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Tuesday, April 16, 2024

पूर्ण विज्ञान सम्मत गायत्री संध्योपासना

🕉🌞 कुंडलिनी जागरण की वैदिक विधि 🌞🕉
👉 सत्य के साक्षात्कार का संपूर्ण विधि विधान👇👇👇
    https://maa-aadishaktikundaliniyog.in/

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🌞 👉गायत्री उपासना कभी भी किसी भी स्थिति में की जा सकती है ।हर स्थिति में यह लाभदायी है परंतु विधिपूर्वक भावना से जुड़े न्यूनतम कर्मकांडों के साथ की गई उपासना अति फलदायी होती है ।तीन माला गायत्री मंत्र का जप  प्रत्येक साधक को निश्चित रूप से करना चाहिए।इससे अधिक जितना हो सके उतना ही उत्तम है ।वैदिक पद्धति के अनुसार त्रिकाल संध्या का विधान है किंतु  समयाभाव में दोपहर की संध्या यदि नहीं भी की जा सके  तो सुबह एवं शाम के समय प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह गायत्री महामंत्र के साथ संध्योपासना अवश्य करें। जो साधक नियमित संध्योपासना करता है, वह समस्त सुखों को प्राप्त करके ब्रह्म तत्व का ज्ञान प्राप्त कर लेता है अतःनित्यकर्म से निवृत होकर नियत स्थान, नियत समय पर सिद्धासन , पद्मासन ,वज्रासन या सुखासन में बैठकर नित्य गायत्री उपासना की   जानी चाहिए। जिस आसन में भी बैठने का अभ्यास हो एवं सुख पूर्वक बैठ सके।उसी आसन में बैठें।
🌞उपासना का विधि विधान🌞

🌞1. पवित्रीकरण---  बाएं हाथ में जल लेकर उसे दाहिने हाथ से ढक ले। इसके पश्चात निम्न मंत्र का उच्चारण करें। तदुपरांत जल को दाहिने हाथ से सिर एवं संपूर्ण शरीर पर छिड़क लें।
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा।
यः  स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं,स
बाह्माभ्यन्तरः शुचि।।
ॐ पुनातु पुंडरीकाक्षः,पुनातु पुंडरीकाक्षः पुनातु।

🌞2. आचमन-- वाणी मन व अंतःकरण की शुद्धि के लिए चम्मच से 3 बार दाहिने हाथ में थोड़ा सा जल लेकर  एक एक मंत्र बोलकर तीन बार आचमन ।

ॐअमृतोपस्तरणमसि  स्वाहा।
एक बार आचमन करें।

ॐ  अमृता पिधानमसि स्वाहा।
दूसरी बार आचमन करें।

ॐ  सत्यम् यशः श्रीर्मयि,  श्रीः    श्रयतां स्वाहा।
तीसरी बार आचमन करें।

🌞 शिखा स्पर्श एवं वंदन-- शिखा के स्थान को भीगी पांचों अंगुलियों से स्पर्श करते हुए भावना करें कि गायत्री के इस प्रतीक के माध्यम से सदा सत्य विचार ही हमारे मस्तिष्क में स्थापित रहेंगे । सहस्रार  चक्र एवं ब्रह्मरंध्र को हम जागृत करने का प्रयास करेंगे।

ॐ  चिद्रूपिणि महामाये,  दिव्य तेजःसमन्विते।
तिष्ठ देवि शिखामध्ये ,तेजो वृद्धिं कुरुष्व मे ।।

🌞4. प्राणायाम -- निम्न प्राणायाम मंत्र को बोलते हुए मूलाधार चक्र से लेकर सहस्रार चक्र तक के समस्त चक्रों में ऊर्जा का ध्यान करें एवं एहसास करें कि मूलाधार से ऊर्जा सहस्रार चक्र की ओर आ रही है-

