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*गायत्री शब्द का अर्थ*
इन सब बातों पर विचार करने से प्रकट हो जाता है कि जीवन का सार प्राण है। यह प्राण स्वभावतः परमात्मा ने हमें प्रचुर मात्रा में दिया है। प्राण का अक्षय भण्डार हमारे चारों ओर लहलहा रहा है। उसमें से मनमानी मात्रा में हम अपने लिए ग्रहण कर सकते हैं। इतना होने पर भी जो लोग निर्बल प्राण देखे जाते हैं वे अपनी इस दैवी शक्ति को अरक्षित रखते हैं, ऐसी दिशा में खर्च कर देते हैं जहां उसका बहुत सारा अंश निरर्थक खर्च हो जाता है। इस व्यय को रोकने से मनुष्य प्राणवान् बन सकता है। यह व्यय किस तरह रुके, इसका समाधान एतरेय ब्राह्मण ने कर दिया है। उसका कथन है कि गायत्री प्राणों की रक्षा करती है। ऐसे अन्य प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे प्रकट होता है कि गायत्री नाम इसलिए पड़ा है कि वह प्राणों की रक्षा करती हैं।
*प्राण गया इति प्रोक्तास्त्रायते तानथापिवा ।*
—भारद्वाज
अर्थात्—गय प्राणों को कहते हैं। जो प्राणों की रक्षा करती है वह गायत्री है।
*तद्यत्प्राणं त्रायते तस्माद् गायत्री ।*
—वृहदारण्यक 5।14।।
जिससे प्राणों की रक्षा होती है वह गायत्री है।
*गयान् त्रायते गायत्री ।*
—शंकर भाष्यः
अर्थ—प्राणों की रक्षा करे वही गायत्री है।
*गायतस्त्रायते देवि ! तद्गायत्रीति गद्यसे ।*
*गयः प्राण इतिप्रोक्तस्तस्य प्राणदपीति वा ।।*
—वशिष्ठ
अर्थ हे देवि ! तुम उपासक की रक्षा करती हो इसलिए तुम्हारा नाम गायत्री है।
गय प्राणों को कहते हैं, प्राणों की रक्षा करने से गायत्री नाम होता है।
*गयाच्छिष्यान् यतस्त्रयेत्कायं प्राणास्तथैवच ।*
*ततःस्मृतेयंगायत्री सावित्रीयं ततोयतः ।।*
*प्रकाशनात्मा सवितर्वाग् रूपत्वात्सरस्वती ।।*
—अग्नि पुराण 216-2, 2
अर्थ—शरीर और प्राणों की रक्षा करने के कारण गायत्री नाम हुआ और प्रकाश स्वरूप होने के कारण गायत्री तथा वाणी रूप से सरस्वती कहलाई।
*गायत्री प्रोच्यते तस्माद गायन्तां त्रायते यतः ।*
—याज्ञवल्क्य
उसे गायत्री इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह प्राणों की रक्षा करती है।
इन प्रमाणों पर विचार करने से प्रकट हो जाता है कि गायत्री वह तत्व है जो हमारे प्राणों की रक्षा करता है। अब देखना है कि यह रक्षा किस प्रकार होती है। इस प्रकार प्रश्न पर विचार करते हुए हमें यह जानना होगा कि गायत्री है क्या? श्री शंकराचार्य जी ने अपने भाष्य में इसको स्पष्ट किया है वे कहते हैं—
गीयते तत्वमनया गायत्रीति
अर्थात्—जिससे तत्व जाना जाय वह गायत्री है। जिस विवेक बुद्धि से, ऋतम्भरा प्रज्ञा से, तत्व को, वास्तविकता को जाना जा सकता है वह गायत्री
- परम पूज्य सदगुरुदेव प. श्रीराम शर्मा आचार्य
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