🕉🌞मंदिर एवं मस्जिद 🌞🕉
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🌞👉 एक साधक ने जिज्ञासा समक्ष रखी👉👇
❓ मस्जिदों में भीड़ उमड़ रही है जबकि मंदिरों में घंटा बजाने के लिए व्यक्ति नहीं मिलते, आखिर क्यों?
- ललित
🌞👉 आइए इस गंभीर प्रश्न पर थोड़ा सा ध्यान दें कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? यदि निष्कर्ष सत्य आधारित हो तो क्या हम वर्तमान में धर्म में चल रही पद्धति को रूपांतरित करने के लिए विचार विमर्श करके अपने आपको दृढ़ संकल्पित करेंगे?
👉प्रश्न आप सब से है जवाब भी आप सबको ही देना है!
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🌞👉ललित जी आपने बहुत ही गंभीर प्रश्न उठाया है किंतु इस प्रश्न के विषय में अगर मैं बोलूंगा तो मेरे शब्द अत्यंत कड़वे हो जाएंगे और जब प्रश्न आपने उठा ही लिया है तो बोलना अब मेरी मजबूरी है क्योंकि अब मैं बोले बिना रह नहीं सकता। आपने कहा की मस्जिदों में भीड़ बढ़ती जा रही है और मंदिरों में घंटा बजाने वाले नहीं मिलते! क्या कभी आपने इस पर विचार किया कि ऐसा क्यों हो रहा है? आखिरकार लोग मंदिर में जाना पसंद क्यों नहीं करते? मेरे विचार से यदि आप इसका उत्तर देंगे तो यही देंगे कि लोगों में धर्म के प्रति जागरूकता नहीं है। लोग सिर्फ कमाने खाने में लगे हुए हैं ,उन्हें धर्म से कोई मतलब नहीं है। अधिकांश हिंदू अपने धर्म के प्रति उदासीन रवैया अपनाने लगे हैं । उन्हें अपने धार्मिक मूल्यों से कोई मतलब ही नहीं है ,इस वजह से लोग मंदिर में नहीं जाते किंतु यदि आपका यह जवाब है तो मैं कहता हूंँ-आप बिल्कुल सरासर गलत बोल रहे हैं। अब तक आपने वास्तविक अर्थ में छोटी-छोटी बातों एवं वास्तविक तथ्यों पर ध्यान ही नहीं दिया है, जिसकी वजह से लोग धर्म के प्रति नकारात्मक रूख अपना रहे हैं ।
🌞👉आप जरा गौर करके देखिए मुसलमान मस्जिद में क्यों जाते हैं? क्योंकि वहां पर उन्हें नमाज अदा करना सिखाया जाता है ,उनके धर्म के सिद्धांतों का वहां पर ज्ञान दिया जाता है । अनुभवी व्यक्तियों के द्वारा लोगों का मार्गदर्शन किया जाता है। चाहे वह मार्गदर्शन किसी भी मार्ग पर ले जाता हो जो कि इस्लाम के सिद्धांत हैं किंतु वहां पर जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इस्लाम का ज्ञान दिया जाता है ।नमाज अदा करना सिखाया जाता है ।उन्हें दो बातें धर्म के संबंध में बताई जाती है। एकता एवं अखंडता का पाठ पढ़ाया जाता है । धर्म को विश्वव्यापी कैसे बनाया जाए? अधिक से अधिक मनुष्यों को इस नाम से कैसे जोड़ा जाए ? इसके संबंध में भविष्य की योजनाओं के संबंध में विस्तार से चर्चा की जाती है और क्रियान्विति हेतु सबके कर्तव्य निश्चित किए जाते हैं। किंतु कभी आपने गौर करके देखा हमारे मंदिरों में क्या किया जाता है? किसी भी मुसलमान को उनकी साधना पद्धति (नमाज अदा करने की पद्धति) सीखने के लिए किसी हाफिज या मौलवी को ढूंढने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि प्रत्येक मस्जिद में उस पद्धति का ज्ञान दिया जाता है और प्रतिदिन जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उस पद्धति का नियमित रूप से अभ्यास करवाया जाता है ।किंतु हमारे मंदिर क्या कर रहे हैं ?