🕉🌞कुंडलिनी महाशक्ति की साधना 🌞🕉
⚜🚩⚜
❓कुंडलिनी जागरण की साधना कैसे करें और किन नियमों का पालन करना आवश्यक है ??
⚜
🌞👉 कुंडलिनी शक्ति वह कॉस्मिक ऊर्जा है जो आपको शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक रूप से परिवर्तित कर असीम ऊर्जा का पुंज बना देती है ।इस साधना को जनसामान्य जितना सरल एवं सहज समझ लेता है एवं सिद्धियों को प्राप्त कर चमत्कार दिखाने की सोचने लगता है उतना आसान मार्ग नहीं है यह। यदि यह मार्ग इतना आसान होता तो आज हर कोई कुंडलिनी जागृत करके चमत्कार दिखा रहा होता।
👉 यह साधना का वह मार्ग है जो आपसे संपूर्ण समर्पण की अपेक्षा रखता है ।यदि आप सिद्धियों के बारे में सोच कर कुंडलिनी साधना करना चाहते हैं तो आप एक बात निश्चित रूप से समझ लीजिए ।आपको अपने जीवन के प्रति अत्यधिक कठोर बनना पड़ेगा ।बिना शारीरिक एवं मानसिक नियमों का पालन किए आप अपने शरीर में इस ऊर्जा को जागृत नहीं कर पाएंगे ।इतना अवश्य है -यदि आप अपने व्यक्तित्व में अत्यधिक कौशलों जैसे कि काव्य सृजन ,भाषण कला, लेखन कला आदि का विकास करना चाहते हैं तो निश्चित रुप से बिना किसी व्यवधान के आप अपने अंदर इन गुणों को कुंडलिनी साधना से विकसित कर सकते हैं किंतु विशेष सिद्धियों की जो बात है। वहां तक पहुंचने के लिए साधक को धैर्य के साथ शारीरिक एवं मानसिक नियमों का पालन करते हुए आगे बढ़ना होता है जो साधक दृढ़ संकल्प के साथ अपने आप को पूर्णतया साधना की कसौटी पर कसना चाहते हैं ,वे निश्चित ही मां आदिशक्ति का वरदहस्त प्राप्त कर सकते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।
🌞👉साधक भाइयों, बहनों! जिस कुंडलिनी महाशक्ति के रहस्य को अब तक अधिकांश गुरुओं ने गुप्त बनाके रखा है। आप सब के लिए अब वह रहस्य गुप्त नहीं रहेगा किंतु उस रहस्यमयी पथ को जानने से पहले आप सबसे निवेदन है ,यदि आप कुंडलिनी जागरण की साधना करना चाहते हैं तो आपको निम्न बातों का कठोरता से पालन करना ही होगा--
🌞 आहार-
👉 आपको अपने भोजन से समस्त प्रकार की स्ट्रांग खटाई को छोड़ना ही पड़ेगा क्योंकि कुंडलिनी जागरण के मार्ग में खटाई जहर के समान हानिकारक है। खटाई नाडियों में प्राण के संचार में अवरोध उत्पन्न करती है। उच्चस्तरीय साधना से आपके शरीर की समस्त नाड़ियां संवेदनशील हो जाती है। यदि आप खटाई का सेवन करेंगे तो आपके शरीर में अत्यधिक हानिकारक प्रभाव हो सकता है। कोल्ड ड्रिंक्स एवं आइसक्रीम से भी आपको दूर रहना है। सुबह उठते ही आपको चाय नहीं पीनी साधना करने के बाद चाय पी सकते हैं। दूध का अधिक सेवन करें ।अत्यंत फायदेमंद है।
👏 जहां तक हो सके लहसुन प्याज के सेवन से बचें क्योंकि इनके सेवन से प्राण वाही नाड़ियों में प्राण का संचार बाधित होता है और कच्चे प्याज का सेवन तो सलाद के रूप में बिल्कुल भी नहीं करें ।यह सुषुम्ना में प्राण का प्रवाह होने नहीं देता। यदि सब्जी में थोड़ा बहुत लहसुन प्याज का तड़का लगा दिया जाता है तो उससे तो इतना प्रभाव नहीं होगा किंतु सलाद के रूप में कच्चा प्याज खाना साधक के लिए अपनी साधना को अवरुद्ध करने का पूरा इंतजाम है, इसलिए यदि आप अपनी साधना को चर्म उन्नति तक लेकर जाना चाहते हैं तो अधिकांश खटाई एवं लहसुन प्याज से दूरी बनाने का प्रयास कीजिए।
