🕉🌞गोरखवाणी और गोरख योग 🌞🕉
⚜️🚩⚜️
🌞👉 महायोगी गुरु गोरखनाथ योग का तत्व दर्शन समझाते हुए कह रहे हैं--
👉 12 कला यानी मूलाधारस्थ सूर्य को सोखे ,जिससे वह सूर्य अमृत के निर्झर को स्वयं सोखने में समर्थ न हो और इस प्रकार 16 कला ज्ञानी सहस्रारस्थ अमृत स्रावक चंद्रमा का पोषण करे। इस प्रकार 4 कलाएं यानी सूर्य के ऊपर चंद्रमा की विशेषता अर्थात अमृत सिद्ध होगा। इससे अनंत कलापूर्ण ब्रह्मानुभव मय जीवन प्राप्त होगा। विशाल प्रकाशमय ज्योति के दर्शन होंगे ,इससे साधक सिद्धि को साधते हुए अमृत का पान करेगा।
🌞 साधक के दो शब्द - महायोगी गुरु गोरखनाथ ने यहां पर योग का अत्यंत गूढ़ रहस्य समझाया है। मूलाधार काम का केंद्र है ,यह मनुष्य को प्रकृति से जोड़ता है ।प्रकृति का अधिकांश कार्य काम के द्वारा ही प्रेरित है ।यदि काम केन्द्र में आनंद नहीं होता तो चेतन प्रकृति का कार्य आगे बढ़ना अत्यंत मुश्किल हो जाता। इसीलिए प्रकृति ने काम को आनंद का मूल बनाकर मूलाधार चक्र में स्थित कर दिया है । संपूर्ण प्रकृति में जो आनंद काम क्रीड़ा में है , वह आनंद अन्य किसी क्रिया में नहीं ! प्रकृति के वशीभूत होकर प्रत्येक प्राणी इस आनंद को पाना चाहता है; और प्रकृति के वशीभूत होकर ही प्रत्येक प्राणी का कर्तव्य हो जाता है कि वह उसके समान संतति उत्पन्न करें, एवं प्रकृति के नियम का पालन करता रहे। प्रकृति प्राकृतिक रूप से चाहती ही नहीं है कि कोई भी व्यक्ति उसके नियम का उल्लंघन करे़ें क्योंकि कोई भी अपने प्रिय को अपने आप से अलग नहीं करना चाहता ।संसार की हर शक्ति यही चाहती है- कि सब मेरे आदेश का पालन करें ।प्रत्येक मनुष्य की चाहत भी यही होती है कि वह अधिक ऊंचाई पर हो और दुनिया उससे नीचे खड़ी हो; इसीलिए प्रकृति ने काम में अत्यंत आनंद को समाहित कर रखा है, किंतु यह आनंद वास्तविक आनंद नहीं क्योंकि यह स्वयं से प्राप्त नहीं हो सकता । इसके लिए मादा को नर और नर और मादा चाहिए। प्रकृति का हर जीव हर प्राणी इस आनंद के पीछे भागता हुआ दिखाई देता है। मनुष्य को छोड़ अन्य किसी के पास भी इस स्थिति से बाहर निकलने का सामर्थ्य नहीं किंतु अधिकांश मनुष्य भी इसी प्रकृति जन्य आनंद के पीछे दौड़ते रहते हैं ।हजारों की भीड़ में कुछ ही जागृत आत्माएं प्रकृति से पार जाने के लिए साधना का मार्ग अपनाती है ।वे अपने योग के पुरुषार्थ से मूलाधार स्थित काम ऊर्जा को धीरे-धीरे मूलाधार से उठाकर ,स्वाधिष्ठान मणिपूरक ,अनाहत, विशुद्धि , आज्ञा चक्र में होते हुए सहस्रार चक्र तक पहुंचा देता है। जब संपूर्ण कुंडलिनी जागृत हो जाती है तो मूलाधार स्थित संपूर्ण ऊर्जा सहस्रार चक्र का पोषण करने लगती है ।काम का केंद्र साधक के वशीभूत हो जाता है ।वह मूलाधार की संपूर्ण ऊर्जा को सहस्रार की ओर प्रेरित करने में सक्षम हो जाता है । जो ऊर्जा बाहर की ओर निकलने के लिए हमेशा प्रकृति का सानिध्य चाहती थी अब वही ऊर्जा सहस्रार चक्र की और उठ कर ब्रह्मानंद की प्राप्ति करवाने लगती है ।ऐसी स्थिति में सहस्रार चक्र में दिव्य महान प्रकाश का उद्भव होता है। संपूर्ण मस्तिष्क प्रकाश से भर जाता है ।सहस्रार चक्र से अमृत का स्राव होने लगता है ।साधक को ब्रह्म मय जीवन का साक्षात अनुभव होने लगता है अर्थात वह सत चित आनंद ,संपूर्ण आनंद का स्रोत अपने अंदर ही प्राप्त कर लेता है । सिद्धियां जागृत होने लगती है ,साधक सामान्य जीवन से महान व्यक्तित्व में बदल जाता है। अब वह प्रकृति के वशीभूत नहीं वह सत्य विवेक से प्रकृति के साथ आचरण करता है उसके अंतस्थ में सत्य प्रतिष्ठित हो जाता है और यहीं से उसकी स्वयं की प्रकृति उसके वशीभूत हो जाती है अर्थात वह अपनी भावनाओं एवं संवेदनाओं पर नियंत्रण स्थापित करना सीख जाता है उसे यह सामर्थ्य प्राप्त हो जाती है । यही वह स्थित है जहां पर साधक के संकल्प सिद्ध होने लगते हैं और कुछ हद तक वह अपने आप को विशिष्ट स्थिति में खड़ा देखता है किंतु यहां पर बहुत अधिक सावधान रहने की आवश्यकता भी होती है ।
-- सनातनी हिंदू योगाचार्य रामेश्वर मानव
(मेरी संपूर्ण पहचान)
⚜️🚩 सत्यमेव जयते 🚩⚜️
⚜️🚩 जय श्री राम 🚩⚜️
🚩 जय गुरुदेव 🚩
⚜️🚩 जय मां आदिशक्ति 🚩⚜️
No comments:
Post a Comment