ॐ भूः ॐभुवः ॐ स्वः ॐमहः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम्। ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनःप्रचोदयात् । आपोज्यौतीरसोऽमृतं,  ब्रह्म भूर्भुवः स्वः ॐ।
👉 ओंकार एवं  व्याहृति के साथ एक-एक चक्र का ध्यान करते जाएं एवं ऊर्जा को ऊपर की ओर उठाते जायें जैसे ॐ भूः से मूलाधार चक्र पर  प्रचंड  तेजोमयी ऊर्जा का ध्यान करें ।ॐ भुवः स्वाधिष्ठान चक्र पर ऊर्जा को लेकर आयें। ॐ स्वः मणिपुर चक्र पर ऊर्जा को लेकर आएं।  ॐ महः अनाहत चक्र में उर्जा को लेकर आएं ।ॐ जनः विशुद्धि चक्र पर ऊर्जा को लेकर  आएं। ॐ तपः आज्ञा चक्र पर ऊर्जा को लेकर आएं ।ॐ सत्यम् सहस्रार चक्र पर ऊर्जा को लेकर आएं एवं ध्यान स्थिर करते हुए शेष मंत्र को उच्चारित करें।
👉 तत्पश्चात आपको नाड़ीशोधन अनुलोम विलोम प्राणायाम का नाभि में तेज  प्रकाश  युक्त सूर्य का ध्यान करते हुए  5 से 10 मिनट तक अभ्यास करना है।
👉 इसके पश्चात कपालभाति प्राणायाम कम से कम 3 मिनट तक करें।
👉 अंत में भ्रामरी प्राणायाम कम से कम 2 मिनट करें।
❌👉 भ्रामरी प्राणायाम करने के बाद  सीधी आंखें नहीं खोलें पहले हाथों को ऊपर उठाएं एवं दोनों हाथों की हथेलियों को तेज गति से आपस में रगड़े ताकि हथेलियां गर्म हो जाएं ।गर्म हथेलियों को दोनों आंखों के ऊपर रखें एवं धीरे-धीरे आंखों को खोलें। पूर्णतया आंखों को खोलने के बाद धीरे-धीरे हाथों को नीचे लाएं अंगुलियों से धीरे-धीरे प्रकाश को आने दे। यदि आप सीधे आंखें खोलेंगे तो आंखें प्रकाश या रोशनी को सहन कर पाने में असमर्थ होगी एवं आंखों को नुकसान हो सकता है।

🌞5 न्यास--  बाँयें हाथ की हथेली में जल लेकर दाहिने हाथ की पांचों अंगुलियों को उसमें भिगोकर बताए गए स्थान को मंत्रोचार के साथ बाएं से दाएं स्पर्श करें।

ॐ वाङ् मे आस्येऽस्तु।  (मुख को)

ॐ नसोर्मेप्राणोऽस्तु।  (नासिका के दोनों छिद्रों को )

ॐ  अक्ष्योर्मेचक्षुरस्तु। ( दोनों नेत्रों को)

ॐ कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु।  (दोनों कानों को)

ॐ बाह्वोर्मे बलमस्तु।  (दोनों भुजाओं को)