👉 आपका भोजन सुपाच्य होना चाहिए जिससे सुबह का भोजन शाम तक पच जाए और शाम का भोजन रात को पच जाए। भूख से कम खाएं। सप्ताह में 1 दिन से अधिक उपवास नहीं करें।
👉 मांस - मदिरा ,तंबाकू व समस्त प्रकार के नशों से बिलकुल दूर रहें । इनसे समस्त शरीर की नाड़ियां अशुद्ध होती है ।प्राण का संचार बाधित होता है। शुद्ध शाकाहारी जीवन जीयें।
🌞 विहार-
👉 आप को समय पर सोना व समय पर उठना चाहिए। रात को 9:00 से 9:30 के बीच सो जाएं व सुबह 3:30 से 4:00 के बीच निश्चित रूप से उठ जाएं।
👉 साधना में कोई आलस्य न बरतें । कहीं पर भी जाएं प्राणायाम एवं ध्यान का अभ्यास नियमित रूप से करें । किसी कारणवश बाहर जाना पड़े तो अधिकतम 2 दिन से अधिक साधना नहीं छूटनी चाहिए।
👉यथासंभव सुबह- शाम दोनों समय साधना करें।
👏 आप इन सामान्य नियमों का पालन करने में समर्थ हैं तो निश्चित ही आप कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर पाने में समर्थ होंगे।
🌞👉संसार की जितनी भी योग की विधियां हैं , उन सबका एक ही लक्ष्य है "मन को क्रियाहीन बनाना एवं शरीर को अधिक से अधिक ऊर्जावान एवं क्रियाशील बनाना।" वर्तमान में हम जो जीवन जी रहे हैं,उसमें हम शरीर को तो कम से कम काम में लेना चाहते हैं , आराम तलब बनाकर रखना चाहते हैं ।जबकि हमारा मन हमेशा ख्याली पुलाव पकाने में लगा रहता है ।हमेशा कुछ न कुछ विचार करता ही रहता है। समस्त प्रकार का आध्यात्मिक क्रियाकलाप इसी एक बात पर खत्म हो जाता है कि मन को एकाग्र कर लिया जाए ।चाहे हिंदू धर्म हो, चाहे बौद्ध धर्म ,चाहे जैन धर्म, चाहे इसाई धर्म ,चाहे मुस्लिम धर्म यदि आत्मा की उन्नति करना चाहते हैं तो मन को एकाग्र करना ही पड़ेगा। अधिकांश धर्मों में मन को एकाग्र करने पर ही बल दिया गया है और उसी साधना पद्धति की ओर बढ़ाया गया है। जिन धर्मों में ध्यान की पद्धति नहीं है ।वे आत्म उन्नति का मार्ग नहीं दिखा सकते। आत्मा की उन्नति सिर्फ और सिर्फ ध्यान से होती है और ध्यान मन की एकाग्रता से उत्पन्न होता है। यदि योग की वास्तविक परिभाषा पूछी जाय तो वह यही है कि" चित्त वृत्तियों का निरोध हो जाये। " चित्त की भटकती हुई वृत्तियों का निरोध हो जाना ही शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। मन को एकाग्र करके शरीर की काम ऊर्जा को ऊधर्वगामी बना लेना ही" कुंडलिनी जागरण "है।
🕉🌞जनसामान्य के लिए बेहद सरल साधना पद्धति👉
⚜🚩⚜
🌞👉सर्वप्रथम आप प्रातः काल जल्दी उठ जाइए ।नित्यकर्मों स्नान आदि से निवृत्त हो जाइए एवं अपने घर के एक शांत कमरे में आसन बिछाकर सिद्धासन, पद्मासन एवं वज्रासन मे बैठने का नियमित अभ्यास कीजिए । जो इन आसनों में नहीं बैठ सकें वे सुखासन में बैठ कर अभ्यास करें। यदि घर में निश्चित साधना स्थल या पूजा स्थल है तो आप वहां पर बैठकर साधना कर सकते हैं। जहां तक संभव हो आप का मुख पूर्व दिशा की ओर होना चाहिए। यदि संभव हो सके तो एक लोठा पवित्र जल का भरकर अपने सामने रखें और शुद्ध घी का दीपक जला लें। दीपक जलाने के लिए घी अच्छी क्वालिटी का ही होना चाहिए ।
