🕉🌞द्वैत -अद्वैत क्या है? 🌞🕉
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🌞👉 आत्म जिज्ञासु भाइयों बहनों ! हम द्वैत अद्वैत की अवधारणा को सहजता से समझने के लिए विद्युत का उदाहरण लेकर अच्छी तरह से समझ सकते हैं। थर्मल पावर हाउस से विद्युत का उत्पादन होता है। यहां से विद्युत का वितरण अलग-अलग शाखाओं में अलग-अलग विभागों में हम सबको किया जाता है। उस विद्युत से संपूर्ण भूमंडल पर अलग-अलग प्रकार की मशीनों को अलग-अलग प्रकार के उपकरणों को चलाया जाता है। वह विद्युत जो एक ही है किंतु जिस उपकरण में या जिस मशीन में प्रविष्ट हो जाती है उसी उपकरण के अनुरूप कार्य करने लगती है। यहां पर विद्युत का स्वयं का कोई भी विवेक नहीं है। जिस उपकरण में जैसा सॉफ्टवेयर, जैसा सिस्टम डाला गया है। वह विद्युत वहां पर उपस्थित होकर जो उपकरण निष्क्रिय था उसको संचालित करने में उसकी ऊर्जा की पूर्ति करती है। ऊर्जा वही है किंतु उपकरण अलग अलग है ।एक ऊर्जा से चलने वाले अलग-अलग उपकरणों से आपस में एक दूसरे उपकरण को नष्ट भी किया जा सकता है ,जोड़ा भी जा सकता है , तोड़ा भी जा सकता है ,मरोड़ा भी जा सकता है जैसा उपकरणों के अंदर सिस्टम है । ऐशा कार्य ही यह ऊर्जा वहां उपस्थित होकर करती है ।यह ऊर्जा विशेष रूप से उन उपकरणों की कार्य पद्धति में कोई दखल नहीं देती। ऊर्जा का निर्माण थर्मल प्लांट से हो रहा है और अलग-अलग स्थान पर पहुंच कर वह ऊर्जा अपना कार्य कर रही है । यदि हम उपकरणों का अस्तित्व हटा दें तो वह ऊर्जा अपना कोई आकार नहीं रखती। जिस किसी उपकरण में जाती है । उसका आकार वही हो जाता है। उपकरण के आकार को हटा दीजिए ऊर्जा अपने वास्तविक स्वरूप में विलीन हो जाएगी। यही सत्य परमात्मा ,आत्मा और विभिन्न प्रकार के शरीरों के संबंध में जुड़ा हुआ है ।परमात्मा संपूर्ण आत्माओं का उद्गम स्थान है, पावर हाउस है। ऊर्जा वहीं से निकलती है । अलग अलग शरीरों में जाकर वह ऊर्जा जैसा उस शरीर के अंदर सॉफ्टवेयर है ,क्रिया पद्धति है ।वैसी ही क्रिया करने लगती है ।एक ही ऊर्जा अपने अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है किंतु वास्तविक अर्थ में जब यह आत्म ऊर्जा अपने साथ में जुड़े हुए समस्त विकारों को छोड़ देती है तो अपने वास्तविक अस्तित्व में ही जाकर विलीन हो जाती है ,समा जाती है । यही वास्तविक सत्य है इसके अलावा संसार में आत्म ज्ञान का कोई सत्य नहीं है। आत्मा जीवात्मा बनती है तब उसके साथ काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,दंभ , दुर्भाव, पाखंड , झूठ , दुख ,सुख आदि का एहसास जुड़ जाता है किंतु जब इन सब से जीवात्मा मुक्त हो जाता है तो वह शुद्ध आत्म चेतना रह जाती है । प्योर एनर्जी ,उस प्योर एनर्जी को ही परमात्मा का स्वच्छ स्वरूप कहा गया है और इसी अस्तित्व को प्राप्त होने पर आत्मा अपने मूल अस्तित्व में विलीन हो जाती है। आत्मा अपने वास्तविक स्वरूप में प्योर ऊर्जा है उसके अंदर किसी भी प्रकार का कोई विकार नहीं किंतु जैसे ही विकार आता है ।वह जीवात्मा बन जाती है और जीवात्मा के साथ दुख एवं सुख का अहसास जुड़ा हुआ है ।दुख एवं सुख के एहसास से मुक्त होते ही जीवात्मा परमात्मा के अस्तित्व में विलीन होने की योग्यता प्राप्त कर लेती है और इस स्थिति को सिर्फ और सिर्फ समाधि की अवस्था में जाकर ही प्राप्त किया जा सकता है। बिना समाधि की अवस्था प्राप्त किए यह स्थिति किसी भी प्रकार से उपलब्ध नहीं होती ।समाधि में ही जीव आत्मा शुद्ध ऊर्जा के रूप में स्थिर होती है ।
-- योगाचार्य रामेश्वर हिंदू
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Tuesday, July 2, 2019
द्वैत अद्वैत
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