ॐ ऊर्वोर्मे ओजोऽस्तु। ( दोनों जंघाओं को)
ॐ अरिष्टानिमेऽङ्गानी ,तनूस्तन्वा मे सह सन्तु  (समस्त शरीर पर जल छिड़के)
🌞7. गुरु पूजन-  गुरु परमात्मा की दिव्य चेतना का वह अंश है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है। इसलिए सद्गुरु की दिव्य चेतना का आवाहन निम्न मंत्रोचार के साथ करें।
ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः।
गुरुरेव परब्रह्म,तस्मै  श्री गुरुवे नमः।।
ॐ  श्री गुरुवे नमः ।आवाहयामि, स्थापयामि ,पूजयामि ध्यायामि।  ततो नमस्कारं करोमि।
👏 सदगुरुदेव का तिलक आदि लगाकर पूजन करें ।
👉 इसके पश्चात  यदि आप साकार उपासना में विश्वास रखते हैं  तो जल ,अक्षत , तिलक आदि से  मांँ के चित्र  या तस्वीर का पूजन करें  और निराकार उपासना में विश्वास रखते हैं  तो आपको यह पूजन करने की आवश्यकता नहीं है। यहां पर आप अन्य जिन जिन  देवी-देवताओं में श्रद्धा विश्वास रखते हैं ,उन देवी देवताओं का इस समय पर आप अपने शब्दों में किसी भी मंत्र से  आव्हान कर सकते हैं ।प्रणाम एवं नमस्कार कर सकते हैं ।भगवान गणेश जी ,मां दुर्गा भगवान शिव ,भगवान विष्णु, भगवान ब्रह्मा जी, भगवान राम ,भगवान कृष्ण, भगवान हनुमान जी महाराज एवं अन्य देवी देवताओं को जिन पर भी आपको श्रद्धा एवं विश्वास हो उनके नाम से उनके मंत्र से स्मरण कर सकते हैं। नमस्कार भाव से प्रणाम समर्पित कर सकते हैं। इसके पश्चात शुद्ध घी का दीपक जलाकर समक्ष रखें  ।यह साकार एवं निराकार दोनों के उपासक के लिए आवश्यक है। साथ ही पवित्र
जल से भरा हुआ लोठा पूजा  वेदी पर रखें।
👉 इसके पश्चात भाव  युक्त होकर माँ आदि शक्ति को स्मरण करें  और उसके तेजोमयी  सविता स्वरूप को आज्ञा चक्र पर धारण करें ।
🌞8. मंत्र जप एवं ध्यान--  गायत्री महामंत्र का जप  न्यूनतम कम से कम तीन माला  या बिना माला के 20  मिनट जप निश्चित रुप से करें। जप करते समय ध्यान आज्ञा चक्र पर रखें एवं मौन मानसिक रूप से जप करें।
👉साधक श्वेत शीतल प्रकाश युक्त सविता परमात्मा का   आज्ञा चक्र (भृकुटी) पर ध्यान करता रहे एवं मंत्र  मौन मानसिक रूप से चलता रहे।

⚜👉 जो साधक कुंडलिनी जागरण की साधना करना चाहते हैं ।कम से कम 30 मिनट मंत्र जप अवश्य करें ।यदि माला से जप करते हैं तो 5 माला निश्चित रुप से करें। जप करते समय रीड की हड्डी बिल्कुल सीधी रहे । जिस आसन में भी बैठे उस आसन में अधिक से अधिक पूर्ण स्थिरता के साथ बैठने का प्रयास करें ।पैरों में अत्यधिक दर्द होने पर ही आसन बदलें बार-बार चंचलता वश आसन नहीं बदलें। आसन जितना स्थिर होगा मूलाधार से सहस्रार चक्र की ओर ऊर्जा का प्रवाह उतना ही तीव्र गति से होगा।

