🕉🌞 गोरख वाणी और गोरख योग 🌞
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🌞👉 विभिन्न मत वाले पंडित अपने मत का मंडन और दूसरों के मत का खंडन करने में लगे रहते हैं, किंतु योगी को इस प्रकार के शास्त्रार्थ में नहीं पड़ना चाहिए। जैसे सभी नदियों का जल समुद्र में ही समाता है, उसी प्रकार शिष्य का विश्वास गुरु मुख वचनों में होना चाहिए। उन्हीं वचनों को मनन चिंतन द्वारा धारण करके आत्मीकरण करने में उन्हें दत्तचित्त रहना चाहिए।
🌞👉 उत्पत्ति से हम हिंदू हैं, जरणां के कारण जोगी हैं और अक्ल से मुसलमानी पीर। योगी हिंदू जन समुदाय में से ही चेला मुंडाया करते हैं। योग सिद्धि के लिए यह आवश्यक है कि गुरु मुख से पाये हुए ज्ञान को मनन चिंतन और साधना के द्वारा स्वानुभव में ला सकें। मुसलमानों में जिस प्रकार पीरों का मान है, उसी प्रकार योग मार्ग में गुरुओं का मान है।नाथ ने तो पीर शब्द को ही स्वीकार कर लिया है। उनके महंत महंत नहीं पीर कहलाते हैं, किंतु इसका यह अभिप्राय नहीं कि वस्तुत: कोई तात्विक मुसलमानी प्रभाव उन पर पड़ा हो। हे मुल्लाओं और काजियों! उस मार्ग को पहचानो जिसे ब्रह्मा विष्णु और महादेव तक ने माना है।
🌞👉 जिसने गुरु वचनों को माना उसकी दुविधा नष्ट हो गई। इसी निश्चय ने राजा भर्तृहरि को सिद्धि दी और राजा गोपीचंद को ब्रह्म परिचय यानी आत्मसाक्षात्कार कराया। इसी निश्चय ने नरपतियों को निर्द्वंद्व बना दिया, जिससे आत्मसाक्षात्कार के द्वारा वे पूर्ण परम आनंद प्राप्त करने वाले योगी हो गए।
🌞👏 साधक के दो शब्द- संसार में विभिन्न प्रकार के मतों को मानने वाले मनुष्य निवास करते हैं। हर व्यक्ति अपने मत को सही एवं दूसरे के मत को गलत बताता है। सनातन धर्म में भी अलग-अलग मतों को मानने वाले कई मार्ग हैं और इन अलग-अलग मतों में आपसी मतभेद एवं संघर्ष भी देखा जाता है। जो जिस मत को मानता है वह उस मत को सत्य एवं अन्य मत को छोटा एवं असत्य बताता है किंतु इस छोटे बड़े की वास्तविकता आत्मज्ञान के पथ पर आगे बढ़ते हुए ही पता लगती है। सभी मार्ग उस परम सत्ता तक ही पहुंचाते हैं, बस राहें अलग-अलग हैं। बस मनुष्य के समझ का भेद उत्पन्न हो गया है । यदि किसी को दिल्ली जाना है तो कई मार्ग हो सकते हैं। कई संसाधन हो सकते हैं किंतु जो जिस मार्ग से गया ,यदि उसी को सत्य मानता है तो निश्चित रूप से वह अज्ञान के अंधकार में जी रहा है । इस उधेड़बुन भरे मकड़ जाल से बाहर आने का, इस अंधकारमयी गर्त से बाहर आने का सिर्फ और सिर्फ एक ही रास्ता है - योग मार्ग ! योग मार्ग ही संसार का सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक मार्ग है और सबसे सटीक एवं तीव्र मार्ग । इसी को ब्रह्मपथ एवं ब्रह्मा विद्या कहा गया है। यही श्री विद्या है एवं यही तंत्र सार। यही शक्ति मार्ग है एवं यही मुक्ति मार्ग ।
मानव तन को वेदों ने अति दुर्लभ बताया है। पूर्ण ब्रह्म परमपिता परमात्मा के स्वरुप को प्राप्त करने का एक मात्र साधन बताया है। उस अमूल्य मानव-देह को प्राप्त करके भी मनुष्य दीन-हीन जीवन जीता हुआ परमात्मा की खोज में दर-दर भटकता हुआ ही मृत्यु को प्राप्त हो जाता है किंतु उसे सत्य राह का ज्ञान ही नहीं हो पाता।
👉 महायोगी गुरु गोरखनाथ ने मुसलमानों को संबोधित करके कहा है कि योग मार्ग का अनुसरण ब्रह्मा, विष्णु एवं महादेव ने भी किया है। इन त्रिदेव की शक्ति का स्रोत भी योग मार्ग ही है। उस प्रकाश स्वरूप ओंकार रूपी नाद ब्रह्म से ही त्रिदेव को शक्ति प्राप्त होती है।इसलिए योग मार्ग संसार का सर्वश्रेष्ठ आध्यात्मिक मार्ग है।
