🕉️🚩🚩🚩* मेरे राम*🚩🚩🚩🕉️
🕉️🚩 भगवान श्री राम के नाम पर आज संपूर्ण विश्व खुशियां मना रहा है खुशियां मना रहा है। किंतु देखने में यह आया है प्रभु श्री राम के नाम को हिंदुत्व की कट्टरता का प्रतीक के बना दिया गया है। जय श्री राम का जय घोष लगाने पर कुछ लोगों की भावनाएं आहत होती हुई देखी जा सकती हैं किंतु क्या राम कट्टरता के प्रतिनिधि थे? क्या प्रभु श्री राम ने कोई कट्टर सिद्धांत अपने जीवन में अपनाया? क्या उन्होंने किसी को कट्टरता का पाठ पढ़ाया ? क्या उन्होंने ऊंच नींच भेदभाव वादी संस्कृति को संरक्षण प्रदान किया? नहीं ना! तो फिर श्री राम का आदर्श नाम, आदर्श व्यक्तित्व ,आदर्श जीवन, आदर्श कृतित्व ,कट्टरता का प्रतिनिधि कब से बन गया? शायद इस प्रश्न पर गंभीरता से चिंतन- मनन करने की आवश्यकता है। यदि हम सनातन संस्कृति में किसी अवतारी चेतना को पूर्ण क्रांतिकारी व्यक्तित्व से ओत प्रोत पाते हैं तो वे भगवान श्री कृष्ण हैं। जिन का जीवन अपने आप में क्रांति एवं कूटनीति की असीम गाथा है । वे सिद्धांतों की तटस्थता पर नहीं धर्म की विजय पर विश्वास रखते हैं ,नीति चाहे कैसे भी हो ! किंतु भगवान श्री राम तो आदर्श के धनी हैं, उनका जीवन सीधा एवं सपाट है। उनका व्यक्तित्व सहज एवं सौम्य हैं। वे युद्ध के नहीं शांति के उपासक हैं। वे अहंकार के नहीं नम्रता के प्रतिनिधि हैं। वे पद प्रतिष्ठा के नहीं भाव के भूखे हैं। वे राजा के नहीं रंक के मित्र हैं। वे भोग के नहीं योग के पथी हैं। वे लोभ की नहीं त्याग की प्रतिमूर्ति हैं। एक भी तो गुण या यूं कहूं दुर्गुण ऐसा नहीं है जो मेरे प्रभु राम को कट्टरता के लबादे में लपेट सके, तो फिर क्यों श्री राम के नाम को कट्टरता का प्रतिनिधि समझ लिया गया है? समस्या की जड़ बड़ी गहरी है और जब तक इस जड़ तक नहीं पहुंचा जाएगा तब तक समस्या का समाधान नहीं हो सकता। यदि गंभीरता से चिंतन मनन करें तो श्री राम का नाम बाबरी मस्जिद के अस्तित्व में आने से पूर्व कभी भी कट्टरता का पर्याय नहीं रहा होगा किंतु जब सनातन आस्था एवं आदर्श के प्रतिनिधि भगवान श्री राम के जन्म स्थान पर बाबरी मस्जिद ने आकार ग्रहण किया ,उसी दिन से श्री राम अपने आप में सनातन की आक्रामकता के प्रतिनिधि बन गए क्योंकि प्रभु श्री राम की जन्म भूमि सनातनियों के लिए अपने आत्म सम्मान एवं गौरव का स्थान है। अपनी आस्था एवं उपासना का स्थान है। अपनी श्रद्धा एवं विश्वास का स्थान है। इस श्रद्धा मय स्थल को पुनः श्री राम के दिव्यआलोक से विभूषित करने का जो सैकड़ो वर्षों से संघर्ष चला आ रहा है, उसी ने श्री राम को सनातन की कट्टरता का प्रतिनिधि बना दिया । यदि बाबरी मस्जिद नहीं होती तो श्री राम सिर्फ आदर्श की प्रतिमूर्ति होते कट्टरता के प्रतिनिधि नहीं और शायद श्री राम का नाम कभी कट्टरता के साथ जोड़ा भी नहीं जाता क्योंकि सनातनी कट्टर होते ही नहीं है। क्योंकि सनातन में कट्टरता के लिए कोई स्थान ही नहीं है। सनातन का सिद्धांत तो जियो और जीने दो के सिद्धांत पर आधारित है। सनातन तो सिर्फ सच्चे मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ाता है और संपूर्ण वसुधा को अपना परिवार मानने की शिक्षा देता है। जिस परंपरा में संपूर्ण सृष्टि का कल्याण ही स्वयं का कल्याण है ,वह परंपरा कट्टरता का पर्याय कभी हो ही नहीं सकती। स्मरण रखिए मां भारती की गुलामी बाबरी से शुरू होती है और राम राज्य की शुरुआत राम लला के आगमन से होती है । मारो और मरो यह सनातन संस्कृति का कभी अंग नहीं रहा इसलिए सनातनी कभी भी करने एवं मारने की बात नहीं कर सकता। क्योंकि हमारा धर्म हमें ऐसा करने की इजाजत ही नहीं देता है ।वह तो प्राणी मात्र में उस परम चेतना का स्वरूप देखने की विज्ञान युक्त पद्धति देता है जोकि धारणा ध्यान समाधि से होकर गुजरती है ।यदि देखा जाए तो सच्चे अर्थ में धर्म का पर्याय सनातन ही है जिसकी मूल अवधारणा में मानव मात्र ही नहीं प्राणी मात्र का कल्याण निहित है। अब संपूर्ण विश्व फिर से सनातन मानवीय मूल्यों की आगोश में आने वाला है । देखते जाइए समय किस तरह संपूर्ण रूपांतरण की नई ईबारत लिखता है। अधर्म का अंत अब निश्चित रूप से होकर रहेगा और सच्चे अर्थों में मानवीय मूल्यों पर आधारित सनातन धर्म की स्थापना होगी संपूर्ण विश्व में।
⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
⚜️🚩 जय सियाराम 🚩⚜️
No comments:
Post a Comment