगत जननी की इच्छा से आगे बढ़ने पर मजबूर होते हैं । हम अपने ही बुरे कर्मों की वजह से बंधन में बंधे हुए हैं ।गायत्री महामंत्र की दिव्य शब्द शक्ति हमें मनमानी करने की बिल्कुल भी इजाजत नहीं देती ।फिर आप मन माना आचरण नहीं कर सकते । फिर आप वही करेंगे जो आप से करवाया जाएगा  और यदि आप गलती करेंगे  तो स्पष्ट रूप से आप को दंड भी मिलेगा ।जो शक्ति इस संपूर्ण ब्रह्मांड को चला रही है  । उससे यह दिव्य योग ही आपको संपूर्ण विश्व  से जोड़ने में समर्थ है। जिसकी चेतना ने वास्तविक रूप में विराट चेतना से संपर्क स्थापित कर लिया ।वह संपूर्ण विश्व को उद्वेलित करने में एक न एक दिन समर्थ हो ही जाएगा। वह कुछ नहीं कर के भी बहुत कुछ कर जाएगा। संसार को वह चाहे कुछ करता हुआ दिखाई दे या न दे किंतु निश्चित रूप से वह बहुत कुछ कर जाएगा।
         ⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️  

        ⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️                
         ⚜️🚩 जय गुरुदेव  🚩⚜️

    ⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

No comments:

Post a Comment

मंदिर की पुकार

🕉️🚩🚩 मंदिर की पुकार🚩🚩🕉️ 🕉️ रुको ! रुको ! अरे! कुछ देर रुको!  कहां देखते हो ? मैं कोई और नहीं!   मैं वही हूं ,जिसके दरवाजे पर तुम खड़े...