🕉🌞 परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग है प्रेम 🌞🕉
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🌞👉 आत्म जिज्ञासु भाइयों बहनों !प्रेम ,श्रद्धा एवं विश्वास, जहां पर ये तीनों शब्द जागृत एवं जीवंत हैं , वास्तविक रूप में आध्यात्मिक पद्धति वहीं है । आप जिस पद्धति का अनुसरण करके साधना मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं,यदि आपके मन -मस्तिष्क में उस पद्धति और उस लक्ष्य के प्रति विश्वास नहीं है तो आप शरीर से अथक परिश्रम एवं क्रिया करते हुए भी उस लक्ष्य तक उतनी शीघ्रता एवं तीव्रता से नहीं पहुंच सकते ,जितनी तीव्र गति से दृढ़ विश्वास करके पहुंच सकते हो! जब किसी लक्ष्य एवं पद्धति के प्रति आपके मन मस्तिष्क में पूर्ण विश्वास जागृत हो जाता है तो आपके अंदर सच्चा भाव सच्ची श्रद्धा का जन्म होता है और उस श्रद्धा की परिणीति उस साधना पद्धति से ,उस लक्ष्य से , आपको प्रेम हो जाता है । प्रेम श्रद्धा एवं विश्वास की परिणिति है। जहां पर सच्चा प्रेम होता है ,वह समर्पण सिखाता है ,कुछ लेना नहीं ,कुछ देना सिखाता है । जब प्रेम होता है तो तल्लीनता आती है। बार-बार वही चिंतन ,वही सोच ,वही विचार मन-मस्तिष्क में आने लगते हैं । प्रेम होना अपने आप में आसक्त होने का पर्याय है। आप उस लक्ष्य के प्रति ,उस प्राणी के प्रति, उस व्यक्ति के प्रति आसक्त हो गये। वह आपकी यादों में ,मस्तिष्क में ,सांसो में समा गया ।मनुष्य उस लक्ष्य को पाने के लिए संपूर्ण न्योछावर करने के लिए तैयार हो जाता है । यह प्रेम जब इस संसार से होता है तो बंधन का कारण बनता है और यही प्रेम जब उस परमपिता परमात्मा एवं जगत जननी मां के दिव्य स्वरूप से होता है तो मुक्ति का कारण बनता है। आपके पास एक ही ऊर्जा है -सच्चे प्रेम की उर्जा! आप इसे जहां चाहें खर्च कर सकते हैं ,परिणाम दोनों जगह आएगा किंतु एक स्थान पर मुक्ति है तो दूसरे स्थान पर बंधन बांह पसार कर हमेशा खड़ा है। यही समर्पण ,यही प्रेम, यही लगाव जब हमें जप,तप, ध्यान से होता है तो हम उस लक्ष्य तक, उस सत्य तक ,बड़ी सहजता से पहुंच पाते हैं । जहां तक बात है ध्यान में बैठने के अभ्यास की ,तो यह तो शाश्वत सत्य है कि जब तक व्यक्ति किसी भी कार्य का अभ्यास नहीं करेगा ,तब तक वह स्वप्न में भी सफलता के बारे में सोच नहीं सकता। सफलता सिर्फ और सिर्फ कठोर परिश्रम एवं अभ्यास से मिलती है ।यदि अभ्यास नहीं तो सफलता भी नहीं । ठीक ही कहा है-"करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान" ।रस्सी को जब पत्थर पर रगड़ा जाता है तो धीरे-धीरे पत्थर भी कट जाता है। यही हमारे मन के साथ है। नियमित रूप से प्राणायाम करते हुए मंत्र जप के साथ जब ध्यान किया जाता है तो एक समय ऐसा आता है जब मन अपनी संपूर्ण गति छोड़कर एक स्थान पर टिकने पर मजबूर हो जाता है । तब उत्पन्न होती है ,वह दिव्य चेतना ,"जिसे ऋतंभरा प्रज्ञा कहते हैं ,"तब उत्पन्न होता है वह दिव्य प्रकाश जिसे "आज्ञा चक्र का जागरण कहते हैं ,"तब उत्पन्न होती है वह अवस्था जिसमें आप अपने आप को पूर्णतया परिवर्तित एवं रूपांतरित हुआ देख पाते हैं।
-- योगाचार्य रामेश्वर हिंदू
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
✴️ मां आदि शक्ति कुंडलिनी योग ✴️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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