🕉🌞 अमृतनादोपनिषद 🌞🕉
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🌞👉 प्राण शक्ति का भोगोंकी ओर भटकना ही पापों को जन्म देता है।असंयमित प्राण ही समस्त वासनाओं का कारण है, उसके नियमन से पाप की संभावना समाप्त होने लगती है।समस्त शरीर में व्याप्त नाड़ियों की शुद्धता बढ़ती जाती है।नाड़ियों के शुद्ध होने से शरीर में व्याप्त विभिन्न प्रकार की व्याधियां स्वत:ही नष्ट हो जाती है। शरीर दिव्य एवं तेजस्वी दिखाई देने लगता है अतः स्वस्थ एवं प्राणवान जीवन जीने के लिए प्राणायाम से प्राणों का संयम करना अत्यंत आवश्यक है।
🌞 प्राणायाम के माध्यम से दोषों अर्थात इंद्रियों में एकत्रित विकारों को तथा धारणा के माध्यम से पापों को अर्थात कुसंस्कारों को जलाकर भस्म कर डालें। प्रत्याहार के द्वारा इंद्रिय संसर्ग से उत्पन्न दोषों से मुक्त हो जाएँ। ध्यान के द्वारा अपने व्यक्तित्व में ईश्वरीय गुणों को धारण करें। इस प्रकार संचित पापों एवं इंद्रियों के कुसंस्कारों का शमन करते हुए अपने इष्ट के रुप मे प्रकाश स्वरुप परमात्मा का ध्यान करना चाहिए।
🌞 इस प्रकार अपने इष्ट का ध्यान करते हुए वायु को अंतकरण में खींचना पूरक प्राणायाम कहलाता है। वायु को अपने इष्ट का ध्यान करते हुए अंतस्थ में रोककर रखना अंतः कुंभक प्राणायाम है। धीरे-धीरे वायु को बाहर छोड़ना रेचक प्राणायाम है। अपने इष्ट का निर्विकार रुप से ध्यान करते हुए यथासंभव बिना श्वास के रहना बाह्य कुंभक प्राणायाम है। इस प्रकार की प्रक्रिया को एक प्राणायाम कहा गया है।
🌞 प्राण शक्ति की वृद्धि करने वाला साधक प्रणव सहित संपूर्ण गायत्री महामंत्र को चार भागों में बांट कर पूरक, अंतः कुंभक, रेचक, बाह्य कुंभक प्राणायाम करें।
🌞 बुद्धिमान मनुष्य मन को संकल्प के रूप में जानकर, उसे आत्मा में लय कर दें। तत्पश्चात उस आत्मा रूपी सद्बुद्धि को भी परमात्म सत्ता के ध्यान में स्थिर कर दें। इस प्रकार की क्रिया को ही धारणा की स्थिति के रूप में जाना जाता है।
🌞 शास्त्रानुसार ऊहा अर्थात विचार करना तर्क कहा जाता है। ऐसे तर्क को प्राप्त करके दूसरे अन्य सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को तुच्छ मानकर परमात्मा के स्वरुप में लीन हो जाना अर्थात समस्त प्रकार के तर्क-वितर्क से रहित हो जाना ही समाधि की अवस्था कही जाती है। निष्कर्षत: चित्तवृत्ति का एक स्थान पर रूक जाना ही योग है ,समाधि है।
🌞 भूमि को स्वच्छ समतल कर के रमणीय तथा सभी दोषों से रहित क्षेत्र में मानसिक रक्षा करता हुआ सिद्धासन, पद्मासन वज्रासन या सुखासन जिस आसन में भी आसानी से अधिक समय तक बैठ सकें ,उस आसन में बैठकर पूर्वाभिमुख हो योगाभ्यास करना चाहिए।
🌞 👉नासिका के दाएं छिद्र को दाहिने हाथ के अंगूठे से बंद करें, बाएं नाक से धीरे-धीरे गहरी श्वास खींचे।नाभि तक गहरी श्वास भर लें, तेज स्वरुप शब्द ओमकार ( सूर्य )का नाभि में चिंतन (ध्यान) करें। जब तक आसानी से प्राण वायु को रोका जा सके ,रोक कर रखें, अब बाएँ नाक को मध्यमा एवं अनामिका अंगुली से बंद करें एवं धीरे-धीरे प्राणवायु को दाहिने नासा छिद्र से बाहर निकालें। अपने आप को समस्त प्रकार के चिंतन एवं तर्क-वितर्क से मुक्त शांत स्वरूप ओमकार के रूप में ध्यान करें । जब तक आसानी से बिना श्वास के रह सके रहें।
यह एक नाड़ीशोधन अनुलोम विलोम प्राणायाम हुआ। इस प्राणायाम का नियमित अभ्यास समस्त नाड़ियों को शोधित कर साधक के शरीर में नाद शक्ति उत्पन्न करता है।इस प्राणायाम क्रिया को जितना अधिक किया जा सके उतना अधिक साधक परमात्मशक्ति में लीन होता जाता है एवं पूर्णतया स्वस्थ एवं निरोगी हो जाता है।
🌞 तत्पश्चात भ्रकुटी पर प्रकाश स्वरूप ॐ कार( सूर्य) का ध्यान करते हुए ओमकार का जप करें।ओंकार का जप नाद रूप में करें।
🌞 योगाभ्यास की यह क्रिया ताल वृक्ष की भांति कुछ ही काल में फल प्रदान करने वाली हैं । इसका अभ्यास पहले से सुनिश्चित योजना अनुसार ही करने योग्य है।
🌞 इस प्रणव नाम से प्रसिद्ध घोष का उच्चारण बाह्य प्रयत्नों से नहीं होता है।यह व्यंजन एवं स्वर भी नहीं है। इसका उच्चारण कंठ ,तालु ,ओष्ठ ,दंत एवं नासिका आदि से भी नहीं होता ! प्रणव वह श्रेष्ठ अक्षर है जो कभी भी नष्ट नहीं होता।ओंकार का प्राणायाम के रूप में अभ्यास करना चाहिए तथा मन को गुंजायमान घोष में सदैव लगाए रहना चाहिए।
👉 ओंकार को उद्गीत कहा गया है । इसे उद् अर्थात प्राणों के माध्यम से ही झंकृत किया जाता है।
👏 साधक भाईयों - बहिनों ! प्रारंभिक साधक को ओमकार का मौन मानसिक नाद मय जप करने में परेशानी महसूस होती है, इसलिए साधक यदि गायत्री महामंत्र का जप करता है तो वह सहजता से मन की वृत्तियों को एकाग्र करके सत चित आनंद स्थिति में स्थिर होने में समर्थ हो जाता है। इसलिए साधकों को चाहिए कि गायत्री महामंत्र के माध्यम से उस सत्य स्वरूप परमात्मा एवं जगत जननी मां आदिशक्ति से प्रार्थना करें अर्थात् गायत्री महामंत्र का अधिक से अधिक जप करें। निश्चित रूप से योग का संपूर्ण रहस्य आपके अंतस्थ में स्वतः ही घटित होने लगेगा ।
-क्रमशः
- योगाचार्य रामेश्वर मानव
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
✴️ अखिल विश्व गायत्री परिवार ✴️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
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