गायत्री मंत्र--ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भावार्थ--  उस प्राण स्वरूप ,दुख नाशक ,सुखस्वरूप ,श्रेष्ठ ,तेजस्वी, पापनाशक ,देवस्वरूप परमात्मा को हम अपने अंतःकरण में धारण करें ।वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।
🌞👉 मंत्र जप के पश्चात आरती करें
🔥 जयति जय गायत्री माता ,जयति जय गायत्री माता ।
सत मारग पर हमें चलाओ माँ, जो है सुखदाता।
जयति जय गायत्री माता।
आदिशक्ति तुम अलख निरंजन जग पालन करती ।
दुख-शोक, भय ,क्लेश ,कलह ,दारिद्रय, दैन्य हरती।
जयति जय ......।
ब्रह्म रूपिणी, प्रणत पालिनी, जगत् धातृ अंबे ।
भवभय हारी जनहितकारी, सुखदा जगदंबे ।
जयति जय गायत्री माता।
भय हारिणी ,भव तारिणी ,अनघे, अज,  आनंद राशि ।
अविकारी ,अघहरी ,अविचलित ,अमले, अविनाशी।
जयति जय गायत्री माता।
कामधेनु सत् चित् आनंदा, जय गंगा गीता।
सविता की शाश्वती शक्ति तुम ,सावित्री सीता ।
जयति जय गायत्री माता।
ऋक , यजु,सोम,अथर्व प्रणयिनी,प्रणव महामहिमे ।
कुंडलिनी ,सहस्रार ,सुषुम्ना, शोभा गुण गरिमे। जयति जय गायत्री माता।
स्वाहा ,स्वधा, शचि, ब्रह्माणी ,राधा, रुद्राणी ।
जय सतरूपा ,वाणी, विद्या ,कमला, कल्याणी। जयति जय गायत्री माता।
जननी हम हैं दीन -हीन,दुःख -दारिद्र के घेरे ।
यद्यपि कुटिल कपटी कपूत ,तऊं बालक हैं तेरे । जयति जय गायत्री माता।
स्नेहमयी, करुणामयी माता, चरण शरण दीजै ।
बिलख रहे हम  शिशु सुत तेरे ,दया दृष्टि कीजै । जयति जय गायत्री माता।
काम,क्रोध ,मद ,लोभ ,दंभ , दुर्भाव,द्वेष हरिये।
शुध्दबुद्धि ,निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये। जयति जय गायत्री माता।
तुम समर्थ सब भांति तारिणी, तुष्टि -पुष्टि त्राता। सत् मारग पर हमें चलाओ माँ,जो है सुख दाता।
जयति जय गायत्री माता ।
जयति जय गायत्री माता।
जयति जय गायत्री माता।
🔥👏 आरती के पश्चात निम्न मंत्र से मां आदिशक्ति से प्रार्थना करें--
ॐ त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव ।।त्वमेव विद्या द्रविडं त्वमेव ।त्वमेव सर्वं मम देव देव।।
                         
ॐ तेजोसि तेजो मयि धेहि।  वीर्यमसि वीर्यं मयि धेहि ।
बलंमसि बलं मयि धेहि ।ओजोस्योजो मयि धेहि। मन्युरसि मन्युं मयि धेहि। सहोसि सहो मयि धेहि।।

ॐ स्तुता मया वरदा वेदमाता , प्रचोदयन्तां पावमानी  द्विजानाम्। आयुःप्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं  द्रविडं ब्रह्मवर्चसम्। मह्मं दत्वा व्रजत  ब्रह्मलोकम्।

🌞10. सूर्यार्घ दान--   प्रार्थना के पश्चात पूजा वेदी पर रखें छोटे लोठे का जल सूर्य की दिशा में  अर्घ्य रूप में निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ चढ़ाया जाए।
ॐ सूर्य देव सहस्त्रांशो तेजोराशे जगत्पते ।अनुकम्पय मां भक्त्या, ग्रहाणार्घ्य दिवाकर।।
ॐ सूर्याय नमः, आदित्याय नमः, भास्कराय नमः।।

🌞11. प्रदक्षिणा--  सूर्यार्घ्यदान देने के बाद वहीं पर खड़े खड़े निम्न मंत्र बोलकर तीन बार परिक्रमा करें।
ॐ यानि कानि च पापानि ज्ञाताज्ञात कृतानी च।  तानि सर्वाणि नश्यंति प्रदक्षिणा पदे पदे।।
12. विसर्जन-- अब जब संपूर्ण साधना पूर्ण हो चुकी है तो देव शक्तियों का पूजा स्थान पर आकर विसर्जन करें।
हाथ जोड़कर  प्रार्थना करते हुए निम्न मंत्र बोलकर मां आदिशक्ति को पूजा स्थान से प्रस्थान करने हेतु प्रार्थना करें।
उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वत मुर्धनि।
ब्राह्मणेभ्योहानुज्ञाता गच्छ देवी! यथा सुखम्।।

❌❌👏 शराब -मांसाहार एवं हर प्रकार के नशे से दूर रहें।
                       
        ⚜️सत्यमेव जयते ⚜️

     ⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️

            ⚜️जय गुरुदेव⚜️

    ⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️

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