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Tuesday, April 27, 2021

योगतत्वोपनिषद-1

🕉🌞 योग तत्वोपनिषद -1🌞🕉
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🔥यह उपनिषद कृष्ण यजुर्वेद से संबद्ध है। इसमें योग विषयक विविध उपादानों का विस्तृत वर्णन किया गया है। भगवान विष्णु के द्वारा पितामह ब्रह्मा जी  के लिए योग विषयक गूढ तत्वों के निरूपण के साथ उपनिषद का शुभारंभ हुआ है। धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष (पुरुषार्थ चतुष्टय) की प्राप्ति के लिए योग मार्ग को ही सर्वश्रेष्ठ साधन बताया गया है।
👉 पूर्ण मनोयोग से की गई योग साधना निःसंदेह सफल होती है, जो साधक को सर्वशक्ति संपन्न बना देती है। वह ईश्वरीय शक्तियों का अधिकारी बन जाता है अंततः वह आत्मतत्व का अंतकरण में साक्षात्कार करके आवागमन के बंधन से मुक्त हो जाता है।
🌞👉 भगवान श्री हरि विष्णु कहते हैं कि मनुष्यों  की हित कामना की दृष्टि से मैं योग तत्व का वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवण ,अध्ययन तथा आचरण में धारण करने से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं अर्थात पाप मूलक प्रवृत्तियां समाप्त हो जाती है।

🌞👉 पितामह ब्रह्मा जी ने उन जगत के स्वामी भगवान श्री हरि विष्णु की आराधना एवं प्रणाम करके कहा कि हे जगन्नाथ! आप अष्टांग युक्त योग का मुझे उपदेश प्रदान करें।
👉 यह सुनकर भगवान ऋषिकेश ने कहा कि मैं उस तत्व का वर्णन करता हूं, तुम ध्यान युक्त होकर श्रवण करो ये सभी जीव सुख -दुख के मायारूपी जाल में आबद्ध हैं। इस सुख- दुख रूप माया के जाल को काट कर उन समस्त जीवों को मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला तथा जन्म- मृत्यु ,जरा -व्याधि से छुटकारा दिलाने वाला यही मृत्यु तारक मार्ग है।
👉 मोक्ष रूपी परमपद अन्य दूसरे मार्गों का आश्रय लेने से कठिनता से प्राप्त होता है। भिन्न-भिन्न शास्त्रों के मतों में पडकर ज्ञानी जनों की भी बुद्धि मोहग्रस्त हो जाती है।
👉 उस अनिर्वचनीय पद का उल्लेख देवगण भी नहीं कर सकते, तब उस स्व प्रकाशित आत्मा के रुप का वर्णन शास्त्रों में कैसे किया जा सकता है?
👏 साधक का निष्कर्ष- भाइयों ,बहनों !आत्मा के वास्तविक स्वरूप का वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता क्योंकि आत्मा के वास्तविक स्वरुप का ज्ञान होना ही ब्रह्म ज्ञान है। जिस ज्ञानी ने अपने आप के वास्तविक वजूद को ,वास्तविक स्वरूप को जान लिया वह स्वयं ही ब्रह्म स्वरूप हो जाता है किंतु उस ब्रह्म स्वरूप का वास्तविक वर्णन शब्दातीत है, इसलिए भगवान श्री हरि विष्णु कह रहे हैं कि मोक्ष रूपी ब्रह्म पद का वर्णन देवगण भी नहीं कर सकते क्योंकि देवताओं को भी उस पद का ज्ञान नहीं होता।उस पद का ज्ञान होने पर तो वह आत्मा स्वयं ही ब्रह्म बन जाती है। उस ब्रह्म पद को प्राप्त करने का पूर्णत: सत्य और वैज्ञानिक मार्ग सिर्फ और सिर्फ योग मार्ग है।अन्य मार्गो का अनुसरण करके व्यक्ति उस पद तक पहुंच पाएगा या नहीं ,इसकी प्रमाणिक कोई कसौटी नहीं है, जबकि योग मार्ग में साधक को अपनी पहुंच का ज्ञान स्वयं ही होता रहता है। उसे मोक्ष पद पर पहुंचने से पूर्व संपूर्ण संसार का वैभव प्राप्त हो जाता है। इसलिए योग मार्ग धर्म ,अर्थ, काम एवं मोक्ष को सिद्ध करने वाला है।

   -- माँ आदिशक्ति कुंडलिनी योग परिक्रमा मार्ग झालरापाटन
                      
      🔱 सत्यमेव जयते🔱

            ⚜️जय गुरुदेव⚜️

  🔱  🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩🔱

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