🕉🌞 गोरख वाणी और गोरख योग 🌞
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🌞👉 जो बहिर्मुख मन को उन्मनावस्था में लीन किए रहता है, गम्य जगत की बातें छोड़कर आध्यात्मिक क्षेत्र की बातें करता है, सब आशाओं को छोड़ देता है, किसी से कोई आशा नहीं रखता, वह ब्रह्मा से भी बढ़कर है, ब्रह्मा उसका दासत्व स्वीकार करता है।
🌞👉 नीचे की ओर गति वाले रेतस (शुक्र )को ऊपर की ओर प्रेरित करे, ऐसा उधर्व रेता होकर जो काम को भस्म कर देता है और माया के बंधन को काट डालता है. जिसके चरणों से गंगा निकली है वह विष्णु भी उस योगी के चरण धोता है।
🌞👉 जो अजपा का जाप करता है ,ब्रह्मरंध्र( शून्य) में मन को लीन किए रहता है, पांचों इंद्रियों को अपने वश में रखता है, ब्रह्मानुभूति रूप अग्नि में अपने भौतिक अस्तित्व यानी काया की आहुति कर डालता है, योगेश्वर महादेव भी उसके चरणों की वंदना करते है।
🌞👉 बाल्यावस्था और योवन में जो व्यक्ति संयम के द्वारा इंद्रियनिग्रह करते हैं जो समय असमय में सर्वदा अपने सत पर स्थिर रह सकते हैं। जो फुर्ती से भोजन करते हैं ,कम खाते हैं. उनमें और मुझ में कुछ अंतर नहीं. वे मेरा ही शरीर है।
🌞👏 साधक के दो शब्द- यहां पर योगेश्वर गुरु गोरखनाथ जी ने योग की महिमा का अद्भुत शब्दों में वर्णन किया है। एक पूर्ण सिद्ध योगी के समक्ष ब्रह्मा, विष्णु ,महेश को भी छोटा बताया है। आम इंसान की दृष्टि से देखने पर आप को ये शब्द अतिशयोक्तिपूर्ण लगेंगे और आप शायद इन शब्दों को हजम भी नहीं कर पाएंगे किंतु हम योग की वास्तविकता को जानते ही कहाँ हैं? योग सिर्फ व्यायाम मात्र या प्राणायाम मात्र नहीं है! योग का अर्थ ही मिल जाना है, पूर्णतया विलीन हो जाना है,उस अस्तित्व में जो संपूर्ण ब्रह्मांड का कारण है ।जो ब्रह्मा ,विष्णु ,महेश से भी ऊपर त्रिगुणातीत सत चित आनंद नाद स्वरूप ब्रह्म है। जिसका कोई आकार नहीं ,कोई स्वरुप नहीं! बस वह प्रकाश एवं नाद का सम्मिलित स्वरुप है और अंत में वह क्रिया हीनशून्य है, उसी परम तत्व की उपासना गायत्री महामंत्र एवं ओमकार के द्वारा की जाती है।साधक साधना करते-करते उसी नाद स्वरूप को अपने आप में पूर्णतया धारण कर लेता है। वह मनुष्य देह में रहते हुए भी साक्षात ब्रह्म स्वरूप अर्थात पूर्णतया निर्विकल्प, निर्विचार अवस्था को प्राप्त कर लेता है। माया की आगोश में जकड़े हुए अपने मन को पूर्णतया शुद्ध पवित्र श्वेत शीतल स्फटिक के समान निर्मल बना लेता है। ब्रह्म हो जाने का अर्थ यही है कि साधक संपूर्ण मानसिक झंझावातों से मुक्त हो जाता है। यदि मन मस्तिष्क में कोई भी विचार, कोई भी क्रिया शक्ति शेष है तो वह प्रकृति के क्षेत्र में ही है। जब तक विचार जीवित हैं तब तक हम मां आदिशक्ति के ही क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। उसी की आगोश में है। ब्रह्म का स्वरूप क्रियाशील नहीं, अक्रिय है। जब तक हम कुछ करने में अटके हैं ,तब तक हम ब्रह्म का स्वरूप धारण नहीं कर सकते। ब्रह्म होने के लिए कुछ करने को छोड़ना पड़ेगा। बस शून्य होना पड़ेगा बिल्कुल शून्य!!! क्योंकि यही शिव का वास्तविक स्वरूप है, यही ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप है ,यही सच्चिदानंद स्थिति है, यही केवल्य है, यही मुक्ति है।
- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव (मेरी संपूर्ण पहचान)
⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩जय माँ आदिशक्ति 🚩⚜️
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