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Wednesday, July 10, 2019

वास्तविक संन्यास क्या है? आत्म कल्याण कैसे हो?

🕉🚩वास्तविक संन्यास एवं आत्म कल्याण का मार्ग क्या है?

👏भाइयों बहनों ! सामान्यतया लोग समझ लेते हैं कि सत्य सनातन धर्म के पथ पर चलने वाले विकासवादी नहीं होते ,'वे पलायनवादी होते हैं ।सनातन की राह पर आर्थिक उन्नति को नकार दिया जाता है और वे दुनिया से विरक्त , सांसारिक जीवन से विरक्त होकर संसार से दूर भागना चाहते हैं । मैं आप सब साधक भाइयों ,बहनों से एक बात पूछता हूंँ -वर्तमान समय में आप जितने भी साधु सन्यासियों को देखते हैं ! उन्होंने अपने घर परिवार को छोड़ दिया किंतु क्या वास्तविक अर्थ में वे विरक्त हैं? क्या उन्होंने धन-संपत्ति, माया -मोह का लोभ छोड़ दिया? क्या उन्होंने अपने व्यक्तित्व से संन्यास की वास्तविक परिभाषा को परिलक्षित किया है? वास्तविक अर्थ में यदि आप संन्यास को समझेंगे तो संन्यास आलीशान महल में भी घट सकता है और यदि संन्यास नहीं घटा ,नहीं उतरा तो आप चाहे कितने ही बीहड़ जंगल या पहाड़ों में चले जाइए । आप संन्यास के बारे में सिर्फ ढोंग कर सकते हैं , पाखंड कर सकते हैं ,आडंबर कर सकते हैं ,दिखावा कर सकते हैं किंतु आप सन्यास से कोसों दूर रहेंगे ।संन्यास होने पर जो लाभ,  जो बदलाव, जो परिवर्तन , आपके व्यक्तित्व में घटित होना चाहिए ।आप उस परिवर्तन , उन लक्षणों  , उन गुणों ,उस चरित्र को कभी भी प्राप्त नहीं कर पाएंगे और यदि आप समाज के बीच रहते हैं ।सब सुख सुविधाओं के बीच में रहते हैं । सुख सुविधाओं का भोग भी करते हैं किंतु उन सुख सुविधाओं को ही सब कुछ नहीं मान लेते ! उन सुख सुविधाओं के पीछे अंधे की तरह दौड़ते नहीं है ।वे सुख सुविधाएं ही आपके जीवन का मूल उद्देश्य नहीं है ।मिल रही है तो भोग रहे हैं अगर नहीं मिल रही तो कोई चिंता नहीं । यदि ऐसा व्यक्तित्व आपने बना लिया तो आप चाहे स्वर्ण महल में रहिए । कोई फर्क नहीं पड़ता ,आप संन्यासी ही है ।आप महल में रहते हैं ,फिर भी आप संन्यासी हैं और यदि आप जंगलों में जाकर भी मानसिक रूप से भोगों की लालसा को त्याग नहीं सके तो फिर आप संन्यासी किसी भी स्तर पर नहीं हो सकते ।इससे तो अच्छा था कि आप सांसारिक ही रहते ।भोगों को भोगते रहते , उन में डूबे रहते ,पड़े रहते ।जिस दिन आप उनसे उब जाते ,उस दिन यदि आप  सत्य की राह पर चलते  तो वास्तविक संन्यास घटित होता । आप संन्यास की परिभाषा समझ पाते ।किंतु वर्तमान में आप सिर्फ पाखंडी है ,ढोंगी है , आडंबर वादी है क्योंकि आप सन्यासी होने का नाटक कर रहे हैं। संन्यास बाहरी आवरण बदलने से घटित नहीं होता !! सन्यास मन की स्थिति है ,विचारों की स्थिति है ।यदि आप अंदर से नहीं बदल सके तो बाहर से आवरण बदल लेने से ,भगवा वस्त्र पहन लेने से ,दाढ़ी बढ़ा लेने से ,या सिर मुंडा लेने से संन्यास का कोई भी लेना देना नहीं ।आप चाहे आधुनिक रहिए , मॉडर्न रहिए ,टी शर्ट जींस पहनीय  किंतु आपके अंदर आपके विचारों में , आपकी भावनाओं में ,आसक्ति नहीं होनी चाहिए ।यह आशक्ति ही बंधन का कारण है ।