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Tuesday, July 2, 2019

सोमरस क्या है???

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          ❓ सोमरस क्या है?

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👉सोमरस एक ऐसा शब्द है । जिसके विषय में भारतीय  धर्म ग्रंथों में अत्यधिक वर्णन किया गया है। देवताओं को सोमरस का पान करने वाला कहा गया है अर्थात जो इस रस को पीने की सामर्थ्य अर्जित कर लेता है उसे साक्षात देवता ही  बताया गया है, माना गया है क्योंकि उसमें देवत्व जागृत हो जाता है ,वह देने की सामर्थ्य से युक्त हो जाता है अर्थात वह देवता ही हो जाता है। ऐसा साधक सत चित आनंद स्थिति में रहने वाला होता है जो सोमरस का पान करता है ऐसा व्यक्ति जीते जी ही  देवत्व को प्राप्त कर लेता है किंतु सबसे बड़ी विडंबना इस शब्द के लिए यह रही कि  काल के गर्त  ने इस शब्द का भी अंधकारमय विवेचन कर दिया । सत्य धर्म विरोधी मानसिकता ने सोमरस को एक प्रकार की नशे की वस्तु शराब बता दिया कि देवता शराब पीते थे ,मद्यपान करते थे । क्रोध मेरे को इन पुराणों में आता है ,जिनमें न जाने कौन कौन सी कहानियां गढ़ रखी है? जिस बात को सीधे सीधे शब्दों में सहजता से आमजन को समझाया जा सकता था उसी बात को इतना उलझा कर प्रस्तुत किया गया है कि आज वे बातें सिर्फ कहानियां और पहेली बनकर रह गई है। ऐसी ही एक कहानी  पुराणों में समुद्र मंथन की आती है। जिसके अनुसार देवताओं एवं राक्षसों ने समुद्र मंथन किया और उस मंथन के परिणाम स्वरूप विभिन्न रत्न एवं अमृत प्राप्त किया। इस समुद्र मंथन का यह अमृत इसी सोमरस को प्राप्त करने की  उलझी हुई  कहानी है। समुद्र मंथन की कहानी  कुंडलिनी जागरण की साधना  को ही  उलझा कर प्रस्तुत किया गया कथानक है, जिसका वास्तविक सत्य समझने एवं समझाने वालों का वर्तमान समय में अकाल पड़ गया है। अब तो सिर्फ कहानियां सुनाने वाले व्यवसाय वादी ही दिखाई देते हैं। इस कुंडलिनी  जागरण महा साधना  पद्धति के सत्य को इतना उलझा कर कहा गया है कि आम व्यक्ति क्या अच्छे अच्छे विद्वान भी इस रहस्य को समझ नहीं पाते!भारतीय सभ्यता संस्कृति एवं सनातन धर्म की विडंबना यही रही है कि इस धर्म एवं संस्कृति को  उलझाकर  रख दिया गया है ।यही सोम शब्द के साथ हुआ है।
         सोम का अर्थ होता है -"चंद्रमा।"
👏हमारे शरीर में दो केंद्र बिंदु है एक तो है- "मस्तिष्क ",जिसका मुख्य भाग सहस्रार चक्र है ,इसे ही सोम चक्र अर्थात आनंद का केंद्र कहा गया है । दूसरा केंद्र है -सूर्य चक्र जिसका मुख्य भाग केंद्र नाभि  है किंतु इसका विस्तार नाभि से मूलाधार चक्र तक है। भगवान शिव के मस्तिष्क में चंद्रमा दिखाई देता है ।इसका अर्थ है जिस व्यक्ति ने अपने मस्तिष्क को सम कर लिया , विचार शून्य कर लिया । जिसके मस्तिष्क में शिव तत्व जागृत हो गया। उसका मस्तिष्क चंद्रमा के समान शीतलता  को उपलब्ध हो जाएगा  ।वह तपस्वी असीम आनंद  को उपलब्ध हो  जाएगा ।जब  साधक योग साधना करता हुआ अपने संपूर्ण चक्रों में ऊर्जा का प्रवाह सही सही रूप में कर लेता है तो उसका सहस्त्रार चक्र जागृत हो जाता है ।