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Monday, May 10, 2021

योगतत्वोपनिषद-7

🕉🌞योग तत्व उपनिषद -7🌞🕉
             ⚜🚩⚜

🌞👉 भगवान श्री हरि योग का तत्व समझाते हुए  परमपिता ब्रह्मा जी से कहते हैं -वायु धारण का अभ्यास बढ़ाने से घटावस्था की प्राप्ति सहज रूप में होने लगती है ,जिस अभ्यास में प्राण ,अपान ,मन, बुद्धि ,जीव तथा परमात्मा में जो पारस्परिक निर्विरोध एकता स्थापित होती है "उसे घटा अवस्था "कहा जाता है।
🌞👉 इंद्रियों को उनके इच्छुक विषयों से खींच कर लाना ही प्रत्याहार कहलाता है। उस समय साधक आंखों से जो कुछ भी देखें उसे आत्मवत समझे। जो भी कुछ कर्णेन्द्रिय से श्रवण करें तथा जो भी नासिका द्वारा सूंघे सभी को आत्म भावना से ही स्वीकार करें। जिह्वा के माध्यम से जो कुछ भी ग्रहण करें ,उसको भी आत्म रूप ही जाने। त्वचा से जो कुछ भी स्पर्श हो ,उसमें भी अपनी आत्मा की ही भावना करें। इसी तरह से ज्ञानेंद्रियों के जितने भी विषय हैं ,उन सबको योगी अपनी अंतरात्मा में धारण करें तथा प्रतिदिन  आलस्य त्याग कर प्रयत्नपूर्वक इसका अभ्यास करें।
🌞👉 इस प्रकार के अभ्यास द्वारा जैसे-जैसे योगी की चित्त शक्ति बढ़ती जाती है ,वैसे वैसे  उसको दूर श्रवण, दूरदर्शन ,क्षण भर में सुदूर क्षेत्र से आ जाना, वाणी की सिद्धि ,जब चाहे जैसा रूप ग्रहण कर लेना, अदृश्य हो जाना ,आकाश मार्ग से गमन कर सकना आदि सिद्धियां प्रकट होने लगती है। बुद्धिमान श्रेष्ठ योगी सदैव योग की सिद्धि की ओर ही ध्यान बनाए रखें। परंतु ये सभी सिद्धियों योग सिद्धि के लिए विघ्न रूप हैं, बुद्धिमान योगी साधक को इन सिद्धियों का कभी भी किसी के समक्ष प्रदर्शन नहीं करना चाहिए । इसलिए श्रेष्ठ योगी को जनसामान्य के समक्ष अज्ञानी, मूर्ख  एवं बधिर की भांति बन कर रहना चाहिए। अपनी सामर्थ्य को सभी तरह से छिपाकर गुप्त रीति से रहना चाहिए।  शिष्य समुदाय अपने अपने कार्यों के लिए योगी साधक को निश्चित ही प्रार्थना करेंगे किंतु योगी को उन शिष्य गणों के काम में पडकर अपने कर्तव्य को विस्मृत नहीं कर देना चाहिए।
🌞👉 उस योगी को चाहिए कि गुरु के वाक्यों को याद करके सभी तरह के क्रियाकलापों को छोड़कर योगाभ्यास में नियमित रूप से लगा रहे। इस प्रकार लगातार योगाभ्यास से उसे घटावस्था की प्राप्ति हो जाती है: परंतु इस तरह की सिद्धि अभ्यास के द्वारा ही मिल सकती है ,केवल बातों से कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता।
👏 क्रियाकलापों को छोड़ने का अर्थ यह नहीं है कि संन्यासी बन जाएँ। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि नियमित रूप से योगाभ्यास के प्रति कर्तव्य परायण रहें।सांसारिक जीवन के समस्त कार्यों को निश्चित रूप से करें किंतु योगाभ्यास के प्रति भी लापरवाह नहीं रहें। अपने सब अभ्यास को पूर्ण समय दें।
🌞 साधक के दो शब्द--  यहां पर भगवान श्री हरि विष्णु के द्वारा योग विज्ञान का अद्भुत रहस्य उजागर किया गया है।  पूर्ण सिद्ध योगी को अद्भुत शक्तियों का स्वामी बनने के विषय में वर्णन किया गया है, निश्चित ही यह पूर्ण सत्य है कि जब आत्मा एवं परमात्मा का पूर्णतया एकाकार हो जाता है। उस स्थिति में समाधिस्थ   योगी को अद्भुत शक्तियां एवं सिद्धियां हस्तगत होने लगती है किंतु सार्वजनिक रूप से या किसी के भी समक्ष योगी पुरुष को इन सिद्धियों को प्रकट नहीं करना चाहिए। हांँ ऐसे सिद्ध योगियों की आवश्यकता समाज को अत्यधिक हैं क्योंकि ऐसे महान सिद्ध योगी ही भारतीय सभ्यता ,संस्कृति एवं मानवीय मूल्यों को जीवित रखने में समर्थ होंगे । आतंकवाद का साया जिस तरह से मानवता के ऊपर छाया हुआ है। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे गुरु वशिष्ठ एवं विश्वामित्र बनकर राम एवं लक्ष्मण जैसे आदर्श शिष्य तैयार कर सकते हैं जो असुरता का समूल नाश कर दें किंतु वास्तविक सत्य तो यह है ऐसे महान योगियों के संकल्प मात्र से संसार बदलने लगता है । इस संसार में बहुत कुछ सिद्ध योगी के संकल्प मात्र से परिवर्तित होता हुआ अपने आप दिखाई देने लगता है। किसी भी संकल्प को धारण करके सिद्ध योगी के द्वारा की गई साधना इस भूमंडल में कल्याणकारी सकारात्मक   परिवर्तन को अंजाम देने में निश्चित रूप से सफल रहती है।

                                  -क्रमशः
            ⚜🚩सत्यमेव जयते 🚩⚜
          🌞 जय गुरुदेव 🌞

      ⚜🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜

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