हमारे पंडित क्या कर रहे हैं? हमारे पुजारी क्या कर रहे हैं? क्या मंदिर में जाने वाले किसी भी व्यक्ति को किसी भी प्रकार की साधना ,उपासना पद्धति का ज्ञान दिया जाता है? क्या वेद, उपनिषद, षड्दर्शन ,गीता के दर्शन से संबंधित एक भी मंदिर के पुजारी के द्वारा मार्गदर्शन हेतु ,पथ प्रदर्शन हेतु प्रवचन दिया जाता है ? क्या हमारे मंदिरों में यज्ञ विज्ञान का ज्ञान दिया जाता है? क्या नित्य हवन होता है? क्या हमारे मंदिरों में संध्या काल में संध्योपासना कैसे करें ? यह ज्ञान-विज्ञान समझाया जाता है ?क्या हमारे मंदिरों में हिंदू धर्म की मूल साधना पद्धति योग विज्ञान का नियमित रूप से सुबह शाम अभ्यास करवाया जाता है ?धारणा ,ध्यान, समाधि के तत्व दर्शन को समझाया जाता है??? यदि नहीं तो फिर ऐसा कौन सा काम है जो मंदिरों में धर्म का हो रहा है ?सनातन ज्ञान का हो रहा है ?सत्य के प्रचार-प्रसार का हो रहा है? क्या वेद ,उपनिषद षड्दर्शन ,गीता का ज्ञान सिर्फ घंटा बजाना सिखाते है? कहां पर लिखा है ?कौन से ग्रंथ में लिखा है कि मंदिर में जाकर रोज सिर्फ घंटा बजाओ ? और यदि जिंदगी भर हम घंटा बजाते भी रहे तो क्या हासिल कर लेंगे? घंटा बजाने से सिर्फ घंटाल ही बने रहेंगे !कुछ भी हासिल नहीं कर सकेंगे ?कुछ भी नहीं! क्योंकि हमारे मंदिर अब धर्म के केंद्र नहीं रहे ! यहां पर धर्म का कोई काम नहीं किया जाता ।मंदिर सिर्फ और सिर्फ व्यावसायिक केंद्र हैं ,दुकान हैं ,जहां पर दुकानदारी की जाती है । जन सामान्य को ईश्वर के नाम से भावनात्मक रूप से सिर्फ और सिर्फ काल्पनिक दुनिया में भटकने पर मजबूर किया जाता है। सत्य के नजदीक नहीं बल्कि सत्य से दूर ले जाया जाता है ।इन मंदिरों में ज्ञानी गुरुजन नहीं ,बल्कि अज्ञानियों का डेरा है । ढोंगियों ,पाखंडियों ,आडंबर वादियों का डेरा है ।जो स्वयं अज्ञान के अंधकार में डूबे हुए हैं वे दूसरों को क्या सत्य का प्रकाश दिखाएंगे? वह सत्य ज्ञान जिसके सहारे भारतवर्ष विश्व गुरु कहलाता था , उसका 1% भी वर्तमान में मंदिरों में दिखाई नहीं देता ।सिर्फ ढोंग ,पाखंड आडंबर दिखाई देता है तो आखिरकार जनसामान्य मंदिर जाएगा क्यों? रामदेव जी ने जन सामान्य को योग सिखाना शुरू किया और उनके शिविरों में 500 से लेकर ₹10000 तक का टिकट होता था और उन शिविरों में लाखों की तादात में एक साथ व्यक्ति पहुंचते थे । आज भी संपूर्ण विश्व में योग सिखाने के लिए मोटी फीस ली जाती है और उस शुल्क को चुकाकर लोग योग विद्या का ज्ञान ग्रहण कर रहे हैं । शुल्क भी हजार -दो हजार नहीं होता ।लाखों रुपयों में लिया जा रहा है । हमारे भारत में भी ऋषिकेश में कई ऐसे आश्रम है ,जहां पर जाने वाले लोगों से लाखों रुपए शुल्क लिया जाता है । ऐसे आश्रमों में देश से नहीं बल्कि विदेश से आ आकर लोग लाखों रुपए खर्च कर करके , उस भारतीय मूल अध्यात्म विद्या का तत्वदर्शन जान रहे हैं ,सीख रहे हैं क्योंकि उस ज्ञान को जन-जन तक किसी के द्वारा भी पहुंचाया नहीं जा रहा है ।लोग सीखना चाहते हैं लेकिन बताया नहीं जा रहा है ,छुपाया जा रहा है ,दबाया जा रहा है ,बरगलाया जा रहा है, भटकाया जा रहा है किंतु सत्य बताया नहीं जा रहा !? जब सत्य सनातन धर्म का ज्ञान इतना महत्वपूर्ण है कि संपूर्ण विश्व उसकी ओर आकर्षित हो रहा है तो हमारे मंदिरों के ठेकेदारों को अब तक यह बात समझ में क्यों नहीं आ रही की योग के वास्तविक रहस्य को जाने , सनातन धर्म के वास्तविक ज्ञान को जाने , ढोंग, पाखंड, आडंबर से बाहर निकलकर उस सत्य तत्वदर्शन को जनसामान्य तक पहुंचाएं जिससे कि जन सामान्य की शारीरिक ,मानसिक एवं आध्यात्मिक प्यास बुझाई जा सके ।