हमारे मस्तिष्क मध्य जहां पर साइंस की भाषा में पीयूष ग्रंथि है ,उस पीयूष ग्रंथि स्थान से सामान्यतया भी हार्मोन का स्राव होता रहता है किंतु जब साधक मस्तिष्क की निर्विचार अवस्था को प्राप्त कर लेता है ।उस स्थिति में पीयूष ग्रंथि से अत्यधिक हार्मोन का स्राव होता है ।मस्तिष्क के निर्विचार होने  ,प्राण का प्रवाह सहस्रार चक्र में होने  एवं  हर प्रकार की चिंताओं से मुक्त मस्तिष्क में ही  सोमरस का स्राव होता है । जब हम नींद में चले जाते हैं  उस समय हमारी संपूर्ण थकान मिटाने के पीछे भी  पीयूष ग्रंथि से निकलने वाला यह स्राव ही मुख्य कारण है क्योंकि चेतन मस्तिष्क के क्रिया शून्य होने पर पीयूष ग्रंथि विशेष रूप से हार्मोन का स्राव करने लगती है । यही स्थिति  समाधि की प्रारंभिक अवस्था प्राप्त करने पर साधक को प्राप्त होती है  जहां पर उसका मस्तिष्क विचार शून्य हो जाता है अब जैसे ही वह विचार शून्य होता है पीयूष ग्रंथि से  इस दिव्य हार्मोन का स्राव होने लगता है इसी को  वैदिक ग्रंथों ने अमृत की संज्ञा दी है जो साधक यहां तक पहुंच जाता है। वह स्पष्ट रूप से इस अनुभूति का आत्म साक्षात्कार करता है ।जिस दिन साधक पूर्ण निर्विचार अवस्था को प्राप्त होता है ।उस दिन सोम रस की वर्षा  अत्यधिक  होती है  किंतु यदि मस्तिष्क में किसी दिन कोई विचार ,कोई चिंता  हल्का सा भी प्रभाव दिखाती है तो उस दिन सोम का स्राव बाधित हो जाता है । सोमरस के स्राव पर हमारे मस्तिष्क में चलने वाले विचारों का सीधा सीधा प्रभाव होता है। किसी भी साधक को यह स्थिति आज्ञा चक्र के जाग्रत होने के पश्चात ही प्राप्त होती है  ,इससे पूर्व नहीं । सहस्रार चक्र से होने वाला स्राव दुग्ध के जैसा मीठा एवं शरीर में रोमांच पैदा करने वाला होता है ।इस रस के प्रभाव से शरीर कांतिमान एवं व्याधियों से रहित  होने लगता है। साधक का व्यक्तित्व दिव्यता पूर्ण हो जाता है ।जब  सहस्रार चक्र से  यह   सोम  रस टपकता है तो वह  मुंह में आकर गिरता है । मुंह से वह पेट में जाता है ।पेट में जाकर वह स्राव सूर्य चक्र को असीम शांति प्रदान करता है ।इससे सूर्य चक्र पोषित होता है किंतु सोमरस के  नाभि में पहुंचने से उसका पाचन होता रहता है ।जिससे साधक का शरीर दिव्य तो होता है किंतु वह दिव्यता प्राप्त नहीं हो पाती जो सोमरस के सहस्रार चक्र में अवरुद्ध होने पर प्राप्त होती है  किंतु जिसने  सोमरस को प्राप्त कर लिया ऐसा व्यक्ति जीते जी ही देवत्व को प्राप्त कर लेता है  अर्थात उसके मन  मस्तिष्क में सत प्रवृत्तियों का साम्राज्य हो जाता है ।उसका चिंतन  प्राणी मात्र के कल्याण के लिए होता है। कोई भी व्यक्ति राक्षस एवं देवता अपने कर्मों के द्वारा प्राप्त  स्तिथि से होता है ।रावण ब्राह्मण होते हुए भी राक्षस कहलाया और बहुत से शूद्र कुल में उत्पन्न ऋषियों ने अपने तपस्वी जीवन से ब्राह्मणत्व को सिद्ध किया ।अतःअधिकांशतः जो व्यक्ति सोमरस को प्राप्त कर लेता है , उसका  कृतित्व एवं व्यक्तित्व देवोपम बन जाता है किंतु यदि साधक तंत्र मार्ग से यहां पर पहुंचा है  खानपान तामसिक है तो हो सकता है ,वह अत्यंत उग्र स्वभाव को  धारण  कर ले  क्योंकि साधक के द्वारा धारणा के माध्यम से जिस स्वरुप का ध्यान किया जाता है वैसे ही गुणों का आना स्वाभाविक है।