👉अब सर्वप्रथम 10 मिनट अनुलोम विलोम नाड़ी शोधन प्राणायाम अंतः कुंभक एवं बाह्य कुंभक के साथ करते हुए नाभि में उगते हुए सूर्य का ध्यान कीजिए।
👉 अनुलोम विलोम नाड़ी शोधन प्राणायाम करते हुए सर्वप्रथम बांये नासा छिद्र से स्वास अंदर भरनी चाहिए। श्वास को अंदर भरते हुए आंखें बंद कर एहसास करें कि मेरे चारों तरफ भगवान सूर्यनारायण का तेजोमयी प्रकाश फैल रहा है और मैं अपने नासा छिद्र से उस दिव्य तेजमयी प्रकाश को अपने अंदर धारण कर रहा हूंँ। इस भावना के साथ प्राण को नाभि तक गहरा भरें अर्थात पूरक क्रिया संपन्न करें।
👉 श्वास को अंदर लेने के बाद स्वास को रोक कर रखें और इस समय पर नाभि में तीव्र प्रकाश युक्त तेजोमयी सूर्य का ध्यान करें अर्थात ध्यान करते हुए अंतः कुंभक करें ।
👉 जब सांस छोड़ने की प्रबल इच्छा हो उस समय धीरे धीरे दाहिने नासा छिद्र से स्वास को बाहर छोड़ें और आपके अंदर जो कोई भी दुर्गुण या बुराई हो स्वास छोड़ते हुए चिंतन करें कि मेरी यह बुराई, यह दुर्गुण श्वास के साथ बाहर जा रहा है । इस प्रकार का चिंतन करते हुए रेचन क्रिया करें।
👉 स्वास को बाहर छोड़ने के पश्चात तुरंत श्वास अंदर नहीं ले और यथासंभव बाह्म कुंभक करें। जब बाह्म कुंभक करें उस समय ध्यान को आज्ञा चक्र पर ले आए और श्वेत शीतल प्रकाश का आज्ञा चक्र पर ध्यान करते रहें।
👏 इस प्रकार से यह एक नाड़ी शोधन अनुलोम विलोम प्राणायाम हुआ। अब जिस दाहिने नासा छिद्र से स्वास छोड़ा था ।उसी से पुनः पूरक क्रिया तेजोमई प्रकाश को अंदर धारण करते हुए करनी है ।फिर नाभि में सूर्य का ध्यान करना है तत्पश्चात बुराई को छोड़ते हुए बायें नासा छिद्र से स्वास को बाहर करना है इसी क्रिया को कम से कम 7 से 10 मिनट के बीच करना है ।
👉तत्पश्चात लगभग 3 मिनट कपालभाती प्राणायाम करें । ध्यान नाभि पर ही उगते हुए सूर्य का ।
👉अंत में 2 मिनट भ्रामरी प्राणायाम सहस्रार चक्र में चंद्रमा के समान श्वेत शीतल प्रकाश का ध्यान करते हुए करें। बाद में इसे 5 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है । भ्रामरी प्राणायाम करते समय ध्यान मस्तिष्क के उस केंद्र बिंदु पर करें , जहां पर ओमकार का नाद करते हुए कंपनों का एहसास होता है । भ्रामरी प्राणायाम के करने से मस्तिष्क ध्यान की ऊर्जा को सहन करने में समर्थ होता है और संपूर्ण मस्तिष्क की कार्यप्रणाली ठीक होती है। मस्तिष्क की नाडियां मजबूत होती है ।
🌞👉प्राणायाम की क्रिया पूर्ण होने के बाद जिस आसन में भी आप 30 मिनट तक बिना किसी परेशानी के बैठ सकें ।उस आसन में संपूर्ण रीड को बिल्कुल सीधी रखते हुए ध्यान मुद्रा में बैठ जाइए एवं भ्रकुटी अर्थात आज्ञा चक्र पर श्वेत शीतल प्रकाश से युक्त सूर्य का ध्यान करते हुए 30 मिनट तक गायत्री महामंत्र का मौन मानसिक जप कीजिए। मंत्र जप मौन मानसिक रूप से चलता रहे एवं आज्ञा चक्र पर श्वेत शीतल प्रकाश से युक्त सविता परमात्मा का ध्यान करते रहें। यदि आप जप माला से करना चाहे तो माला से भी जप कर सकते हैं । 30 मिनट में आप जितनी माला कर सकें ,प्रारंभिक तौर पर उतनी माला करें।