जब सत्य से साधक जुड़ेगा तो उसका धर्म के प्रति आत्मविश्वास ही नहीं बल्कि दृढ़ संकल्प बढ़ जाएगा। उसे विश्वास हो जाएगा कि सत्य सनातन हिंदू धर्म से बढ़कर संसार में अन्य कोई सत्य साधना पद्धति है ही नहीं। आखिरकार क्यों किसी का इस ओर ध्यान नहीं जाता? योग का अर्थ आसन समझ लिया गया। ऊंचे पैर नीचे सिर किया , इधर-उधर शरीर मरोड़ा और योग हो गया । क्या यही योग है? क्या इसी को योग कहते हैं? कौन बताएगा जन सामान्य को कि यह योग नहीं है ।यह तो व्यायाम मात्र है? योग तो शुरू ही धारणा ,ध्यान से होता है और समाधि में जाकर लीन हो जाता है ,समाप्त हो जाता है । सच तो यह है -जब तक मंदिर सिर्फ दुकान हैं !वहां पर जाने का कोई औचित्य नहीं और यदि मंदिर धर्म के केंद्र बन जाते हैं तो किसी को बुलाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी !लोग दौड़-दौड़कर मंदिर जाएंगे ।किसी भी पांच मंदिरों में वैदिक सत्य सनातन धर्म की पद्धति को 12 महीने लागू करके देख लीजिए । सुबह शाम वास्तविक योग पद्धति (प्राणायाम,धारणा ,ध्यान ,समाधि) का अभ्यास करवाइए फिर देखिए आप कितने लोग मंदिर में आने लगते हैं और नियमित रूप से आने लगते हैं किंतु मंदिर तो सिर्फ पूजा प्रसाद चढ़ाने के लिए जाओ ।घंटा बजाने के लिए जाओ और जीवनभर घंटाल ही बने रहो। अब यदि कुछ सीखना है,कुछ गहरा आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना है ,साधना पद्धति, मंत्र विज्ञान जानना है तो किसी बड़े गुरु जी के पास जाओ जो कहीं पर अपना बड़ा सारा आश्रम बना कर बैठे होंगे अध्यात्म का बड़ा शोरूम खोल कर । हम भी तुम्हें लूट लें और वे भी हमारे ही भाई है ।तुम्हें अच्छी तरह से लूटेंगे । हम तो पैसों से ही लूटते हैं , भावनाओं से ही लूटते हैं ,वे तुम्हारी बहन बेटियों की इज्जत भी लूटेंगे।वाह रे मेरे धर्म के ठेकेदारों !तुम्हें डूब मरना चाहिए किसी गंदे नाले में जाकर!? क्या इस तरीके से धर्म सत्य की राह पर जाएगा ?क्या इस तरीके से धर्म पुनः विश्वगुरु की पदवी को प्राप्त करेगा ?कभी भी नहीं ,कभी भी नहीं ,बिल्कुल नहीं ,सिर्फ और सिर्फ पतन के गर्त में जाएगा क्योंकि असत्य हमेशा समाप्त होता है ,मिटता है और वर्तमान में जो परिस्थितियां हजारों वर्षों से बनी हुई है ।उस पर कोई भी ध्यान नहीं देना चाहता ।हमारे हिंदू धर्म के जितने भी संगठन हैं वे सत्य के ध्वजवाहक नहीं बल्कि वे सिर्फ और सिर्फ ढोंग ,पाखंड ,आडंबर को बचाकर रखना चाहते हैं ।यदि वे सत्य को बचाना चाहते तो अब तक देश का कायापलट हो चुका होता ।धर्म में सत्य का साम्राज्य स्थापित हो चुका होता ।किंतु धर्म की जो दुर्दशा है ,जो ढोंग, पाखंड, आडंबर फैला हुआ है ।उसे मिटाने में उनका कोई भी लेना देना नहीं है।ये समय-समय पर आरक्षण का मुद्दा तो उठा लेंगे जिससे कि संपूर्ण देश में अराजकता का वातावरण उत्पन्न किया जा सके ।