भोग  बंधन का कारण नहीं। न्यायोचित तरीके से यदि आपको संसार के सर्वोच्च भोग उपलब्ध होते हैं तो उन्हें भोगने में कोई भी बुराई नहीं किंतु किसी का गला काटकर यदि आप धन संपत्ति अर्जित करना चाहते हैं तो फिर उसका दंड तो आपको एक न एक दिन निश्चित रूप से भुगतना पड़ेगा क्योंकि गलत तरीके से आया हुआ धन अपना असर दिखाए बिना नहीं रह सकता। आज आप के संचित पुण्य आपके काम आ रहे हैं किंतु जिस दिन से पुण्य समाप्त हो जाएंगे। उस दिन अन्याय पूर्ण कमाया गया आपका यह धन आपकी रक्षा नहीं कर पाएगा बल्कि विभिन्न तरीकों से आपके लिए अलग-अलग समस्याएं लेकर आएगा। इंसान चाहे कोई भी हो उसके कर्म कभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ते। जहां जहां भी जाता है ,उसके पीछे पीछे जाते हैं। कर्म न तो इस संसार में पीछा छोड़ते हैं न यहां से जाने के बाद ।कर्मों का फल जन्म जन्मांतर तक भुगतना पड़ता है । हमारे कर्म ही हमारा प्रारब्ध है। यही हमें भाग्य एवं दुर्भाग्य के रूप में अगले जन्म में प्राप्त होते हैं ।इसलिए जिस व्यक्ति को अपना आत्म कल्याण चाहिए दुखों से मुक्ति चाहिए। उसे सतर्क रहने की आवश्यकता है कि कहीं मैं कुछ गलत तो नहीं कर रहा !!आज के सुख के लिए मैं अपना भविष्य तो बर्बाद नहीं कर रहा ।  कर्म के फल ने किसी को नहीं छोड़ा। कर्म का फल आज नहीं तो कल निश्चित मिलेगा। गुरमीत सिंह जी ने  परसों यही बात कही थी कि हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं आप अपने लक्ष्य में सफल हो वास्तविकता तो यह है ना तो मैं सफल हो सकता ना मैं असफल हो सकता ।मैं जहां हूंँ,वहीं रहूंगा । यह संसार अपनी गति से चल रहा है ।मैं अपना पार्ट  अच्छी तरह से निभाने का प्रयास भर करूंगा । इस धरती पर एक से एक महानतम विभूतियां आई उन्होंने इस संसार को बदला किंतु फिर यह संसार वैसा ही हो गया। यहां पर एक से एक चमत्कारिक पुरुष आए ।उन्होंने लोगों को समझाने के लिए चमत्कार भी दिखाए और लोग बदले भी सही किंतु फिर यह संसार वैसा ही हो गया! इस संसार में एक से एक सत्य ग्रंथ लिखे गए हैं ।सत्य विचार लिखे गए हैं किंतु उन सत्य विचारों को पूर्णतया दबा दिया गया और असत्य विचारों को प्रचारित कर दिया गया ।कोई संत आता है ,सत्य को प्रचारित करता है ।वहीं  दूसरे तत्व असत्य को प्रचारित करने में लगे रहते है।  किसी को सत्य को प्रचारित करके आनंद आता है तो किसी को असत्य को प्रचारित करके आनंद आता है। किसी को दूसरे का धन छीनने में आनंद आता है तो किसी को अपनी करोड़ों रुपए की संपत्ति लुटा देने में आनंद आता है! किसी का दिल दीन-दुखी गरीबों को देखकर पसीज जाता है और उसके जेब से अपने आप पैसे बाहर आ जाते हैं और कोई ऐसा है जो किसी असहाय की धन के लोभ में गर्दन काट देता है  और क्या यह वर्तमान में नहीं हो रहा है ?क्या यह भूतकाल में नहीं होता था? जब से सृष्टि का आविर्भाव हुआ है तब से यह प्रक्रिया चल रही है और चलती ही रहेगी ,जब तक की सृष्टि जीवित है!! यहां पर हमारे लिए महत्वपूर्ण यह है कि हम किस राह को चुनते हैं ?यदि हमने सत्य ,न्याय ,धर्म ,परोपकार की राह चुनी तो हमारी आत्मा को आनंद मिलेगा ।कल्याण मिलेगा । असीम आनंद की अनुभूति प्राप्त होगी और यदि इसके विपरीत हमने खुदगर्जी ,स्वार्थ परायणता, लोभ ,लालच ,मौह  ,दंभ , दुर्भाव ,पाखंड ,झूठ का दामन पकड़ा तो फिर हम  असंख्य जन्मों के लिए दुखों से ,कष्टों से , अनेकों प्रकार के संकटों से घिर  जाएंगे क्योंकि जन्म जन्मांतर तक चलने वाली यह प्रक्रिया कभी भी समाप्त होने वाली नहीं है ।
                                  -- योगाचार्य रामेश्वर मानव 

                 सत्यमेव जयते
   ✴️ मांँ  आदि शक्ति कुंडलिनी योग, झालरापाटन ✴️
         ⚜️🚩जय गुरुदेव🚩⚜️
      ⚜️🚩जय मां आदिशक्ति🚩⚜️

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