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Friday, July 5, 2019

विज्ञान भैरव तंत्र 11

🕉🌞विज्ञान भैरव तंत्र 🌞🕉

                ⚜️🚩⚜️
               ⚜धारणा 5 ⚜

https://maa-aadishaktikundaliniyog.in/

🌞👉 माता पार्वती को उस सत्य स्वरूप सच्चिदानंद परमात्मा के वास्तविक स्वरूप का  आत्मबोध प्राप्त करने का मार्ग बताते हुए भगवान शिव कहते हैं--  हृदय से अथवा मूलाधार से लेकर द्वादशांत तक चंद्र और सूर्य के समान अपनी किरणों से प्रकाशित हो रही तथा क्रमशः सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था की ओर अग्रसर हो रही उस पवन की शक्ति का चिंतन करें, जो कि द्वादशान्त  में जाकर शांत हो जाती है ।नाम और रूप से अतीत अवस्था को प्राप्त कर लेती है ।इस प्रकार के अभ्यास से अत्यंत सूक्ष्म ध्येय के आकार के भी विगलित हो जाने पर योगी भैरव स्वरूप हो जाता है अर्थात उसकी स्वाभाविक भैरव दशा का आविर्भाव हो जाता है ।
              👉नेत्र तंत्र की टीका में क्षेमराज ने तथा तंत्रालोक की टीका में जयरथ ने इस श्लोक को  लेकर जो विवरण प्रस्तुत किया है , तदनुसार यहां द्वादशांत पद से ब्रह्मरंद्र का ग्रहण किया जाना ही उचित है ।मूलाधार में अथवा हृदय में विद्यमान प्राणशक्ति योगिक पद्धति के अनुसार सुषुम्ना मार्ग से अथवा मध्य दशा के विकास के कारण   ब्रह्मरंद्र तक जाते जाते अत्यंत सूक्ष्म होकर अंत में प्रकाश में विलीन हो जाती है और साधक अपने बौद्ध भैरव स्वरुप को प्राप्त कर लेता है ,जान लेता है ।
🌞 साधक के दो शब्द-- इस मंत्र में "आमूलात "शब्द का प्रयोग हुआ है ।वैदिक  योग पद्धति के आधार पर प्राण का मूल केंद्र बिंदु नाभि  कंद को माना गया है क्योंकि नाभि कंद से ही  प्राण ऊर्जा को संपूर्ण शरीर में प्रवाहित करने वाली नाडियों का तंत्र फैला हुआ है ।साथ ही चेतन ऊर्जा का केंद्र बिंदु देखा जाए तो उसका प्रारंभिक केंद्र मूलाधार चक्र को माना जाता है । अपने व्यक्तिगत साधनात्मक अनुभव के आधार पर यदि मैं इस तथ्य को समझाऊं तो वास्तविक रूप में ऊर्जा का अस्तित्व मूलाधार चक्र से ही शुरू होता है किंतु हमारी  कुंडलिनी ऊर्जा  का  अधिकांश भंडार काम का केंद्र स्वाधिष्ठान चक्र ही है, जो नाभि से दो तीन अंगुल नीचे ही बैठता है । स्वाधिष्ठान चक्र पर धारणा ध्यान का अभ्यास करने पर ही वास्तविक अर्थ में काम ऊर्जा को साधक सहस्रार चक्र की ओर प्रेषित करने में समर्थ होता है । सत्य अर्थ में देखा जाए तो हमारी जीवनी शक्ति यही काम उर्जा है। यही सृष्टि को आगे ले जाने का कार्य कर रही है ।यही शक्ति है जो सृजनात्मकता का जन्म  करती है ।यदि इस शक्ति का उपयोग  जनन  इंद्रिय के माध्यम से किया जाएगा  तो यह बाहर जाने पर  भी सृष्टि का निर्माण ही करेगी और यदि इस ऊर्जा को  गहन साधना करके सहस्रार चक्र की ओर प्रेषित करने में साधक समर्थ हो जाएगा,  तो यह ऊर्जा प्रकृति के रहस्यों को समझने  एवं  इस प्रकृति में  बहुत कुछ  सृजनात्मक घटित करने में साधक को समर्थ बना देगी ।इसलिए जीवनी ऊर्जा का मूल स्थान स्वाधिष्ठान चक्र ही है  और  इसका प्रारंभिक केंद्र बिंदु मूलाधार चक्र को ही माना जाएगा। प्राण को लेने एवं बाहर फेंकने का कार्य हृदय के द्वारा संपन्न होता है किंतु  प्राण ऊर्जा को विस्तृत करने का कार्य नाभि केंद्र से ही पूर्ण होता है ।विज्ञान भैरव तंत्र के अनुसार प्राण का केंद्र बिंदु अधिकांशतः हृदय को ही  मानकर धारणाओं का तत्वज्ञान समझाया गया है किंतु इस श्लोक का स्पष्ट अर्थ यदि हम करना चाहेंगे  तो हमें  शक्ति का मूल स्थान मूलाधार चक्र एवं अंतिम स्थान पर ब्रह्मरंध्र स्थान को ही मानना पड़ेगा क्योंकि मूलाधार चक्र से ब्रह्म रंध्र पर्यंत साधक जब धारणा -ध्यान का अभ्यास करता है तो वह सूक्ष्म  से सूक्ष्मतर अवस्था को प्राप्त करता हुआ चला जाता है और अपने सत चित आनंद स्वरुप को प्राप्त कर लेता है ,जान लेता है।
       ⚜️🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
      
          🚩 जय गुरुदेव 🚩
   ⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

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