👉 योग मार्ग पर चलते हुए साधक को सर्वप्रथम गुरु के वचनों पर विश्वास करना चाहिए और गुरु के बताए हुए मार्ग पर यम नियम का पालन करते हुए चलना चाहिए़। कुछ दिन की साधना के बाद तो साधक स्वयं ही अपने आप में सत्य का साक्षात्कार करता चला जाता है। इस राह पर यदि साधना का पथ सही है एवं गुरू योग पथ का ज्ञान रखता है तो निश्चित ही शिष्य सिद्धावस्था को प्राप्त कर लेता है।
👉 योग के पथ पर चलते हुए दृढ़ संकल्प एवं निश्चय के साथ आगे बढ़ना होता है जो साधक नियमित साधना करता है। वह निश्चित ही स्वयं आत्मसाक्षात्कार अर्थात ब्रह्म साक्षात्कार करने का सौभाग्य प्राप्त करता है। राजा भर्तृहरि एवं राजा गोपीचंद राजपाट छोड़कर योग पथ पर चले गए किंतु योग पथ पर आगे बढ़ने के लिए किसी को भी घर बार छोड़ने की आवश्यकता बिलकुल नहीं होती बल्कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए योग साधना बिल्कुल सहजता से की जा सकती है। जब तक व्यक्ति का जीवन व्यवस्थित नहीं होगा, तब तक वह नियमित रूप से योग साधना नहीं कर सकता। इसलिए प्राचीन समय के समस्त ज्ञानी ऋषि मुनि गृहस्थ थे। कालांतर में योग के प्रति ऐसी धारणा बना दी गई कि यह तो संन्यासियों का मार्ग है जबकि एक संन्यासी सहजता से से योग मार्ग का अनुसरण कर ही नहीं पाता। सनातन धर्म में आश्रम व्यवस्था जिस विज्ञान के तहत बनाई गई थी उसमें ब्रह्मचर्य आश्रम के द्वारान ही बालक को योग विद्या में निक्षणात कर दिया जाता था । और वह अपनी समस्त व्रतियों पर विद्या अध्ययन काल में ही नियंत्रण स्थापित कर लेता था। गृहस्थ के कर्तव्यों का पालन करते हुए भी वह योग युक्त मार्ग का अनुसरण करता था एवं पंच यज्ञों का अनुष्ठान करता था। और 50 वर्ष की आयु में वह गृहस्थी के दायित्वों से मुक्त होकर समाज के संपर्क में रहते हुए समाज के हित में कार्य करता था। 75 वर्ष की अवस्था के बाद में जाकर के सन्यास ग्रहण किया जाता था। जीवन काल की जिस अवस्था में परिवार जनों की सबसे अधिक आवश्यकता होती है ,उस अवस्था में घर को छोड़कर विरक्त रहना, यह अपने आप में संसार का सर्वोच्च त्याग था। जीवन भर जिस परिवार एवं समाज के लिए अपना सब कुछ दिया अंत समय में उस परिवार एवं समाज से कोई अभिलाषा नहीं, कोई मोह एवं आसक्ति नहीं ! क्योंकि आशक्ति ही बंधन है, कामना ही बंधन है, लगाव ही बंधन है। सन्यास योग की उपलब्धि के लिए नहीं बल्कि सन्यास योग की उपलब्धि के बाद लिया जाता था और योग की प्राप्ति के बाद लिया गया संन्यास ही वास्तविक सन्यास होता है। क्योंकि यहीं से कामना रहित जीवन जीने की प्रथम सीढ़ी तैयार होती है अतः योग धर्म का पालन करने के लिए ब्रह्मचर्य, गृहस्थ एवं वानप्रस्थ आश्रम ही श्रेष्ठ हैं। संन्यास आश्रम तो योग मय होकर जीने के लिए हैं। आओ हम प्रयास करें की सनातन धर्म के मूल मूल्यों को समझें और उन्हें स्थापित करने का प्रयास करें क्योंकि वर्तमान में सनातन के नाम पर बहुत अधिक पाखंड फैलाया जा रहा है। vartman Samay to aisa hai Jahan per Sanyas ki paribhashaen hi Badal gai hai. जिसे संसार ना मिला, वह सन्यासी हो गया।
जिसे ज्ञान ना मिला, वह गुरु हो गया।।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव (मेरी संपूर्ण पहचान)
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
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