इसीलिए जिनको निश्चल मन चाहिए उन्हें निराकार स्वरूप का ध्यान करना चाहिए। 👉 खेचरी मुद्रा का सिद्ध साधक  सोमरस को  तालु छिद्र में  ज़िह्वा के प्रवेश से सहस्रार चक्र में ही रोक लेता है । इससे सोमरस नष्ट नहीं हो पाता ,उसका पाचन नहीं हो पाता । इसके पश्चात यही सोमरस विशेष सिद्धियों का कारण बनता है । योगी को अजर अमर जीवन  एवं अष्ट सिद्धि  नव निधि  की प्राप्ति पंच तत्वों को  ध्यान के द्वारा पूर्णतः विजित करने के अलावा खेचरी मुद्रा सिद्ध करने के बाद ही प्राप्त होती है ,उससे पूर्व नहीं।इन दोनों स्थितियों के अलावा  अष्ट सिद्धि नव निधियों को जागृत नहीं किया जा सकता इसीलिए खेचरी मुद्रा को समस्त सिद्धियों की जननी माना जाता है  किंतु इस मुद्रा की सिद्धि किसी विशेषज्ञ सिद्ध योगी के सानिध्य के बिना नहीं हो सकती  क्योंकि जिह्वा के निचले भाग को काटना खतरे से खाली नहीं और इसके बिना जिह्वा को तालु विवर में प्रवेश नहीं करवाया जा सकता । हांँ सोमरस को प्राप्त किया जा सकता है ,बिना खेचरी मुद्रा को सिद्ध किए किंतु उसके स्राव को नाभि में आने से रोक पाना संभव  जिह्वा के तालु  विवर में प्रवेश होने पर ही संभव होता है। इस का अर्थ है - खेचरी मुद्रा की आधी सिद्धि बिना जीह्वा  को काटे भी हो जाती है किंतु पूर्ण सिद्धि नहीं ।
👏भाइयों -बहनों !किसी भी प्रकार के नशे से या किसी भी प्रकार के रस के पीने से उस परब्रह्म परमात्मा को या देवत्व को प्राप्त नहीं किया जा सकता ।उस स्थिति को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग है -"योग मार्ग "।इस योग मार्ग पर चलते हुए ही आप स्वर्ग, मुक्ति एवं देवतुल्य जीवन प्राप्त कर सकते हैं !! अन्य सभी जो बातें हैं  वे ढोंग ,पाखंड एवं आडंबर से लिपटी हुई है । हांँ मैं इतना अवश्य कह सकता हूंँ कि सोमरस के  आनंद का अनुभव आप अपने इसी जीवन में प्राप्त कर सकते हैं ।उसका एक साइंटिफिक पूर्णतःवैज्ञानिक मार्ग है ।उस पर चलते हुए कुछ सालों की साधना के बाद  और इस अनुभूति तक पहुंचने में मैं आपकी पूर्णतया मदद कर सकता हूंँ ।इसमें आप पूर्ण आश्वस्त हो सकते हैं।
                       -- योगाचार्य रामेश्वर हिंदू
        ⚜️ सत्यमेव जयते ⚜️
  ✴️ मां आदि शक्ति कुंडलिनी योग ✴️
         🚩 जय गुरुदेव 🚩
  ⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

4 comments:

  1. रामेश्वर जी आप लेखन को छोटे छोटे टुकड़ों में बांटकर लिखे। इससे पढ़ने में असुविधा के अतिरिक्त असहजता भी दूर हो जाएगी।
    शुभकामनाये।

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    1. श्री श्री विषय को समझाना बहुत आवश्यक हो जाता है इसलिए बड़ा लेख अपने आप बन जाता है। कम शब्दों में विषय वस्तु को समझा पाना बहुत मुश्किल है।

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  2. लाजवाब लेख है और बिल्कुल सही है

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