🕉🌞⚜🚩🚩🚩⚜🌞🕉
⚜🚩⚜
साधक क्या खाएं क्या नहीं? यह उस की स्वतंत्रता का विषय है ! गुरु या मार्गदर्शक को इसमें बाधक नहीं बनना चाहिए।
--मुक्तेश्वर बनर्जी
👉https://maa-aadishaktikundaliniyog.in/
🕉🌞 मुक्तेश्वर जी यहां पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है --यदि सच्चा मार्गदर्शक है , वास्तविक सत्य का पथ दिखाने वाला गुरु है तो उस मार्गदर्शक गुरु को अपने शिष्य को वास्तविक सत्य और उस सत्य को प्राप्त करने के मार्ग में बाधक तत्वों को प्रारंभ में ही बता देना चाहिए। यदि कोई शिष्य संपूर्ण नियमों का पालन नहीं भी करता है तो वह उसकी इच्छा है । उसकी सफलता एवं असफलता के पीछे फिर गुरु की अयोग्यता कारण नहीं होगी ।यदि वह किसी नियम का पालन नहीं करता तो वह अपने लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में स्वयं बाधा बन रहा है और लक्ष्य प्राप्त होने में जो अधिक समय लग रहा है,उसके पीछे वह स्वयं ही एकमात्र कारण है ।यदि शिष्य से गुरु मुख्य बाधाओं को ही छिपा लेगा तो निश्चित रूप से आगे बढ़ते हुए उसे बार-बार ठोकरें लगेंगी ।वह गिरेगा लेकिन उसे गिरने का कारण भी पता नहीं होगा ।कम से कम चलने वाले को यह तो पता हो की मार्ग में बाधाएं क्या क्या हैं ? और जिन साधकों में चलने का हौंसला है ,जज्बा है ,जुनून है ,यदि वे मार्ग में चलने का पूरा इंतजाम करके मार्ग में चलेंगे तो फिर लक्ष्य को प्राप्त करने में अधिक समय नहीं लगता। इसलिए एक सच्चे मार्गदर्शक का प्रथम कर्तव्य है कि मार्ग में जो बाधायें हैं ,उसके संबंध में वह अपने अनुयायियों को, अपने शिष्यों को अच्छी तरह से अवगत करवा दें ताकि उन्हें मार्ग में चलने में जो अधिक समय लग सकता है ,जो कठिनाइयां आ सकती है ,उनके प्रति वे सचेत हो जाएँ। यदि कोई अनुयायी ,कोई शिष्य ,पूर्ण तल्लीनता से अध्यात्म पथ पर आगे बढ़ना चाहता है । वह हर शर्त ,हर नियम को मानने के लिए तैयार है किंतु यदि मार्गदर्शक गुरु स्वयं ही उन बाधाओं का ज्ञान नहीं रखता जो उसे आगे जाने के मार्ग में आएंगी तो ऐसी स्थिति में शिष्य किस प्रकार से आगे बढ़ेगा ?अब यदि आगे बढ़ेगा तो उसका समाधान क्या है जो बाधाएं आने वाली है? साथ ही नियमों का पालन करें या न करें !! यह साधक के विवेक के ऊपर है और गुरु या मार्गदर्शक इस संबंध में कुछ भी न बताएं !! यह तो नितांत मूर्खतापूर्ण व्यवहार हुआ, अज्ञानता पूर्ण व्यवहार हुआ !! यदि कोई गुरु शिष्य का मार्गदर्शन कर रहा है तो फिर उसने अपना कर्तव्य किस प्रकार से निभाया ? क्या उसका कर्तव्य नहीं है कि वह उसके लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में हर बाधा का निराकरण करने का प्रयास करें ? यदि शिष्य में इतना विवेक होता ,इतना ज्ञान होता कि सही क्या है और गलत क्या है ? तो फिर उसे उस गुरु के पास ,उस मार्गदर्शक के पास आने की आवश्यकता ही क्या थी ?इसलिए एक सच्चे मार्गदर्शक को स्पष्ट रूप से नियमों को समझाना चाहिए ,बताना चाहिए ।जिसको मानना है माने ,नहीं मानना है नहीं माने ।जो जितने नियमों का अधिक पालन करेगा ।उसकी मार्ग पर आगे बढ़ने की गति भी उतनी ही तीव्र होगी ।इसलिए प्रारंभिक रूप से ही किसी भी मार्गदर्शक को अपने अनुयायियों के सामने सत्य को स्पष्ट रूप से रख देना चाहिए ।अज्ञानता के अंधकार में रखना ,यह शिष्यों के साथ, अनुयायियों के साथ एक प्रकार का धोखा ही है; बहुत बड़ा धोखा।
⚜️ सत्यमेव जयते ⚜️
⚜️जय गुरुदेव⚜️
🔱🚩जय मां आदिशक्ति 🚩🔱
No comments:
Post a Comment