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Saturday, June 4, 2022

शिवलिंग पूजा का वास्तविक स्वरूप

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                🚩शिव लिंग🚩
शिवलिंग को स्वामी विवेकानंद जी ने क्या कहा ? 

- सनातन हिंदू धर्म का मजाक उड़ाने के लिए कुछ  कट्टरपंथी, जिहादी और हिंदू द्रोही शिवलिंग की तुलना नर शिश्न से कर रहे हैं । कई लोगों पर एफआईआर हो रही है वो जेल भेजे जा रहे हैं । लेकिन कुछ हिंदू विद्वान भी इस संबंध में नाना प्रकार की भ्रामक बातें फैला रहे हैं जो ठीक नहीं हैं । 

-स्वामी विवेकानंद पर लिखी भगवान सिंह राणा की पुस्तक"भारत के अमर मनीषी स्वामी विवेकानंद" में शिवलिंग पर विवेकानंद की जो टिप्पणी अंकित है उस को हू ब हू लिख रहा हूं.... बाद में शिवलिंग का वास्तविक  सत्य भी जरूर बताऊंगा ।

"सभा में एक जर्मन विद्वान ओपर्ट ने अपना एक निबंध पढ़ा, जिसमें उन्होंने ये सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि भारत में शिवलिंग की पूजा क्रमश: योनि और लिंग की पूजा है । इस मत का खंडन करते हुए स्वामी विवेकानंद जी ने कहा - 
शिवलिंग को मनुष्य के लिंग से जोड़ने के विषय में कुछ विचारहीन मत प्रचलित हैं । शिवलिंग पूजा की उत्पत्ति का मूल अथर्ववेद का यूपस्तम्भ स्रोत है। इस स्रोत में अनादि अनंत स्तंभ का वर्णन है और यह स्तम्भ ही ब्रह्म है।" 

-शिवलिंग के संदर्भ में मेरा शोध ये है कि इसकी तुलना नर शिश्न से इसलिए नहीं की जा सकती है क्योंकि अगर आप किसी शिवालय को देखें तो उसमें तीन चीजें होती हैं... पहली शिवलिंग दूसरी शिवलिंग पर लिपटा हुआ सर्प और तीसरा शिवलिंग के ऊपर रखा घड़ा जिससे लगातार अभिषेक होता रहता है । 
जबकि नर शिश्न पर कोई सर्प नहीं होता है और ना ही नर शिश्न के ऊपर कोई घड़ा होता है ! 

-दरअसल, असल बात ये है कि शिवालय और शिवलिंग किसी भी मनुष्य की कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है । मुझे स्वयं योग का अनुभव है और यही अनुभव सैकड़ों योगियों का रहा है । दरअसल कुंडलिनी शक्ति मूलाधार चक्र में स्थित एक ज्योतिर्मयी प्रकाशवान शिवलिंग के ऊपर लिपटा हुआ सर्प है । ये कुंडलिनी  सामान्य मनुष्यों में सोती रहती है लेकिन योगी पुरुषों में ये कुंडलिनी ऊपर चढ़ती है यानी कुंडलिनी पर मौजूद सर्प ऊपर चढ़कर मेरूदंड के भी ऊपर सिर पर मौजूद सहस्रार चक्र को स्पर्श करता है, उसके स्पर्श से सहस्रार चक्र जागृत हो जाता है और तब उस सहस्रार चक्र से अमृत की बूंदें गिरती हैं । सहस्रार चक्र एक्टिव होते ही पूरा शिवालय शरीर के अंदर ही संपूर्ण हो जाता है । दरअसल हमारे शरीर में सबसे ऊपर सिर पर मौजूद सहस्रार चक्र ही शिवालय में घड़े के रूप में दिखाया जाता है जो शिवालय में शिवलिंग के ऊपर नजर आता है । और जिस तरह योगी के शरीर में सहस्रार से अमृत बूंदें गिरती रहती हैं, ठीक वैसे ही शिवालय में घड़े से जल या दूध की बूंदें गिराई जाती हैं  और देवालय में शिवलिंग पर जो सर्प लिपटा रहता है वो मूलाधार में मौजूद कुंडलिनी शक्ति यानी ज्योतिर्मय शिवलिंग पर लिपटे हुए सर्प का ही प्रतीक है !

-कहने का मतलब साफ है जिसने भी शिवालय की रचना की होगी वो अवश्य ही कोई महायोगी ही  रहा होगा । सूक्ष्म को स्थूल में बदल दिया । बस विडंबना यही है ,आज हम वास्तविक अर्थ तक पहुंच नहीं पाते हैं और यहीं से भटकाव शुरू होता है।

-अपनी बात को साबित करने के लिए मैं दो किताबों का विवरण प्रस्तुत कर रहा हूं जो योगाचार्य के अनुभव पर लिखी गई हैं... .

- अपनी किताब तत्व ज्ञान में योगी आनंद जी लिखते हैं... 

"मूलाधार चक्र में स्थित शिवलिंग में साढ़े तीन चक्कर लिपटे हुए दिखाई देते हैं" 

- अपनी एक और किताब त्राटक में  योगी आनंद जी लिखते हैं... 

"चित्रों और मूर्तियों में कुंडलिनी को एक शिवलिंग के चारों ओर तीन पूर्ण और एक अपूर्ण कुंडली बनाते हुए दर्शाया जाता है । मूलाधार चक्र में त्रिकोण के मध्य में शिवलिंग पर लिपटी हुई साढे तीन चक्कर लपेटकर सोती है"

-दरअसल शिवालयों की रचना की ही इसीलिए गई थी कि लोग शिवालय को देखकर अपनी कुंडलिनी शक्ति को समझें और योगी के समान आध्यात्मिक अनुभव हासिल करें लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण बात ये है कि हम हिंदू लोग स्वयं ही दिग्भ्रमित हो गए और अपनी बात कभी ठीक से नहीं समझा सके । आपसे उम्मीद है इस लेख को खूब शेयर करें ताकी सबको असली बात पता चले । साथ ही साधना पथ पर आगे बढ़ कर के अपनी कुंडलिनी शक्ति को जागृत करने का प्रयास करें। शिवत्व आपके स्वयं के जीवन में उतर जाएगा और आपका यह शरीर ही शिवालय बन जाएगा, दैवालय बन जाएगा।

        ⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
        ⚜️🚩 हर हर महादेव 🚩⚜️
           ⚜️🚩 जय गुरुदेव 🚩⚜️
        ⚜️🚩 जय माँआदिशक्ति 🚩⚜️

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