लोगों को एक दूसरे की जान का दुश्मन बनाया जा सके किंतु संपूर्ण भारतवर्ष के लिए नासूर बन चुका जातिवाद उन्हें कभी भी दिखाई नहीं देता। इस जातिवाद को समाप्त करने के लिए अब तक एक भी कदम इन संगठनों ने नहीं उठाया है। यदि जातिवादी व्यवस्था ही समाप्त हो गई तो फिर वास्तविक अर्थ में इन विषमताओं का औचित्य ही समाप्त हो जाएगा ।आए दिन आरक्षण के नाम पर होने वाले दंगे तब तक समाप्त नहीं किए जा सकते ,जब तक जातियां जीवित है ।ये सिर्फ राजनीतिक रोटियां सेकना चाहते हैं ।इसके अलावा धर्म के वास्तविक मर्म को जानना और उन सिद्धांतों को धर्म में लागू करने के संबंध में इनका कोई भी उद्देश्य नहीं है। धर्मगत विकृतियों को समाप्त करने की दिशा में इनकी कोई इच्छा शक्ति नहीं है ।इस तरह से सत्य का साम्राज्य नहीं आ सकता ।जब तक खुदगर्जी एवं स्वार्थवादीता से ऊपर नहीं उठा जाएगा ।तब तक धर्म सत्य की राह पर नहीं जा सकता । यदि धर्म को बचाना है तो आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा ।इस पद्धति को बदलना पड़ेगा ।मंदिरों में बैठे हुए लोगों को अपना दायित्व समझना पड़ेगा ।जन सामान्य को धार्मिक सिद्धांतों का ज्ञान देना पड़ेगा। योग पद्धति ही सनातन हिंदू धर्म का मूल ज्ञान एवं मूल साधना पद्धति है इसलिए योग विज्ञान को जन जन तक पहुंचाने की व्यवस्था करनी होगी। प्रत्येक मंदिर परिसर में यज्ञशाला का निर्माण करना पड़ेगा और वहां पर नित्य यज्ञ की अग्नि जला कर देवताओं को आहुतियां देनी पड़ेगी तब सत्वगुण प्रभावी होगा ,तब पुनः सतयुग का आगमन होगा ।ढोंग , पाखंड ,आडंबर से सत्य का साम्राज्य नहीं आ सकता।
👏 यदि मेरे शब्द कहीं पर कड़वे हो गए हो तो क्षमा चाहूंगा किंतु किसी को भी बुरा लगे तो लगे किंतु सत्य यही है और इस सत्य को कोई झुठला नहीं सकता और यदि आपके मन-मस्तिष्क में 1% भी लगा हो कि जो यहां पर लिखा गया है ।वह पूर्णतया सत्य है तो इस पोस्ट को इतना फैलाइए , इतना फैलाइए कि प्रत्येक व्यक्ति को पता लगे। हमारा धर्म जा किस मार्ग पर रहा है? प्रत्येक ढोंगी, पाखंडी के समक्ष इतने प्रश्न खड़े हो जाएं कि वह उनके जवाब भी न दे सके। धर्म के ठेकेदारों के लिए लोगों को बरगलाना मुश्किल हो जाए। ढोंगी गुरुओं का जीना मुहाल हो जाए। एक बात अच्छी तरह से समझ लीजिए ।संसार के अंदर कोई सा भी धर्म हो !योग से बढ़कर कोई भी साधना पद्धति नहीं है और योग आसन नहीं है । योग है "चित्त वृत्तियों का निरोध" और वह प्राणायाम करने से, धारणा ,ध्यान का अभ्यास करने से संभव होता है ।सिर्फ आसन करने से स्वास्थ्य ठीक होने के अलावा कुछ भी नहीं होता ।योग सिर्फ और सिर्फ ध्यान की पद्धति है ,ज्ञान की पद्धति है, विज्ञान की पद्धति है और संपूर्ण सत्य को जानने की पद्धति है।
⚜️ 🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️ 🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
shi kha guru g,🙏
ReplyDeleteGuruji Sadar Charan sparsh. Guru ji aapka kahana bilkul Satya hai. Pranayam Dhyan aur Gyan batna to bahut dur ki baat hai, mandiron mein to ham swayam Bhagwan ko Prasad bhi nahin Chadha sakte. Itne bhakti bhav or aur Prem bhav se jo ham Bhagwan ko Prasad chadhane ke liye le jaate Hain vah bhi pujari swayam apni jholi mein dal lete Hain Bhagwan ke upar to o Prasad chadhta hi bahut dukh hota hai dekhkar aisi sthiti.
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