🔥 👉 लाल आभा से युक्त तीव्र प्रकाश का ध्यान नहीं करें वरना आज्ञा चक्र पर जैसे ही ध्यान स्थिर होगा नींद आने में अत्यधिक समस्या उत्पन्न हो जाएगी।
👉 जब ध्यान समाप्त करें तो एकदम से आंखें नहीं खोलें। हाथों को ऊपर उठाएं दोनों हाथों की हथेलियों को आपस में रगड़ कर गर्म करें। जब हथेलियां गर्म हो जाएं, आंखों के ऊपर रखें और धीरे धीरे आंखों को खोलें ।फिर धीरे धीरे हथेलियों को नीचे खिसकायें अंगुलियों से प्रकाश आने दें। इस प्रकार आंखें खोलने से ध्यान से उठने के बाद आँखें प्रकाश को आसानी से सहन कर पाती है । जब भी साधक भ्रामरी प्राणायाम करें तो इस क्रिया को करने के बाद ही आंखें खोले वरना आंखों को नकारात्मक प्रभाव हो सकता है।
🌞👉ॐकार स्वरूप परमात्मा के विराट स्वरूप एवं आदिशक्ति मां जगत जननी के विराट स्वरूप का ध्यान करते हुए ध्यान को समाप्त करें।
👉 अंत में इस मंत्र से प्रार्थना करें--
ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता, प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्।
आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं द्रविड़ं, ब्रह्मवर्चसम् ,
मह्मं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम ।।
🌞👉 इसके पश्चात लोठे में रखे पवित्र जल को अर्घ के रूप में तीन बार गायत्री महामंत्र का जप करते हुए तुलसी के पौधे या अन्य किसी पौधे पर भगवान सूर्यनारायण को अर्घ स्वरूप समर्पित कर दें ।
🌞🚩 जिन साधकों के पास शाम के समय भी साधना करने का समय हो सूर्यास्त से पूर्व साधना में बैठ जाएं एवं शाम को भी साधना करें। शाम के समय कपालभाति प्राणायाम नहीं करें । सिर्फ अनुलोम विलोम नाड़ीशोधन प्राणायाम करके ध्यान एवं मंत्र जप करना ही शाम के समय पर्याप्त है।
👉 जिन साधकों का वजन अधिक हो वे नाड़ी शोधन अनुलोम विलोम प्राणायाम के बाद 2 से 3 मिनट भ्रस्त्रिका प्राणायाम का भी अभ्यास करें किंतु जो पतले दुबले हैं ।वे भ्रस्त्रिका प्राणायाम का अभ्यास नहीं करें।
⚜🚩इस साधारण से अभ्यास में चित्तवृत्ति के निरोध एवं कुंडलिनी महा शक्ति के जागरण की संपूर्ण क्रियाओं का समावेश है। जिससे कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर मन को पूर्णतया एकाग्र किया जाना पूर्णतया संभव है ।आप मात्र 3 माह के अभ्यास से स्वयं अद्भुत परिवर्तन का अनुभव करेंगे।
👉 प्रत्येक प्रारंभिक साधक के लिए यह अभ्यास 3 महीने के लिए है ।इसके पश्चात वह साधक मुझसे संपर्क करेगा ।साधना में थोड़ा सा बदलाव आवश्यक होगा और यदि बीच में किसी भी प्रकार की कोई समस्या आती है तो परामर्श अवश्य लें।
❌❌👏 मांसाहार ,शराब एवं हर प्रकार के नशे से दूर रहें।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव (मेरी संपूर्ण पहचान)
⚜️🚩 सत्यमेव जयते🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
आत्मोन्नति आकांक्षियों हेतु अद्भुत एवं सुगम मार्गदर्शन, आत्मोन्नति में सहायता से बड़ी करुणा और कोई नहीं है, यह सर्वोच्च शिक्षा दान है।
ReplyDeleteAtisunder
ReplyDelete